Sunday, August 21, 2016

अकथ का कथाकार


अकथ का कथाकार

इंडिया इनसाइड साहित्य वार्षिकी 2016 में राम प्रकाश कुशवाहा का आलेख

शिवमूर्ति तकनीकों के जादूगर हैं। संवेदनात्मक और संवेगात्मक प्रभाव-वृद्धि के लिए उन्होंने अपनी अलग-अलग कहानियों में अलग-अलग तकनीक का प्रयोग किया है। इस आलेख में कुछ यही: 

                                                   रामप्रकाश कुशवाहा

शिवमूर्ति की कहानियां और उनकी कहानियों की समीक्षाएं पढ़ कर लम्बे समय से मुझे ऐसा लगता रहा है कि भारी लोकप्रियता एवं प्रशंसा के बावजूद उनकी कहानियों का सही और निष्पक्ष मूल्यांकन नहीं हो पा रहा है .यह कुछ ऐसा ही मामला है जैसे सिरप (पेय मीठी दवा ) को पीने वाला जनसामान्य उसके रंग ,स्वाद और गंध पर ही रीझ कर रह जाता है .उस सिरप के माध्यम से अपनी काया में पहुँच रहे रसायनों से प्रायः अनभिज्ञ ही रहता है . अधिकांश समीक्षकों को वे कभी प्रेमचंद के उत्तराधिकारी लगते हैं तो कभी रेणु के – पूर्व प्रभावों या परंपरा में किसी रचनाकार को देखने का यह पूर्वाग्रह, उसके अद्यतन मौलिक अवदानों को ठीक से समझने नहीं देता . शिवमूर्ति की कहानियों की तरलता–सरलता के पीछे उनके व्यक्तित्व के अनुरूप ही, उच्चस्तरीय मस्तिष्क से उदभूत एक बुद्धिधर्मी सजग आयाम भी है .यद्यपि शिवमूर्ति की आंचलिकता और प्रभावशीलता के साथ उनकी सूक्ष्म निरीक्षणशीलता .मार्मिकता और संवेदनशीलता आदि कथा–गुणों की मुक्त प्रशंसा भी कम नहीं हुई है ; फिर भी, उनके कथाकार की ऐतिहासिक भूमिका को ठीक-ठीक समझने के लिए ; उनकी कहानियों के  पुनःपाठ के रूप में , उनकी अब तक भी अदेखी रह गयी अनेक विशेषताओं की पड़ताल करना आवश्यक है .
         हिंदी-जगत में शिवमूर्ति की जिस कहानी नें लोकप्रियता का नया कीर्तिमान स्थापित किया - ‘कसाईबाड़ा’ की कथावस्तु से लेकर शैली तक में इतनी स्पष्ट मौलिकताएँ हैं कि जब वह कहानी प्रकाशित हुई थी – तब  शिवमूर्ति के आगमन को एक नए महत्वपूर्ण कथाकार की प्राप्ति के रूप में ही देखा गया था . उनकी पारिवारिक प्रसंगों को लेकर लिखी गयी ‘केसर कस्तूरी’ ,’सिरी उपमा जोग’ और ‘भरतनाट्यम’ आदि कहानियों को पढ़ कर भी किसी को ऐसा नहीं लगा था कि वह किसी प्रेमचंद- द्वितीय या रेणु-द्वितीय को पढ़ रहे हैं . शिवमूर्ति वैसे भी लम्बे अंतराल के बाद कम, लेकिन पूरी तैयारी के साथ लिखने वाले , अच्छी कहानियों के विरल लेखक हैं . ऐसी स्थिति में उनके प्रति, रेणु के लेखकीय पुनर्जन्म वाली धारणा के प्रचार–प्रसार का आधार उनकी सिर्फ दो कहानियां ‘अकालदण्ड’ और ‘तिरियाचरित्तर’ ही विशेष रूप से सामने आती हैं . यद्यपि आंचलिक चित्र उनकी ‘ख्वाजा ! ओ मेरे पीर’   कहानी में भी कम नहीं है . उनकी कहानियों में ‘कसाईबाड़ा’ जैसी राजनीतिक विषय-वस्तु , सूक्ष्म समय-संवेदन तथा राजनीतिक यथार्थ को नाटकीय रुपकता में बांधने वाली कहानियों की भी श्रृंखला है ; जिसमें साम्प्रदायिकता को लेकर लिखी गयी उनकी लम्बी कहानी त्रिशूल (अब उपन्यास रूप में प्रकाशित ) , जाति आधारित भेद-भाव ,शोषण ,संघर्ष एवं उसके आधार पर राजनीतिक ध्रुवीकरण को विषय बनाकर लिखी गयी लम्बी कहानी ‘तर्पण ‘ (उपन्यास रूप में प्रकाशित ) और दलित उभार के दौर के बाद एक सुरक्षित ‘सीट’ वाले गाँव के चुनावी परिदृश्य को आधार बनाकर , भूमंडलीकरण के  युग में विश्वग्राम का रूपक प्रस्तुत करने वाली ‘बनाना रिपब्लिक ‘ जैसी कहानियाँ विशेष रूप से उल्लेखनीय है .          
      अपनी अद्यतन कहानी ‘बनाना रिपब्लिक’  की संरचनात्मक परिकल्पना शिवमूर्ति नें निश्चय ही बहुत ही गंभीर चिंतन और लम्बे समय तक किए गए गहरे सूक्ष्म पर्यवेक्षण के बाद तय की होगी . चुनावी जनमत के निर्माण की जटिल सामूहिक प्रक्रिया को सामने लाने के लिए, इस कहानी में शिवमूर्ति को काफी मेहनत करनी पड़ी होगी . यह  निश्चय ही उनके जैसे कथाकार के लिए भी अत्यंत  चुनौतीपूर्ण कार्य रहा होगा . सबसे बड़ी समस्या ,कहानी के प्रत्याशी नायक जग्गू की तरह ही , पात्रों की बड़ी भीड़ में से अपने पाठकों को, कथा-रस निर्वाह सहित, कहानी के अंत तक पहुँचाने की रही होगी –इन चुनौतियों को देखते हए , चुनाव जैसे सार्वजनीन वस्तु को कथा के विशेष में बदलने का उपक्रम निश्चय ही सराहनीय है . सिर्फ रोचक संवादों से बुनी गयी इस कहानी में शिवमूर्ति की संवाद-कला का सर्वोत्तम रूप देखा जा सकता है . इस कहानी के फैले-बिखरे वस्तु को देखते हुए शिवमूर्ति के कलात्मक संयोजन की सामर्थ्य भी अपने शिखर पर है . इस कहानी में सूचनाओं-प्रसंगों एवं वर्णनों तक को सिर्फ संवादों के माध्यम से ही गूंथा-पिरोया और प्रस्तुत किया गया है . छोटे-छोटे वाक्यों के कारण कहानी किसी लम्बी कविता की तरह लगती है . संरचना के धरातल पर देखें तो कथावस्तु की मांग के अनुरूप ही इस कहानी में पात्रों की भीड़ है ; चरित्रों का कोलाज है ; चुनावी गतिविधियों एवं जनसंपर्क के बहाने कथाकार का कैमरा जग्गू को केंद्र में रखकर प्रायः घूमता ही रहता है. जग्गू द्वारा जमीन बेचने के प्रसंग को तो उसकी तीन पीढ़ियों को एक साथ  जग्गू के पिता बदलू के स्वप्न के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है . समय के साथ जग्गू के दादा को मिला गड्ढा भी , मानों आधुनिकता और लोकतंत्र की सड़क निकलने के साथ बहुमूल्य हो गया हो . अब उसकी(दलित वर्ग ) जनसंख्यात्मक पूंजी पर, उसे कल तक हिकारत , उपेक्षा या व्यंग्य से देखने वाले अवसरवादी दबंगों की नजर है .
    इस कहानी में शिवमूर्ति नें भारतीय लोकतंत्र के अनेक दु:स्वप्नों को उकेरा है. शीर्षक के स्तर पर प्रतीकात्मक किन्तु संरचना के धरातल पर रूपकात्मक होते हुए भी पूरी कहानी भारतीय गांवों के जातीय समाज के अनुरूप उसके सम्वैधानिक लोकतांत्रिक आदर्शों के व्यावहारिक रूपांतरण का एक प्रमाणिक एवं बहुआयामी पाठ प्रस्तुत करती है . कहानी अपने वस्तु के प्राथमिक स्तर और उसमें व्यक्त यथार्थ ,चरित्र ,मानसिकता तथा ग्राम-प्रधानी के चुनाव से सम्बंधित नाटकीय घटनाक्रम का वर्तमानकालिक सजीव प्रसारण करती है . दलित राजनीतिक उभार नें ऊँची जातियों में दु:स्वप्न भर दिया है . इस मनोदशा की भी सांकेतिक अभिव्यक्ति ठाकुर के उस दु:स्वप्न के माध्यम से करायी गयी है – जिसमें ठाकुर के ही द्वारा प्रायोजित जग्गू एक ‘आक्रामक हाथी की नंगी पीठ पर बैठा हुआ ,आक्रमण की मुद्रा में उनकी ही ओर हाथी दौड़ाता चला आ रहा है . निचाट मैदान में वे अकेले भागे जा रहे हैं ,लेकिन पैर ही नहीं उठते !’ पीछे हाथी की चिग्घाड़ .” इस चित्रण को अपने ही द्वारा पोषित आतंकवाद रूपी हाथी से परेशान अमेरिका की समकालीन नियति से जोड़कर देखें -व्यंजनाधर्मी इस कहानी के हाथी को आतंकवाद और जग्गू को अमेरिका ही द्वारा वित्त-पोषित पाकिस्तान तथा गाँव के ठाकुर को विश्वग्राम के ठाकुर अमेरिका के रूप में देखने पर इस कहानी के कथा-प्रतीकों का वैश्विक संदर्भी अर्थ भी सही-सही खुलता है .
          चुनाव का परिणाम घोषित होते ही कथानायक जग्गू जगतनारायण से जे.एन.टाइगर हो जाता है . मजबूरी में ही सही दूसरों को समर्थन करने की लोकतान्त्रिक मजबूरी धीरे-धीरे ही सही एक स्वीकार्य सामाजिक नियति बनने लगती है .इसके बावजूद जाति-बोध भारतीय समाज का एक कटु-अप्रिय जीवित सच के रूप में सामने आता है. आरक्षित सीट पर अपने ही द्वारा प्रायोजित प्रत्याशी को जीत जाने पर ,उसके सत्ता का नया केंद्र बनते ही कहानी का परिदृश्य और जग्गू की हैसियत बदलती है . ठाकुर की यह अपेक्षा कि जीतने के बाद जग्गू सबसे पहले उसके ही दरवाजे पर आएगा पूरी नहीं होती .अब वह अपने मतदाताओं की सामूहिक इच्छा से संचालित होता है और किसी हारे हुए जुआड़ी की तरह ठाकुर को स्वयं चलकर भीड़ के बीच उसका सार्वजनिक अभिनन्दन करना पड़ता है . वह व्यक्तिगत जग्गू से, अपने ही चुनाव-प्रायोजक ठाकुर के नियंत्रण से बाहर निकलकर जगत का नारायण हो जाता है . परंपरा से अछूत माने जाने वाली जाति के हाथ का पानी पीकर सामंती अतीत और अकड़ की पृष्ठभूमि वाले ठाकुर को भी कमर लचकाते हुए नाचना पड़ता है . निश्चय ही यह भी इस कहानी का अत्यंत कलात्मक .सांकेतिक और प्रतीकात्मक अंत ही है .

      ‘कसाईबाड़ा’ ,’आखिरी छलांग’ ,’त्रिशूल’ और ‘तर्पण’ आदि कहानियों की तरह शिवमूर्ति की इस कहानी का भी वस्तु-फलक काफी विस्तृत है . ‘कसाईबाड़ा’ कहानी  की तरह राजनीति–केन्द्रित एवं सार्वजानिक यथार्थ को कथा-विषय बनाने वाली होने के बावजूद, यह कहानी अभिव्यक्ति के अभिधा, लक्षणा और व्यंजना जैसे अनेक स्तरों पर पढ़ी जा सकती है . शिवमूर्ति कलात्मक स्तर पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों आयामों में कथा को रचने वाले कथाकार हैं .पहली दृष्टि  में ग्राम-प्रधान के चुनाव को कथा-विषय बनाने वाली इस कहानी को पढ़ना, शैवाल ढँकी किसी गहरी झील में जाल डालने जैसा है . प्रथम द्रष्ट्या यह कहानी भारत के जातीय लोकतंत्र का ही पाठ बनती दीखती है; लेकिन कहानी का शीर्षक, कथा-वस्तु और कथा-रस से अलग भी अपने गूढ़ सांकेतिक-निहितार्थों-सम्प्रेष्यों के साथ पाठकीय यात्रा को विचारशीलता में जारी रखने की मांग पाठक से करता है .
       वस्तुतः व्यंग्यार्थ एवं प्रतीकार्थ में ही सही ‘बनाना रिपब्लिक’ कहानी का शीर्षक, दक्षिणी अमेरिका के बनाना रिपब्लिक कहे जाने वाले छोटे-छोटे देशों (गणतंत्रों ) से लिया गया है ,जहाँ के चुनाव को बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ अपने –अपने अर्थ-बल से प्रभावित–संचालित करती रही हैं . अपने समर्थक प्रत्याशियों का चुनाव प्रायोजित कर उनका चुना जाना सुनिश्चित करती रही हैं . अपने प्रत्याशी के विजेता होने के बाद वे ईस्ट इण्डिया कंपनी की ही तर्ज पर , अपनी शर्तों पर खुलकर अपना व्यापार चलाती रही हैं. सूचनार्थ यह उल्लेखनीय है कि सबसे पहले ‘बनाना रिपब्लिक’ शब्दावली का प्रयोग प्रसिद्ध अमेरिकी कथाकार ‘ओ हेनरी’ द्वारा किया गया था . इस शब्दावली का प्रयोग आजकल ग्वाटेमाला, होंडुरास जैसे मध्य अमेरिकी तथा  लैटिन अमेरिकी देशों के लिए प्रचलित है –राजनीतिक रूप से ‘बनाना रिपब्लिक’ देशों की मुख्य विशेषता, व्यापक राजनीतिक अस्थिरता एवं दासता रही है . कैरेबियाई द्वीपों में अपनी चतुराई से इन छोटे-छोटे देशों से अपने-अपने आर्थिक ताकत से राजनीतिक ताकत का अधिग्रहण कर , एकाधिकार रूप में कौड़ियों के मोल मजदूरों को लगाकर प्रायोजक कम्पनियाँ भारी मुनाफा कमाती हैं .
       वैसे तो  शिवमूर्ति की प्रायः सभी कहानियां अपने समय के यथार्थ को अधिकतम लोक-संवेदना एवं इतिहास-बोध के साथ कथांकित करती है; लेकिन वैश्वीकरण और भूमंडलीकरण के दौर में लिखी गयी यह कहानी भी उसकी दोहरी प्रक्रिया के अनुरूप ही एक साथ ही स्थानीय और वैश्विक है . जब कथाकार नें इस कहानी के शीर्षक को प्रतीक में बदल कर रूपक घोषित कर ही दिया है, तो गाँव के ठाकुर में वैश्विक गाँव के दादा अमेरिका का चेहरा भी साफ-साफ देखा जा सकता है . यद्यपि जग्गू के  राजनीतिक उभार को बहुत दूर तक भारतीय दलित राजनीति और उसके उभार के अनुरूप ही पूरी प्रामाणिकता के साथ चित्रित किया गया है; लेकिन कहानी के शीर्षक की अतिव्याप्ति पाठक से जग्गू को भी प्रतीक मानने की मांग करती है . अमेरिका के पूंजीवादी शोषक महातंत्र के आगे यानि उसकी वैश्विक ठकुराई के आगे तो अन्य सामान्य देशों की हैसियत महागांव के दलित की ही है . देश के पिछले आम चुनाव में उसकी प्रायोजक भूमिका के कयास देश के प्रबुद्ध बुद्धिधर्मी  लगाते ही रहे हैं , लेकिन भारतीय पूंजीवाद के विकास के वर्तमान दौर में अमेरिका को भी एक वाद या प्रवृत्ति के रूप में ही देखना होगा . अब तो भारतीय पूजीवाद भी  इतना आत्मनिर्भर हो गया है कि अब उसे अमेरिकी धन की जरुरत भी शायद ही हो . अब तो एक प्रवृत्ति और समझ के रूप में ‘भारतीय-अमरीकी’ ही  राष्ट्रीय इतिहास का परिचालन कर रहे हैं . यद्यपि अपने अभिधार्थ में अवश्य ही कुछ लोगों को यह कहानी बसपा युग के दलित उभार की कहानी लग सकती है लेकिन इस कहानी का वास्तविक व्यंग्यार्थ या  अभिव्यंजना का वृत्त वैश्विक गाँव की कथा के रूप में ही पूरा होता है .
       इस कहानी में शिवमूर्ति की सधी कलम चुनाव के तनावपूर्ण तथा सामाजिक रूप से सर्वाधिक सृजनशील-गतिशील  सामूहिक मानवीय समय का अत्यंत सजीव वर्णन करती है . वे आवश्यक ड्यूटी के नाम पर दुधमुहें बच्चे के साथ ड्यूटी निभाती महिला सरकारी कर्मचारी की निरीहता दिखाने से भी नहीं चूकते और इस सूत्र को देने से भी कि ‘’ब्राह्मणों की महिमा इस कलयुग में महाजनों के बल पर ही टिकी है .’’ कि “एजेंट फर्जी वोट चलेंज करने के साथ-साथ स्वयं फर्जी वोट डलवाने के तरीके और अवसर तलाशते रहते हैं .” “पीठासीन अधिकारी का सरनेम नहीं पता लगा रहा है कैसे पटाया जाय !” कि “यह भी प्रयास है कि जो लड़कियाँ ससुराल में हैं ,जो बहुएँ मायके में हैं ,जो लोग परदेश में हैं , किसी का भी वोट छूटना नहीं चाहिए .” शिवमूर्ति सरकारी कर्मचारी को भी इसमें सहयोग करते दिखाते हैं , जैसे वह इससे सहमत हो कि मत व्यक्तिगत और अहस्तांतरित होने वाला नहीं, बल्कि पारिवारिक या सामूहिक होता है . वोट के मूल्यन और अवमूल्यन के लिए तरह-तरह के तर्क कि ‘वोट का क्या अचार डालना है !’ महिला उम्मीदवार फुलझरिया के प्रायोजित चरित्र-हनन का प्रसंग भी इस कहानी में है ; जिसमे प्रायोजित गवाहों द्वारा बिना वास्तविक घटना के भी घटना घटने का प्रवाद फैलाया जाता है .कहानी में पहले से सधे–बंधे लोग फुलझरिया और शंकर को घेरकर हल्ला मचाते हैं और फिर औरतों के प्रवादी संवाद –“बड़ी छत्तीसी औरत निकली गुइयाँ .. कहाँ चालीस-पैंतालिस की फुलझरिया और कहाँ बीस-बाईस का शंकरवा ! दूने की चोट ! माई रे !” “इस्कीम भले पदारथ नें बनाई लेकिन बदनामी फ़ैलाने में ठाकुर के आदमी भी जुट गए हैं .” एक प्रासंगिक(स्वरचित ) लोकगीत –‘कटे द्या गोस रोटी ...आवै द्या शराब’ भी है . सरकारी योजनाओं के आर्थिक अपहरण के ठोस प्रमाण भी हैं – ‘सौ का सौ परसेंट हजम कर जाने वाला पूर्व प्रधान ,जो अपने हटने के बाद भी किसी उपनिवेश की तरह गांव की सत्ता पर अपना वर्चस्व यथावत् बनाए रखना चाहता है ,ताकि उसके घोटालों की पोल न  खुल सके ! गाँव की पंचायती सत्ता भी शोषण का अद्यतन व्यवस्थित तंत्र बन गयी है .
      जातिवाद भारतीय जातीय सामंतवाद तथा उसकी भौगोलिक तथा जनसंख्यात्मक परिस्थितियों की विशेष सृष्टि है . इसे प्राचीन भारतीय पूंजीवाद के विशिष्ट उत्पाद के रूप में भी देखा जा सकता है. जातीय भोज के प्रसंग में जातिवादी मानसिकता और उसकी लोकतंत्र विरोधी आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति का अवसर शिवमूर्ति खिलाने –पिलाने के कार्यक्रम में निकाल ही लेते हैं . जातिवाद यानि इस लोकतांत्रिक देश का सबसे अश्लील , अमानवीय और असंवैधानिक सच ! जातीय सामंतवाद का प्रेत अब भी पुनर्जन्म और पुनर्जागरण की कुत्सित आकांक्षा के साथ जातीय समुदायों में हिलोरे मारता है . शराबखोरी के अर्धचेतन क्षणों में सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक सत्ता की प्राप्ति के पक्ष में यह जातीय सामूहिक मन क्लेप्टोक्रेसी के आपराधिक दिवा-दु :स्वप्न तक भी जाता है-“कलयुग के आखिरी चरण में एक दिन ऐसा आएगा जब एमपी–एमेले की सारी सीटों पर खूनी–कतली लोगों का कब्ज़ा हो जाएगा . तब सब मिलकर देसवा का बंटवारा करेगे .उस बंटवारे में हम लोगों को भी हिस्सा मिलेगा .”
इस तरह ‘बनाना रिपब्लिक’ कहानी कथाकार के  शोधपूर्ण वैचारिक निवेश द्वारा अपने पाठकों को आश्वस्त करती है कि भारत की दलित-पिछड़ी निरक्षर या कम पढ़ी -लिखी जनता, इस देश के लोकतंत्र को थैलीशाहों,सामंतों या माफियाओं द्वारा क्लेप्टोक्रेसी या ‘बनाना रिपब्लिक’ में बदलने के कुचक्र को सफल नहीं होने देंगी .
     शिवमूर्ति वर्जित  या यह कहें कि अब तक अकथित ,विरल , प्रतिबंधित एवं अछूते कथा-प्रसंगों के अद्भुत किस्सागो हैं . आसान और कम शब्दों में उन्हें प्रतिबंधित यथार्थ का किस्सागो  कहा जा सकता है . उनकी सबसे प्रसिद्ध कहानी ‘कसाईबाड़ा’ तो अभिव्यक्ति पर ऐतिहासिक प्रतिबंधों के सबसे काले दौर आपातकाल की ही उपज है . असहिष्णु अनैतिक सत्ता के विरुद्ध दुस्साहसिक अभिव्यक्ति का यह कलात्मक अनुभव  उनकी कई अन्य कहानियों में जैसे ‘त्रिशूल’, आखिरी छलांग’,बनाना रिपब्लिक’ आदि में अकथ के सामाजिक,सांस्कृतिक ,सांप्रदायिक वर्जनाओं का अतिक्रमण संभव बनाता है. अस्वीकार्य यथार्थ का हास्यात्मक आरेखन करती उनकी कई कहानियां राजनीति के सामाजिक - सांस्कृतिक विद्रूपीकरण का पुनःपाठ  प्रस्तुत करती हैं .
           अभिव्यक्ति के जोखिम एवं वर्जनाओं के अनुरूप शिवमूर्ति का कथाकार जानबूझकर अपने पाठकों के लिए अनेक ऐसे कलात्मक दृष्टि-भ्रम प्रायोजित करता रहता है ; जिनका अतिक्रमण प्रायः कथाकार की योजना-अनुसार ही कहानी के अंत तक पहुंचते-पहुंचते एक आकस्मिक संवेदनात्मक कौंध या फिर मोह-भंग के रूप में पाठक कर पाता है . अपनी कथा-प्रविधि के रूप में शिवमूर्ति पूरी परम्परा से कभी भी, कुछ भी ले सकते हैं . आधुनिक मनोविज्ञान से लेकर प्रेमचंदपूर्व की कहानियों की नाटकीयता,प्रेमचंद की कहानियों में प्रायः मिलने वाला घटना-कौतुक ,रेणु की आंचलिकता , मोहन राकेश की कहानियों में मिलने वाली वर्णन की तटस्थता तथा निर्मल वर्मा की कहानियों में मिलने वाली सांगीतिक दृश्य-वर्णन की काव्यात्मक सजीवता  के साथ नयी कहानी-पूर्व का चरमोत्कर्ष विधान सब कुछ एक बार फिर लौट आता है शिवमूर्ति की कहानियों में . अपने निजी जीवन के अनुभवों और चिंतन को ही कथा-रूप में रूपांतरित करने के कारण शिवमूर्ति की अधिकांश कहानियाँ उनके व्यक्तिगत सच का कथात्मक रूपांतरण मात्र हैं . उनकी कई कहानियों के कथा-सूत्र तो उनके आत्म-कथ्य में ही देखे जा सकते हैं - जैसे ‘सिरी उपमा जोग’ , केसर-कस्तूरी’ ,भरतनाट्यम’ ,ख्वाजा !ओ मेरे पीर’आदि . 'त्रिशूल’ कहानी के नायक को तो अपने घर के अन्तेवासी महमूद को ही सामायिक परिस्थितियों से कलात्मक फ्यूजनकराकर कथालोक में पहुंचा दिया गया है . यह एक संयोग नहीं है कि शिवमूर्ति की पहचान बनने वाली ये सभी मर्मस्पर्शी एवं संवेदनाधर्मी कहानियां मैंशैली में ही हैं . शिवमूर्ति के साथ संवेदनात्मक विश्वसनीयता का संकट नहीं है. उनकी कुछ कहानियां तो उनके निजी जीवन के अनुभवों से इतनी एकाकार हैं कि वे शिवमूर्ति की आत्मकथा न समझ ली जाएँ इसके लिए उन्हें कथात्मक युक्ति तलाशनी पड़ी है . उदहारण के लिए ‘भरतनाट्यम’ कहानी के नायक की पत्नी यदि कहानी के अंत में भाग न जाती तो बहुत से पाठक यही सोचने लगते कि उसकी नायिका का कुछ न कुछ सम्बन्ध शिवमूर्ति जी के पत्नी के चरित्र से भी हो सकता है . यद्यपि यह सच है कि कथा-नायक की बेरोजगारी और स्वयं शिवमूर्ति की बेरोजगारी की परिस्थितियां वास्तविक हैं ; लेकिन जो अपने जीवन में नहीं घटा  है-उन संभावनाओं के चिंतन ने ही ऐसी अविस्मरणीय कहानी रच दी है . ‘सिरी उपमा जोग’  का यथार्थ भी स्वानुभूत ही है ,लेकिन जो अपनी जिंदगी में करने से बचे हैं और दूसरों को उन्ही परिस्थतियों में वैसा करते देखा है -उसे ही उन्होंने कहानी का रूप दे दिया है .
          इससे फायदा यह हुआ है कि वे बहुत कुछ ऐसा कह पाए हैं जैसा कहने की हिम्मत उनके पूर्ववर्ती कथाकारों में नहीं थी ; लेकिन इससे नुकसान यह हुआ है कि अत्यंत ही लोकप्रिय या बहुत पढ़े जाने के बावजूद वे कुछ अनिक्छुओं द्वारा आंचलिक आस्वादधर्मिता के साथ लिखने वाले रोचक लेखक मान लिए गए हैं . ऐसा संभवतः व्यंग्य ,हास्य और नाटकीयता की कलात्मक भंगिमा के कारण भी हुआ है . उनकी कहानियां किसी हास्यात्मक मूर्खता की तरह जीवन की गंभीर से गंभीर त्रासदी का भी मजाक उडाती चलती हैं- अँधेरे का सबसे अधिक कथा-बिम्बन करने वाले इस कथाकार की कई कहानियों में जैसे भारतेंदु हरिश्चंद के विख्यात प्रहसन अंधेर नगरी की आत्मा समाई हुई है . उनमें एक साथ ही बेबसी, घृणा और आक्रोश है . दमित शोषित भारतीय जनता की निरीहता , अशक्तता और अस्वीकार को वे करुणा और आक्रोश के मिश्रित रसायनों से चित्रांकित करते हैं . चाहे ‘भरत-नाट्यम’ हो  या ‘अकालदण्ड’ - उनकी कहानियां पाठकीय अतिक्रमण और निष्क्रमण को प्रहसन के शिल्प में प्रस्तुत कर, संभव करती हैं .प्रेमचंद्र की तरह ही शिवमूर्ति का भी कथाकार साहित्य की गैर राजनीतिक पृष्ठभूमि पर एक सामाजिक विमर्शकार और क्रांतिकारी की भूमिका में है. उनकी कई कहानियां समाज के नकारात्मक राजनीतिकरण तथा अतीतगामी  यथास्थितिवादी मानसिक समूहों की सक्रिय उपस्थिति की गहन पड़ताल और पहचान प्रस्तुत करती हैं-ऐसे समूहों की- जो अपने नैतिक औचित्य-अनौचित्य की परवाह किए बिना, किसी फरार अपराधी की तरह दूसरों के मानवाधिकारों की हत्या करते हुए भी स्वयं को वर्चस्व एवं अधिकार में बनाए रखना चाहती हैं .
          सामाजिक और साहित्यिक इतिहास की समानांतरता में देखें तो  मुक्तिबोध के अभिव्यक्ति-संघर्ष की तरह शिवमूर्ति का भी साहसिक अभिव्यक्ति-संघर्ष देखा जा सकता है . उनकी कला और कलाकार, अभिव्यक्ति की आजादी पर तमाम प्रतिबंधों के बावजूद अभिव्यक्ति के नए रास्तों की तलाश का जोखिम पसंद करता है . कथन में मुद्राओं का चमत्कारिक एवं नाटकीय हेर-फेर उन्हें प्रिय है . वे गंभीर बातों को हास्यात्मक बनाकर और अपनी निज की अन्वेषित व्यंग्यात्मक शैली में गंम्भीरतम बातों को प्रस्तुत करते रहते हैं . सिर्फ उनकी ही कहानियों में ऐसा हुआ है और हो सकता है कि जो कहानी चूहे के बारे में सुनाई जा रही हो वह वास्तव में हाथी के बारे में हो . ठीक वैसे ही , जैसे ‘कसाईबाड़ा’ कथावस्तु के भीतर एक गाँव है , शीर्षक के स्तर पर एक देशव्यापी प्रतीक  तथा कहानी के स्तर पर एक कथात्मक रूपक .
               शिवमूर्ति पाठकों के मनोरंजन एवं कहानी की पठनीयता बनाए रखने की सृजनात्मक चिंता ,जीवन और समाज से सीधे उठा ली गयी अवधी अंचल के लोक की टटकी भाषा की प्रस्तुति करते हुए भी अपने समय के वास्तविक वर्तमान से असंतुष्ट लेखक हैं . उनके लेखक का सामाजिक और क्रन्तिकारी विमर्शकार रूप लोगों को हंसाते-गुदगुदाते हुए भी, अपने क्रांतिधर्मी आक्रोश को ताश के जरुरी पत्तों की तरह कहानी के अंत तक बचाए हुए चलता रहता है .
             शिवमूर्ति की अधिकांश कहानियां जीवन और समाज की किसी न किसी महत्वपूर्ण समस्या पर लोक-विमर्श का एक समानांतर एवं गंभीर पाठ प्रस्तुत करती चलती हैं . लोक-बोध का एक ऐसा अदृश्य प्रवाह जो आसान शब्दों ,बोलचाल के मुहावरों तथा लोकोक्तियों-मिथकों के सहारे चल रहा होता है और कभी-कभी आम-चुनावों के परिणाम घोषित होने के अवसर पर लोगों को चौंका भी देता है-वैसा ही कुछ !
       हिंदी का कोई भी अन्य कथाकार गौण एवं अवांतर कथा-प्रसंगों की सर्जना करते हुए मुख्य कथावस्तु एवं कहानी के केन्द्रीय चरित्रों पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर इतना गंभीर ,सजग और सुनियोजित रूप से तत्पर नहीं होगा जितना कि शिवमूर्ति . उनका यह रचनात्मक प्रयास कुछ-कुछ वैसा ही है ,जैसा कि प्रकृति में किसी ऊँचे पहाड़ का होना –जो प्रायः अगल -बगल की भारी कटान से बनी गहरी घाटियों के कारण ही संभव हुआ होता है.  जब हम गहराई में खड़े होकर उसके विलोम अनुपात में ही ऊँचाई की प्रतीति और मूल्यांकन करते हैं . ‘अकालदण्ड’  कहानी की सुरजी के चरित्र का नैतिक-निखार वे विधवा गुलाबो, सहुआइन और सरजूपारी चाची जैसे चरित्रों की पार्श्व उपस्थिति या सर्जना द्वारा संभव करते हैं तो 'सिरी उपमा जोग’ में प्रत्यक्षतः अनुपस्थिति रहकर भी पाठक के मन-मस्तिष्क पर छा जाने वाली , त्याग और सज्जनता की प्रतिमूर्ति नायक की पत्नी का प्रतिकारविहीन एकपक्षीय मूक समर्पण ही पाठक के भीतर नायक के प्रति संचित घृणा के रूप में कथा-नायक के खलत्व में सीमाहीन प्रभाव-वृद्धि करता है . अपनी मार्मिकता के कारण ही शिवमूर्ति की अधिकांश कहानियां कहानी से वांछित प्रयोजनात्मक वर्जनाओं को संवेदना के धरातल पर शत प्रतिशत घटित करनें में सफल हैं .
          इसमें संदेह नहीं कि शिवमूर्ति कथा-तकनीकों के जादूगर हैं . संवेदनात्मक और संवेगात्मक प्रभाव-वृद्धि के लिए उन्होंने अपनी अलग-अलग कहानियों में अलग-अलग तकनीक का प्रयोग किया है . शिवमूर्ति के पास कहानी कहने का ही नहीं, बल्कि कहानी बुनने का भी बिलकुल अलग अंदाज और कला-कौशल है . उनकी कहानियो के चरित्र और शिल्प का निजी अंदाज है . सिर्फ 'सिरी उपमा जोग 'तथा 'ख्वाजा !ओ मेरे पीर 'को छोड़ कर, जिसमें अतीत का पुनर्कथन या स्मृति आधारित वक्तव्य-शिल्प का प्रयोग किया गया है तथा आंशिक रूप से कसाईबाड़ा’  और  अकालदण्डजैसी कुछ कहानियों को छोड़ कर शिवमूर्ति की अधिकांश कहानियों की कथन-भंगिमा आँखों-देखा हाल सुनाने की ही है . वे जीवंत वर्तमान कालिक प्रस्तुति के सिद्धहस्त कथाकार हैं . यह विशेषता भी उन्हें प्रेमचंद और रेणु की लोकप्रिय कथा-तकनीक से जोड़ती है . शिवमूर्ति की तुलना रेणु से करते हुए जब उन्हें मिथिला की जगह अवधी अंचल के आंचलिक कथाकार के रूप में देखा जाता है तो सिर्फ इतना ही व्यंजित होता है कि हिदी-पाठकों और आलोचकों को शिवमूर्ति के कथाकार की ऊँचाई और अवदान की समानता रेणु की प्रतिष्ठा से करने में कोई आपत्ति नहीं है . शिवमूर्ति के बारे में यह सर्वसम्मति से यह मान  लिया गया है कि वे अवधी आंचलिकता के कथाकार और दूसरे रेणु हैं . उनके पाठकों और आलोचकों की इस सम्मान-भावना का मैं सम्मान करता हूँ . मेरी आपत्ति इस पर नहीं है - मेरी दृष्टि में दोनों कथाकारों का भिन्न ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य और विशिष्टता को लेकर उनकी मौलिक निजता मूल्याङ्कन के आधार के लिए अधिक महत्वपूर्ण है . मेरी आपत्ति रेणु के अवदान को लेकर उस प्रचलित समझ पर भी है जो कि शिवमूर्ति के साथ-साथ रेणु के भी साहित्यिक अवदान को सही -सही समझने में असमर्थ है .ऐसी दृष्टि रेणु के ऐतिहासिक अवदान को सिर्फ आंचलिकता तक समेट कर उनका भी अवमूल्यन ही करती है  . यह एक आलोचनात्मक सरलीकरण ही है . रेणु की आंचलिकता में भी मुद्रा-आधारित अमानवीय शहरी जीवन-बोध का व्यापक अस्वीकार छिपा हुआ है . रेणु का आंचलिक साहित्य संवेदनशून्य ,मुद्रा-आधारित यांत्रिक ,अर्थग्रस्त धन-पशुओं को निर्मित करने वाली;विसंगति, विडम्बना और अलगाव-बोध की शिकार शहरी बाजारू सभ्यता का समानांतर प्रतिरोधी पुनः पाठ वस्तु-विनिमय और श्रम-सहयोग आधारित सर्वपोषी जिस उदात्त किसान-संवेदना से करती हैं -उसे  आंचलिकता को किसी बाह्य अलंकार की तरह सिर्फ शोभा- कारक  कला-मूल्य मानकर देखने वाले नहीं देख पाते . रेणु की चाहे 'तीसरी कसम' कहानी हो या फिर 'लाल-पान की बेगम ',शहर और बाजार की क्रय-विक्रयवादी  मानसिकता से अपरिचित - सभी को रागात्मक आत्मीयता तथा सहजीवी समानता की सम्मान-भावना से देखने वाली किसान-सभ्यता ,संवेदना और मूल्य-दृष्टि ही रेणु-साहित्य का केन्द्रीय संप्रेष्य है . यह सच है कि आंचलिकता के साथ-साथ शिवमूर्ति के मानवतावाद का पक्ष और आधार भी किसान-संवेदना ही है ,लेकिन हिंदी के इन दोनों ही सर्वाधिक लोकप्रिय कथाकारों की भिन्न ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और चुनौतियां एक नहीं हैं . आजादी के तुरंत बाद का आशावाद रेणु -साहित्य को उत्सवधर्मी उत्फुल्लता देता है जबकि आपातकाल कि समवर्ती मोहभंग की चेतना शिवमूर्ति के कथा-साहित्य को व्यंग्यधर्मी बनाती है . अपने समकालीनों और पूर्ववर्तियों के सापेक्ष शिवमूर्ति के कथाकार  का प्रतिभ अतिक्रमण तथा उनकी अनावर्ती पूरक मौलिकता के वैशिष्ट्य बिदु वास्तव में उनके उन सामाजिक-राजनीतिक पर्यवेक्षणों में छिपे हैं जो ही उन्हें  परिवर्तनकामी , हस्तक्षेपकारी सृजन-शक्ति से सम्पन्न कथाकार बनाती हैं.
       शिवमूर्ति के कथाकार का मूल्याङ्कन करते हुए हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हिंदी जगत में अपनी जिस 'कसाईबाड़ा' कहानी को लेकर शिवमूर्ति को अभूतपूर्व ख्याति मिली थी ,उस कहानी नें आठवें दशक की समाप्ति और नवें दशक के आरम्भ के समकाल में व्याप्त भारतीय जन-मानस की आपातकालीन कुंठित-दमित अभिव्यक्तिहीनता को विद्युत्-कौंध के समान ही सब कुछ को बिना किसी लाग-लपेट के सही-सही व्यक्त कर देने वाली कथा-भाषा मिली थी . रेणु के सकारात्मक उत्सवधर्मी  उस आशाजन्य प्रमुदित कथालोक से अलग , संपूर्ण मोहभंग और निर्मम मुक्ति का सुख - जो दीर्घकालीन अवसाद के बाद सहसा भारतीय जनमानस में चिढ़-उपहास और व्यंग्यबोध के साथ स्वातंत्रयोत्तर नवजागरण के रूप में संपूर्ण क्रान्ति के मुक्ति-संवेगों को साहित्यिक अभिव्यक्ति देता है . इसतरह इतिहास की  समकालीनता की दृष्टि से शिवमूर्ति जयप्रकाश नारायण और जनता पार्टी के उभार तथा भारतीय जन-चेतना में व्याप्त तत्कालीन प्रतिरोध-भावना के सबसे प्रमाणिक एवं मर्मस्पर्शी भाष्यकर्ता कथाकार हैं . 'सबसे' का प्रयोग मैं इस आधार पर का रहा हूँ कि उदयप्रकाश की उसी दौर की प्रसिद्ध कहानी 'टेपचू ' कहानी का जादुई यथार्थवाद ,टेपचू के चरित्र की प्रतीकात्मकता तथा संजीव की कहानी “अपराध “की महाकाव्यात्मक सांगरुपकता से अलग शिवमूर्ति की कहानी “कसाईबाड़ा “में मार्मिक प्रसंगों की सघन एवं बहुआयामी बारंबारता है – यथार्थ की आवर्ती एवं गहन अन्वेषी प्रस्तुति , उसका प्रतिनिधिक नाटकीय रूपायन शिवमूर्ति की ‘कसाईबाड़ा ‘ कहानी को अविश्वसनीय व्याप्ति देता है .इसका कारण मुझे यह लगता है कि अपने समकालीनों में शिवमूर्ति सबसे कम मोहाच्छन्न और मुक्तिचेता कथाकार है . उनका कलाकार सहानुभूति और वर्गांतरण की बौद्धिक अंतर्ग्रस्तता और दोहरेपन से मुक्त है . भारतीय जन-संवेदना की सबसे अभिन्न ,आत्मीय एवं प्रतिनिधि अभिव्यक्ति उनके कथाकार में मिलती है .
        शिवमूर्ति को पढ़ते हुए लोगों को रेणु की आस्वद्धार्मिता की याद आती है तो उसका आधार ‘सिरी उपमा जोग’ ,'केशर कस्तूरी ' और ख्वाजा !ओ मेरे पीर ' जैसी संवेदनाधर्मी , मार्मिक तथा वास्तविक जीवन को ही कथारूप प्रदान करने वाली अविस्मरणीय  कहानियां ही हैं . शिवमूर्ति की बिम्बधर्मी काव्यात्मक भाषा के बावजूद इन कहानियों की ख्याति का आधार उनकी आंचलिकता नहीं, बल्कि मार्मिक और विचलित कर देने वाली विश्वसनीयता है . रिपोर्ताज शैली होने के कारण आंचलिकता का एक कलात्मक वैशिष्ट्य के रूप में प्रयोग उनकी अकालदण्डऔर 'तिरियाचरित्तर ' जैसी कहानियों में चरमोत्कर्ष पर है ; लेकिन रेणु के कथाकार  जैसी मुक्त -मन यायावरी की जगह शिवमूर्ति में निरीक्षण की एक विरल सूक्ष्मता और सजगता मिलती है . उनका दृष्टिकार अब तक वर्जित अकथ को भी कथनीय बनाने की नयी से नयी युक्तियाँ और अवसर खोजता रहता है . वे जीवन की उन सच्चाइयों को भी कथा में ले आना चाहते हैं जिसकी ओर अभी तक किसी का ध्यान न गया हो . तिरियाचरित्तर की विमली के चतुर्दिक कामुकता और अश्लीलता के परिवेश वाला समाजव्यापी पुरुषचरित्तर हो या या ख्वाजा  ! ओ मेरे पीर का के मामा और मामी का असामान्य दांपत्य और समायोजी अभिसारी यौन-सम्बन्ध - जीवन के गोताखोर की तरह किसी भी गोते में वे कुछ भी ऐसा छोड़ना नहीं चाहते जो देखने से रह जाय .
     शिवमूर्ति की प्रभावशीलता का एक कारण यह भी है कि वे प्रायः अपने जिए हुए या अनुभूत का ही कथात्मक रूपांतरण प्रस्तुत करते हैं  . उनके आत्मकथ्य और जीवन में ‘ख्वाजा ! ओ मेरे पीर ' आदि कहानियों के बहुत से अंश उनकी निजी जिंदगी और पारिवारिक पृष्ठभूमि से मिलते हैं . त्रिशूलका महमूद तो अपने घर में रहने वाले जीवन-चरित्र का ही कथा-चरित्र में रूपांतरण है . योग्य निर्धन प्रतिभाओं को पहचान कर उन्हें उच्च-शिखर तक पहुचने जैसे गुप्त सहायता कार्यक्रम भी शिवमूर्ति अपने वास्तविक जीवन में भी चलाते ही रहते थे . संवेदनात्मक संकोच का निर्वाह  ही रहा होगा कि ऐसे संस्मरणों की चर्चा करने या उपयोग करने से सायास बचे हैं .
     शिवमूर्ति की कहानी कसाईबाड़ा’  को पढ़ते हुए मुक्तिबोध की लंबी कविता ‘अँधेरे में’ की याद अनायास ही नहीं आती और उसमें भी वह अंश आकर आँखों के सामने ठहर जाता है .-‘हाय-हाय! मैंने उन्हें देख लिया है नंगा /इसकी मुझे कड़ी सजा मिलेगी’ . अंतर बस यही है कि ‘अँधेरे में’ कविता में यह सजा  जहाँ उसके काव्यनायक 'मैं ' को मिलने वाली है ,वहीं 'कसाईबाड़ा ' में 'सनीचरी 'को मिलती है . दहेज़ रहित सामूहिक विवाह के नाम पर उसकी बेटी रूपमती को वेश्यावृत्ति के लिए बेच देने वाले ग्राम-प्रधान और उसकी पत्नी के अन्तिम आश्वासन में अनशन तोड़ने के नाम पर जहर मिला दूध पीकर हमेशा के लिए दम तोड़ देती है . सनीचरी की हत्या के बाद पुलिस द्वारा पोस्टमार्टम जैसे कानूनी रूप से आवश्यक अन्त्य-कर्म के लिए भी जिस प्रकार औपचारिकता निर्वाह के लिए भी राज्य-तंत्र का आगमन नहीं होता - वह आम हिंदी फिल्मों जैसा नाटकीय और अविश्वसनीय होते हुए भी तत्कालीन यथार्थ  की कलात्मक एवं नाट्य-रूपकात्मक प्रस्तुत की दृष्टि से  महत्वपूर्ण है .  इस प्रायोजन द्वारा जैसे कहानीकार कहना चाहता हो कि सनीचरीवर्त्तमान राज्य-तंत्र के लिए नेपथ्य की या अवांछित उपस्थिति है , जिसकी मृत्यु की सूचना पाना भी उसके लिए जरुरी नहीं है .
        आपातकाल की ऐतिहासिक  पृष्ठभूमि में सृजित शिवमूर्ति की कसाईबाड़ाकहानी की अँधेरी रात इतनी बहुआवर्ती ,अर्थगर्भी  एवं सांकेतिक है कि उसके निहितार्थों से ही तत्कालीन आपातकालीन ऐतिहासिक समय के केन्द्रीय चरित्र  का सम्पूर्णता में साक्षात्कार संभव है . कसाईबाड़ाकहानी में जब सुगनी अर्द्ध-रात्रि के सघन अन्धकार में सामूहिक शादी के नाम पर  गाँव की कई लड़कियों को बेच दिए जाने तथा बदमाशों द्वारा आतंककारी  रूप में अपना पीछा किए जाने की सूचना देकर गायब हो जाती है तो आशंकाओं का अन्धकार तथा रहस्य और गहरा हो जाता है . कहानीकार सुगनी के किसी अपराधियों के गिरोह द्वारा  अपहरण कर लिए जाने की आशंका और कल्पना का कार्य पूरी तरह पाठकों पर ही छोड़ देता है .
           छोटी -छोटी बिम्बात्मक ,संकेतधर्मी नाटकीय प्रस्तुतियां काव्यात्मक संवेदनधर्मिता के साथ पाठकों की कल्पना को उत्तेजित करती हुई चलती हैं और आपातकालीन भारतीय सत्ता और समाज की संपूर्ण आपराधिक , अनैतिक , निरंकुश भयावहता का जीवंत संवेगात्मक अनुभव-संसार शिवमूर्ति की  जीवंत वर्णन-कला द्वारा चेतन-अचेतन सभी स्तरों पर साहित्य के इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज हो जाता है . कहानी के बीच के अंशों में जनता की अबोधता और अज्ञानता का अन्धकार है , जिसे शिवमूर्ति नें व्यंग्य,घृणा आक्रोश और उपहास के मिले-जुले शिल्प में चित्रित किया है . अंग्रेजी का लूप शब्द मानों अशिक्षित लोकचेतना के अन्धकार में पहुंचकर संस्कृत के लुप्त तत्सम शब्द का तद्भव अपभ्रंश "लुप्प ' हो जाता है . जहाँ भारतीय लोकतंत्र और उसकी जनता, आपराधिक और शातिर तंत्र-विशेषज्ञ  सत्ता-पक्ष और तंत्र-अज्ञ शासित जनता में बदल जाता है . अनैतिक तंत्र -विशेषज्ञों द्वारा  अपहृत सत्ता का तंत्र उसे लोकतंत्र की अवधारणा से अलग  शोषक और शोषित  तथा शासक और शासित में ही नहीं  बल्कि शिकार और शिकारी में बदल देता है . इस दृष्टि से ‘कसाईबाड़ा’ के फैंटेसी-चरित्र  अधरंगी की यह व्यंग्यात्मक टिप्पणी अत्यंत ही संकेताधर्मी और अर्थगर्भी है -"आदमी का शिकार करके पेट नहीं भरा तो चिरई का शिकार करके नहीं भरेगा दरोगा बाबू !" कथाकार नें तत्कालीन व्यवस्था पर इसतरह की अनेक साहसिक अभिव्यक्तियों के लिए  अर्द्धविक्षिप्त फैंटेसी चरित्र अधरंगी की सर्जना की है .कसाईबाड़ाकहानी की कथावस्तु और चरित्रों  में रूपकात्मक , प्रतीकात्मक तथा फैंटेसी-कथा  होने की कलात्मक संभावनाएं ऐसी ही चरित्र-सृष्टि द्वारा कथाकार शिवमूर्ति नें पैदा की है .सिर्फ कथानक ही नहीं, यहाँ तक कि उसका नाम तक एक निर्मम हत्यारे कारागार का आभासी प्रतिसंसार रचने वाला एक अर्थ-गर्भी रूपक है .   
        ‘कसाईबाड़ा ‘ में नेतृत्व की अविश्वसनीयता के प्रसंग या फिर ‘तिरियाचरित्तर’ के विमली को , उसी का यौन शोषण करने वाले ससुर विसराम द्वारा (उसे) दागने की सजा के रूप में दण्ड-विधान की कमान संदिग्ध और अपराधी ससुर के हाथों में ही सौंप देने जैसे अनेक कथा-प्रसंग आस्था और आदर्श के प्रति विश्वास का निर्णायक निषेध प्रस्तुत करते हैं . ‘कसाईबाड़ा’ में अधरंगी की  नेताओं की नस्ल पर यह टिपण्णी कि 'लीडर ,दगाबाज ,दो-मुहाँ  और दरोगा का चमचा है (केशर कस्तूरी ,पृष्ठ १९ ) -प्रशासन और नेतृत्व दोनों के ही चरित्र पर सम्पूर्ण अविश्वास की घोषणा है .
            दरअसल शिवमूर्ति की अधिकांश कहानियां संरचना के धरातल पर अपने समय के वृहत्तर यथार्थ का गहन एवं सांकेतिक नाट्य-रुपक प्रस्तुत करती हैं . ‘कसाईबाड़ा’ जैसी उनकी प्रसिद्ध कहानी में तो यह नाट्य-संयोजन दिखता भी है . प्रथम द्रष्ट्या असंगत  और असामयिक लगने वाले कथा-प्रसंगों का विनिवेश  जैसे कि गाँव में तहकीकात के लिए गए दरोगा द्वारा ग्राम-प्रधान द्वारा पहले से पकड़ कर छोड़ी गयी वन-मुर्गियों के  शिकार का प्रसंग , बिना किसी अतिरिक्त श्रम के पाठकों द्वारा भारतीय प्रशासन-तंत्र के ब्रिटिश औपनिवेशिक उत्तराधिकार वाले स्वरूप पर पूरा विमर्श खड़ा करने में सक्षम है . सत्ता का औपनिवेशिक अहंकार ,सिर्फ कहने के  लिए ही लोक-सेवक लेकिन व्यवहार में जनता से अलग अपने को श्रेष्ठ और विशिष्ट समझने की भावना, सामान्य जन के प्रति सहानुभूति और कर्तव्यकारी संवेदनशीलता का अभाव अर्थात`जन-विरोधी चरित्र ही उसका प्रमुख लक्षण है ..
            ‘कसाईबाड़ा’ में जन-इच्छा की सांकेतिक अभिव्यक्ति शिवमूर्ति अपने फैंटेसी चरित्र अधरंगी द्वारा की गयी इस घोषणा के द्वारा करते हैं कि "आज शाम पांच बजे . पांच बजे शाम को बिल्डिंग के सामने बबूल के ठूंठ पर लटकाकर गाँव के बेटी-बेचवा परधान और उसके बेटे प्रेम को फांसी दी जाएगी .आप सभी हिजड़ों से हाथ जोड़कर पराथना है कि इस शुभ अवसर पर पधार कर ..." (पृष्ठ १९)अधरंगी की विकलांगता भी अत्यंत सुचिंतित रूप से भारतीय जनता की असमर्थता और विवशता की ही प्रतीकात्मक और नाटकीय अभिव्यक्ति है .
          शिवमूर्ति अपने वैचारिक निष्कर्षों एवं पर्यवेक्षण को किस प्रकार अपने पात्रों और चरित्र -परिकल्पना में ही निवेशित कर देते हैं , इसे देखना है तो  उनकी ‘अकालदण्ड’  कहानी के सामन्ती पृष्ठभूमि के चरित्र रंगबहादुर  की चरित्र-सर्जना को देखा जा सकता है . पूजी और सत्ता की नयी दुरभिसंधि नें  सामंती अवशेषों को किस प्रकार पाखंडी निरीह और पतनोन्मुख किया है इसकी सांकेतिक अभिव्यक्ति भ्रष्ट सत्ता के नए केंद्र सिकरेटरी द्वारा अपनी ही बेटी के शीलहरण  की संभावना भांप कर वह आत्म - भर्त्सना-"जा रे रंगिया साले "के रूप में करता है .’अकालदण्ड’ में सुरजी और उसके प्रतिरोध को  जिसप्रकार वे भारतीय जनता के प्रतिरोध की प्रतीकात्मक’ सांकेतिक और नाटकीय अभिव्यक्ति में जिस प्रकार बदलते हैं -यह भी उनके गंभीर रूप में सुचिंतित कथा-कौशल का ही प्रमाण है .सुरजी द्वारा हंसिए से सिकरेटरी  की देह के नाजुक हिस्से को अलग कर देने का दंड जहाँ प्रतिरोध को क्रातिकारी निर्णायक हस्तक्षेप तक ले जाने का सन्देश छिपाए है; वहीँ पुरुषों की असमाधेय यौन-हिंसा से चिढ़े हुए समाज की भावना का कथात्मक विरेचन भी प्रस्तुत करती है .
          यथार्थ के अधिक से अधिक प्रमाणिक और सटीक अंकन के लिए शिवमूर्ति पृष्ठभूमि के विस्तृत रेखांकन तथा वैषम्य-चित्रण का भी भरपूर सहारा लेते हैं . कभी -कभी तो इतना अधिक कि उनकी कहानी किसी रिपोर्ताज का हिस्सा लगने लगती है . उनकी ‘अकालदण्ड’ कहानी का एक बड़ा हिस्सा अकाल पर लिखा एक ह्रदय -स्पर्शी और जीवंत रिपोर्ताज ही है . ग्रामीण परिवेश  का चित्रण करते हुए वे यह टिप्पणी करना भी नहीं भूलते कि "यही विद्युत्धारा  दूर-दराज के शहरों को रोशनी से जगमगा रही होगी . करोड़ों गैलन पानी से मीलों लम्बे पार्कों और विहारों को तर करते रंगीन फव्वारे छूट रहे होंगे लेकिन यहाँ गांवों के लिए इस शक्ति का कोई अर्थ नहीं है ."(केशर कस्तूरी ,पृष्ठ २९ ) इसीतरह सिकरेटरी के यौनाचारी  भ्रष्ट अतीत के रेखांकन के प्रसंग में  वे वेदानन्द जैसे उच्च नैतिक मूल्यों वाले  धर्मं-गुरुओं का परिप्रेक्ष्य सन्दर्भ भी देते चलते हैं तो दूसरी ओए पाखंडी -ढोंगी धर्म-गुरुओं के यहाँ  मुक्ति तलाशने वाली विधवा गुलाबो सहुआइन और सरजूपारी चाची जैसी महिलाओं का भी ,जिनके लिए धर्म का आवरण अपनी  अतृप्त यौन-इच्छाओं की पूर्ति करने का मानवेतर नहीं ,बल्कि समाज सम्मत अपमानवीय चोर-दरवाजा है -शिवमूर्ति की सजगता इसमें है कि वे स्वयं धर्म के विवादास्पद,नकारात्मक और अमानवीय संभावनाओं पर प्रत्यक्ष टिप्पणी कहीं नहीं देते . वे बहुत चालाकी से ऐसे संभावना स्थल के आस-पास अपने  पाठकों को ले जाकर उकसाकर छोड़ देते हैं . इतने पर्याप्त संकेतों के साथ कि पाठक चाहे तो उन चरित्रों को लेकर अपनी कल्पना से भी कथा-रचना कर सकता है . अकालदण्ड की गुलाबो सहुआइन और सरजूपारी चाची ऐसी ही कथा-चरित्र हैं; जहाँ प्रसंगानुसार सूचनाएं देते हुए विषयांतर होने के भय से बचाते-बचते कहानीकार नें संकेतों में ही सही बहुत कुछ कह दिया है . तीर्थयात्रा में ‘अयोध्याजी' जा रही सरजूपारी चाची  के संवाद की व्यंजना में ही पाठक से बहुत कुछ अकथ कह दिया गया है . देखें-"महंत जी की सेवा से लौटूं तो मेरे लिए भी एक हाथ-पाँव दबाने वाली चाहिए और भी कोई ऊँच-नीच पड़ जाए तो परदेस है ,झेलना पड़ेगा ."(पृष्ठ ४३ )काशी-करवट या फिर तीर्थ-वास के नाम पर वृद्ध-सेवा से पीछा छुड़ाने वाली भारतीय धर्म-व्यवस्था पर व्यंग्य कहानीकार इस भेदक टिप्पणी के साथ करता है -"सुरजी को भी 'मुक्ती 'का आसान रास्ता सुझाया था सरजूपारी चाची नें .खुद चलकर आयीं थीं . सुरजी की सास की 'मुक्ती ' और सुरजी की सास से 'मुक्ती ' दोनों साथ-साथ . सरजू जी में जल-समाधि दिलाकर ,'सरग' का द्वार चौपट खुला मिलता है इस रस्ते . खुद भगवान रामचंद्र जी इसी रास्ते गए थे अपने धाम ."(वही ,पृष्ठ ४३ )लेखक नें इस प्रसंग का उपयोग सुरजी के चारित्रिक उभर के लिए किया है; क्योंकि वह अपनी अंधी-बूढ़ी सास को पानी में धकेलने से मना कर देती है . शिवमूर्ति की कई कहानियां आधुनिकताबोध के साथ युग के बदले सन्दर्भों में मिथकों की नयी मानवीय पुनर्व्याख्या प्रस्तुत करती हैं . उदाहरण के लिए अविवाहित सिकरेटरी  के यौनाचारी स्वभाव वाले अतीत का रेखांकन वे ब्रह्मचारी माने जाने वाले मिथकीय चरित्र हनुमान के औरस पुत्र  मकरध्वज का पौराणिक सन्दर्भ देकर करते हैं . मिथकों के भीतर छिपे मानवीय यथार्थ और सच को उद्घाटित करने वाले  उनके पुनःपाठी सन्दर्भ विद्युत् की आकस्मिक कौंध की तरह कहानी की कथावस्तु  के अवशिष्ट अकथित पक्षों को अकल्पनीय विस्तार और आयाम में प्रकाशित कर जाते हैं-"कहते हैं उनके पसीने में इतनी ताकत आ गयी है कि मकरध्वज जैसा पुत्र पैदा हो जाए . कहाँ नहीं हैं उनके पसीने के मकरध्वज  ? मध्यप्रदेश के जंगल हों या स्वामी वेदानन्द जी के आश्रम का पडोसी मोहल्ला , आश्रयदाता सेठ की हवेली हो या सूखापीडित  क्षेत्र के गाँव . जहाँ थोड़ी भी छाँव मिली कि मकरध्वज” (वही ,पृष्ठ ३७ ) आधुनिक यथार्थ के अनुरूप अतीत की मिथकीय कथाओं की व्याख्या  के साथ धर्म में छिपे अतीत के संदिग्ध स्थलों में पाखंडों की पड़ताल  शिवमूर्ति के कथाकार को एक गंभीर एवं प्रबुद्ध सामाजिक विमर्शकार की अतिरिक्त प्रतिष्ठा देती है .
           शिवमूर्ति की 'अकालदण्डकहानी  तो लोकतान्त्रिक सत्ता के  ही पूंजीवादी मानसिकता के साथ एक नए शोषक वर्ग के हाथों में चले जाने की सूचना देती है . औद्योगिक पूंजीवाद और सत्ता के नए गठबंधन नें शोषकों की बिलकुल नयी पीढ़ी को जन्म दिया है . इस नए शोषक वर्ग के लिए बीते युग की सामंती शक्तियां भी उपयोग ,सुरक्षा और धनार्जन का संसाधन है . यह उन्हें किस प्रकार अधीनस्थ बनाकर उनका दोहन करता है ,इसे न सिर्फ रंगबहादुर के प्रसंग में देखा जा सकता है  बल्कि कहानी से बाहर भी बड़े-बड़े होटलों और मालों के मुख्य द्वार पर सामंत-युगीन शान की प्रतीक मूंछों को दरबान या फिर महाराजा की वेशभूषा  तथा भूमिका में उपभोक्ताओं को झुक-झुक कर  सलाम करते हुए देखा जा सकता है . अकालदण्ड कहानी  भ्रष्ट नौकरशाहों की विलासिता ही नहीं ,बल्कि सामंती युग की सामाजिक शक्तियों के अवसान ,पराभव तथा भ्रष्ट सत्ता-नियामकों  की निरंकुश अनैतिक जीवन-चर्या का बेबाक चित्रण करती हैं . यहाँ तक कि बाह्य सामाजिक प्रतिष्ठा ,भव्य पुरानी गढ़ी ,विशाल परिसर ,दो-नाली बन्दूक ,भव्य व्यक्तित्व और शानदार मूंछों के होते हुए भी सामंती अतीत का वारिस  रंगबहादुर नए ज़माने की सत्ता के प्रतीक तथा भ्रष्ट प्रतिनिधि सेक्रेटरी से उसके अधीन नौकरी कर रही अपनी पहली बेटी को यौन शोषण से नहीं बचा पाता . कहानी के अंत में सुरजी का प्रतिशोध  प्रतीकात्मक रूप से ही सही सुरजी के बहाने सदियों से निम्न और उपेक्षित समझी जाने वाली हाशिए की उस जनता पर परिवर्तन और क्रान्ति का दारोमदार डाल कर उसके प्रति विश्वास व्यक्त करती है, जिसमें अब भी शक्ति बची हुई है तथा जो अप्रत्याशित रूप से एक नए दण्ड विधान का इतिहास रच सकती है . इस दृष्टि से देखें तो कहानी के शीर्षक का पहला शब्द 'अकाल 'जहाँ समस्या और अभाव-सूचक है तो दूसरा शब्द 'दण्ड’  न्याय-चक्र के नए विधान का . सामंती पूंजीवाद का नए ज़माने के औद्योगिक पूंजीवाद के सम्मुख घुटने टेकना एक ऐतिहासिक तथ्य तो है ही मार्क्सवाद सम्मत भी . कहानीकार नें रंगबहादुर उर्फ़ रंगी बाबू की इस पतन-यात्रा को अत्यंत तनावपूर्ण घटना-क्रम में संवेदनशीलता और सहानुभूति के साथ  सजीव रूप में प्रस्तुत किया है -रहस्य ,कौतूहल ,सांकेतिक चित्रण  के साथ भूतपूर्व सामंत रंगबहादुर जब अपनी ही गाल पर थप्पड़ मरते हुए स्वयं को 'रंगिया साले 'संबोधित करता है तो उसके अपमानजनक हश्र और निरीहता को देखते हुए पाठक के लिए कुछ भी समझना-जानना शेष नहीं रहता . मार्क्सवादी विचारधारा की बिना कहीं प्रकट चर्चा के भी 'अकालदण्ड’ कहानी सामाजिक शक्तियों के उत्थान-पतन की मार्क्सवाद सम्मत समझदारी भी अपने पाठकों को सौंप जाती है . नयी पूंजीवादी सत्ता का प्रतीक चरित्र सेक्रेटरी जहाँ पतनशील भारतीय लोकतंत्र की चारित्रिक समीक्षा भी है तो रंग बहादुर उर्फ़ रंगी उर्फ़ रंगिया तथा उसकी बेटी माला सामाजिक आर्थिक परिवर्तन के तीव्र दौर में झूठे दंभ के सहारे गतयुगीन प्रतिष्ठा बचाए रखने के प्रयास में  अपना शील गंवाते सामंती शान की . संन्तो द्वारा पाखण्ड जीने की विवशता और उनकी वास्तविक निरीहता को शिवमूर्ति नें अत्यंत सूक्ष्मता  एवं प्रामाणिकता के साथ अंकित किया है . कहानी का उपरी वृत्तांत और केन्द्रीय घटनाशीलता  भले ही आर्थिक निरीहता में यौन-शोषण के आपराधिक प्रयास और उसके निवारण के लिए अपेक्षित जन-प्रतिकार की प्रस्तावना करने वाला हो -पूरी कहानी अनेक सजीव चारित्रिक बिम्बों से रची गयी किसी लम्बी कविता की तरह बहुत से आयामों ,अनुभवों ,सामाजिक समस्याओं ,चिंताओं एवं मानवीय संवेगों -आवेगों से निवेशित एवं आवेष्ठित  है .शिवमूर्ति की कहानियां शिल्प-संरचना के स्तर पर इस विधा की बहुआयामी सार्थकता के लिए गंभीर  वैचारिक आयाम देती है . शिवमूर्ति की अन्य कहानियों की तरह ' अकालदण्ड ' कहानी भी  अनेक संरचनात्मक स्तरों को समेटे हुए है . कहानी अपने भीतर अकाल पर लिखी एक गंभीर और सम्पूर्ण रिपोर्ताज छिपाए हुए है .
      सत्ता के दुश्चरित्र की असलियत को सामने लाने वाले किसी भी अवसर के सार्थक इश्तेमाल से शिवमूर्ति नहीं चूकते -भ्रष्ट नौकरशाही के पतन का एक आयाम अकालदण्ड  कहानी में नर बहादुर सेवादार द्वारा कर्मचारी रामफल पर की गयी इस टिप्पणी में भी है -"कितनी बार किसी का बाप मरता है , इसका हिसाब होना चाहिए . साल भर में दो बार मर चुका सेवादार का बाप . अभी कोई चाहे तो लखपतिया  की झोपड़ी में घुस कर रंगे हाथ पकड़ सकता है उसके साथ में कैम्प का दस-बीस किलो राशन भी निकल आएगा ."(केसर कस्तूरी ,पृष्ठ ३१ )
          सबसे अधिक आंचलिक प्रतीत होने वाली शिवमूर्ति की 'अकालदण्ड " कहानी, शिवमूर्ति की कहानी-कला का एक और रहस्य खोलती है. शिवमूर्ति की कई कहानियां वस्तुतः अपने समय के वृहत्तर यथार्थ को अवध की स्थानीय पृष्ठभूमि में आंचलिक पुनर्रचना ही करती हैं . इस तरह उनकी कई कहानियों का 'आचलिक' प्रतिनिधिक एवं प्रतीकात्मक होने के कारण प्रायः नाटकीय और कलात्मक है . वह रेणु की कहानियों की तरह हर बार पूरी शुद्धता या सीमितता के साथ आंचलिक नहीं है . अपने समय और यथार्थ की  विकास तथा पतनशीलता की अधिक जटिलता के कारण  शिवमूर्ति की कहानियां अधिक समाजवैज्ञानिक तथा राजनीतिक बोध-दृष्टि से सम्पन्न हैं . ‘अकालदण्ड’ कहानी में वर्णित अकाल शिवमूर्ति की स्मृतियों में सुरक्षित 1966 की उत्तर-भारत में पड़े अकाल की याद दिलाता है  . स्वतंत्रता के पूर्व ब्रिटिश-काल में बंगाल का अकाल और स्वतंत्रता के बाद कालाहांडी का अकाल ही कहानी में वर्णित अकाल की समानता कर सकते हैं . स्पष्ट है कि ‘कसाईबाड़ा’ कहानी की चयनधर्मी नाटकीय कथावस्तु की तरह ‘अकालदण्ड’ कहानी भी एक साथ ही तात्कालिक एवं आंचलिक यथार्थ से सम्बद्ध एवं असम्बद्ध  नाटकीय कथा-रूपक ही है . यह अवध के मजदूर वर्ग की स्थानीय स्त्री-चरित्र विमली के रूप में  जितनी आंचलिक है तो स्वतन्त्र भारत की नौकरशाही को ब्रिटिश औपनिवेशिक शोषक चरित्र की आपराधिक उत्तराधिकार एवं संस्कार में दिखाने के कारण कालान्तरणकारी एवं सार्वभौम  भी . हिन्दी के पूर्ववर्ती  सफल कहानीकारों की कला-तकनीकों के बेहतर का अपनी कहानी-कला में निवेश करने के बावजूद शिवमूर्ति का कहानीकार अद्यतनता और मौलिकता की दृष्टि से यदि स्पष्ट पहचान और प्रतिष्ठा की छवि स्थापित कर लेता है तो  सिर्फ इसीलिए कि शिवमूर्ति की कहानियां मानव-अस्तित्व के लिए आवश्यक सनातन संवेदनशीलता और उसके प्राकृत पर्यावरण के पक्ष में खड़ी होकर  आधुनिक शहरी , औद्योगिक व्यापारिक संवेदनहीन सभ्यता की निर्मम एवं मोह-रहित समीक्षा करती हैं .
           वर्त्तमान के आँखों-देखा हाल की तरह रिपोर्ताज और यात्रा-वृत्तांत के मिले-जुले विधा-रूप की तरह निजी अनुभवों और पर्यवेक्षणों से चरित्रों को केंद्र में रखकर बुनी गयी शिवमूर्ति की कहानियां आरम्भ से ही अपने पाठकों को एक सही संवेदनात्मक पक्ष सौंपकर अस्वस्थ एवं विरोधी यथार्थ का पर्दाफाश करती चलती हैं . उनकी लोकप्रियता का भी आधार यही है कि वे असामान्य का नहीं बल्कि सामान्य का ही प्रतिनिधिक विशेष रूप प्रस्तुत करते हैं . बहुत नजदीक से दिखने के कारण विरल प्रतीत होते हुए भी एक व्यापक वर्ग का प्रतिनिधित्व उनके कथा-चरित्र करते हैं . ‘तिरियाचरित्तर’ की विमली को ही देखें तो अपने नाम के अनुरूप विमल होते हुए भी सिर्फ अपनी आर्थिक ,पारिवारिक और स्त्री लैंगिक सामाजिक परिस्थितियों के कारण वास्तविक अपराधी पुरुष-प्रधान समाज के द्वारा अपमानित और लांछित होती है . कहानीकार का निष्कर्ष और पक्ष पूरी तरह स्पष्ट है और शिवमूर्ति की ‘तिरियाचरित्तर’ कहानी अपने अंत तक पहुंचते-पहुंचते व्यंग्यात्मक निष्पत्ति के साथ पुरुष-चरित्तर के सारे रहस्य खोल देती है
         बहुत नजदीक से इस कहानी में भारतीय स्त्री के प्रेम का समाजशास्त्र ,उसकी परिस्थितिकी ,सांस्कृतिक चित्ति ,नारी मनोविज्ञान और भारतीय परिवेश में उसकी दुश्चिंताएं ,चरित्र को लेकर नौकरीपेशा औरतों पर होने वाले आक्षेप आदि का विस्तृत रेखांकन शिवमूर्ति नें किया है . भारतीय समाज और व्यवस्था आज भी स्त्री स्वावलंबन के अनुरूप नहीं हो पायी है . बचपन में पिता की अधीनता और वयस्कता में पति की अधीनता ही किसी भारतीय स्त्री की सुरक्षा है . इससे भिन्न मानवीय परिस्थितियां किस प्रकार त्रासद और विडंबनात्मक हो सकती है, शिवमूर्ति नें इसे ‘तिरिया चरित्तर’  कहानी के माध्यम से दिखाया है . पिता की विकलांगता के कारण और अकेली संतान होने के कारण विमली को पुरुष-प्रधान भारतीय समाज में स्वावलंबन और  व्यक्तित्व-विकास का जो अवसर मिलता है -वह विमली को कीर्ति से अधिक अपकीर्ति ही देते हैं .-"कुछ भी हो ,लेकिन बदनाम रही है पुतोहू मायके में ...."(पृष्ठ १२०)बात-बात में मिथकों को जीने वाला भारतीय समाज सामने खड़ीं जिंदगी के भीतर के सच को पहचान नहीं पाता . विमली के साथ घटित उसके ही शातिर ससुर के दुराचार को जानने वाले पाठक के लिए कथाकार द्वारा पुजारी जी के मुख से कहलाई गयी यह टिप्पणी एक नया व्यंग्यार्थ खोलती है- एक झटके में ही कथाकार विमली के साथ घट रहे पुरुष आचार को इस पौराणिक प्रसंग का सन्दर्भ देकर जसे पूरी सभ्यता को ही प्रश्नांकित कर देता है -"लछिमन जी नें तो इससे छोटी गलती पर नाक-कान दोनों काट लिए थे ."( वही ,पृष्ठ १२१ ) शिवमूर्ति भारतीय स्त्री की दशा-दिशा को गढ़नें में एक सुचिंतित -पूर्वनियोजित मिथकीय सांस्कृतिक तंत्र की पार्श्ववर्ती भूमिका की और ध्यान दिलाना नहीं भूलते . जब वे ऐसा करते हैं तो वह एक स्तब्ध करने वाला दृष्टिपात होता है .मारक और बेधक सच वाले ऐसे दृष्टिपात के पास कहानी को दो या तीन पंक्तियों से अधिक वे नहीं ठहरने देते . कुछ वैसे ही जैसे इंजेक्शन लगने के समय डाक्टर अपने रोगी का ध्यान किसी दूसरी  ओर हटा देते है . चाहे ‘अकालदण्ड’ कहानी में बाल ब्रह्मचारी कहे जाने वाले हनुमान जी के मकरध्वज होने वाला प्रसंग हो या लक्षमण द्वारा सुपर्णखा की नाक और कान काट लिए जाने का प्रसंग -शिवमूर्ति उनकी पौराणिक व्याख्या से अपनी युगीन असहमति को छिपाना नहीं चाहते  . ‘कसाईंबाड़ा’ के अधरंगी की तरह सच बोलने वाली स्त्री पात्र  'मनतोरिया की माई ' के मुख से व्यवस्था के नियामकों को प्रश्नांकित करा कर भी शिवमूर्ति स्त्री-विरोधी भारतीय समाज और व्यवस्था के पुरुष-चरित्तर को उसकी चरम अन्यायिक परिणति तक पहुँचने देते हैं.  प्रायः अपने कथा-परिवेश के लिए आंचलिक मानी जाने वाली 'तिरियाचरित्तर ' कहानी भी 'कसाईबाड़ा  कहानी की तरह भारतीय स्त्री के आधुनिकता विरोधी नकारात्मक पूर्वाग्रहों ,सामाजिक मानसिकता  और  मनोविज्ञान के सभी आयामों को उद्घाटित करने वाला नाट्यरुपक ही है.विमली की जगह कमला या ईंट भट्टे की जगह ऑफिस रख देने से भी कोई विशेष फर्क नहीं पड़ना है . शिवमूर्ति  नें विमली को रचा ही इसतरह से है कि वह भारतीय स्त्री मात्र की पीड़ा का अधिकतम प्रतिनिधित्व कर सके . एक मात्र सच बोलने वाली मनतोरिया  का पति जब उसका बाल पकड़कर पंचायत से बाहर ले जाता है तो कहानीकार व्यंग्यात्मक टिप्पणियों का एक भी पल हाथ से बाहर जाने नहीं देता -"अपने आदमी को क्या कहे वह ? आदमी तो आदमी हठी हाथी होता है महावत  महावत ,चाहे कितना ही कमजोर महावत क्यों न हो !"(पृष्ठ १२२)दुराचारी ससुर द्वारा ही पंचायती निर्णय के अनुसार दागे जाने के अवसर पर लेखक पूरे समाज के ही यौन-कुंठित होने की सूचना देता है-'' कई नौजवान पतोहू को हाथ-पैर और सिर पकड़ कर  लिटा देते हैं ?  कसकर दबाओ . जो जहाँ पकडे वहीँ मांसलता का आनंद ले लेना चाहता है.नोचते -कचोटते ,खींचते ,दबाते हाथ "(वही ,पृष्ठ १२२ ) कहानी का अंत करने से पहले एक बार फिर मिथकीय प्रसंग के बहाने संस्कृति-विमर्श की ओर वापस लौटता है कथाकार . यह याद दिलाना नहीं  भूलता कि पुरुषों द्वारा रचे गए शास्त्रों में स्त्री का सही और न्यायिक पक्ष पूरी तरह अनुपस्थित है . तब जब पुजारीजी भारी मन से कहते हैं -तिरिया-चरित्र समझना आसान नहीं . बाबा भरथरी नें झूठ थोड़े कहा है .तिरिया चरित्रम पुरुखष्य भाग्यम ...''(पृष्ठ १२३ ) और उसके पहले सीधे-सीधे कथावाचक 'मैं ' यानि लेखकीय टिप्पणी के रूप में -'इतने दिनों बाद फिर दुहराई जा रही है महाभारत की कथा - भरी सभा में लाचार औरत की बेइज्जती !  इसके कारण भी कोई महाभारत होगा क्या ? काहे भाई ! ई कोई रानी -महारानी है ?"(वही ,पृष्ठ १२३ )
      इस कहानी की संरचना को देखें तो स्पष्ट हो जाता है कि ‘तिरियाचरित्तर’ कहानी सम्पूर्ण सामाजिक परिवेश का स्त्री केन्द्रित पाठ प्रस्तुत करती है . यह कहें कि कहानीकार विमली की आँखों से ही पाठकों को पूरी व्यवस्था को देखने-समझने का आग्रह करता है .स्त्री जाति का समस्त अनभिव्यक्त आक्रोश विमली के हश्र और उसकी असहाय-असह्य  घृणा में व्यक्त हो उठा है . समाज में कभी-कभी दिखने-घटने वाली विरलतम घटना को आधार बना कर लिखी गयी यह कहानी विमली के साथ अपने एक तथाकथित संरक्षक द्वारा ही छले जाने और दुखान्त घटित होने से पहले ही भारतीय समाज में एक कामकाजी स्त्री की नियति ,दिनचर्या और जीवनानुभवों का अत्यंत ही प्रमाणिकता और सूक्ष्मता से वृत्तांत उपलब्ध कराती है . यह समझना भूल होगा कि कहानी सिर्फ विसराम का ही काम-खलत्व प्रस्तुत करती है . विमली के पास उसके परिस्थितिजन्य सात्विक जीवन का एक ही पाठ है लेकिन समाज के पास अनेक-"एक किस्सा हो तो बताए कोई ! नैहर में तो इसके पीछे रोज एक किस्सा तैयार होता था . इतने किस्से पीछे छोड़ कर आई थी कि बताने लगे तो पूरी रामायण बन जाएगी "पाठक आसानी से यह अनुमान लगा सकता है कि विसराम की इस घोषित सोच से अलग कि साथ छूट जाएगा तो सारा किस्सा अपने आप खत्म हो जाएगा .वह विमली की विदाई कराने के लिए प्रेरित ही समाज में उसे लेकर व्याप्त उन कुचर्चाओं को सच मानकर हुआ था कि कि उस यौनाचारिणी बहू से वह भी आसानी से यौन सम्बन्ध स्थापित कर सकेगा . विमली को लेकर एक सर्वव्यापी कामुकता जैसे सारे संसार में छाई हुई हो ;कुछ -कुछ सूफी कवि जायसी के यहाँ मिलने वाली आकाश-पाताल एक करने वाली सर्वव्यापी विरह भावना जैसी . शिवमूर्ति जैसे समाज में मिलने वाली कामुकता का दर्शन कराने ही चले हों . उसकी विभिन्न छटाओं और मुद्राओं का , उसके भ्रामक आकलनों का -जहाँ घटित को स्थगित कर संभावनाएं हवा में उड़ती हैं ;जहाँ जो कुछ भी हो सकता है सब सच है . अश्लील हंसी-मजाक ,इशारे और कुइसा मिस्त्री का प्रेम -प्रस्ताव जो अपवाद होते हुए भी प्रेम को कामुकता से नहीं बल्कि अस्तित्व के सहज स्वाभाविक आकर्षण और जीवन की उपलब्धि तथा सार्थकता से जोड़कर देखता है . स्वार्थी किन्तु काम-भावना का एक सात्विक प्रतिपाठ है कुइसा मिस्त्री का प्रसंग . कुछ-कुछ पौराणिक चरित्र नारद-मोह प्रसंग वाले नारद का जो प्रेम-प्रभाव में हास्यास्पद और अपमानित होते हुए भी नायिका का मान-सम्मान बढ़ाते हैं . कबीरपंथी पिता के पुत्र शिवमूर्ति  ने उसके एकपक्षीय प्रेम के दुखांत को इस दोहे का सन्दर्भ देकर कुछ पंक्तियों में ही समेत दिया है -
 "माया केरी पूतरी ,तन तरकस मन बान !
तिरिया धावै रथ चढ़ी ,पुरुखहिं करइ निसान !"
तिरियाचरित्तर कहानी का आरम्भ भी विमली और उसके एक दुर्घटना का शिकार होकर बेकार हाथों वाले पिता के साथ ईंट-भट्ठे के बोझा-मिस्त्री कुइसा के नारी-प्रेम के प्रसंग से होता है . कहानीकार की यह रोचक टिप्पणी उल्लेखनीय है कि ' अपनी-अपनी पसंद .कुइसा को औरतों की गालियां ,और मिल जाए तो धक्का खाना पसंद है . अगर चार औरतें मिलकर उसे नदी में डुबोने लगें तो भी वह इंकार नहीं कर सकता ." (केसर कस्तूरी ,पृष्ठ ८२ )कुइसा एक प्रतिनिधि मानसिक यौनिकताजीवी व्यक्तित्व है .एक कल्पनाजीवी प्रेमी .बिल्लर उसका समवयस्क सहकर्मी है . दोनों ही विमली के यौन आकर्षण से अपने-अपने ढंग से जूझते हैं . जूझते तो धीर-गंभीर प्रेमी मूंछों वाले डरेवर बाबू भी है . ये सभी चरित्र प्रेमियों की अलग-अलग कोटि से पाठकों को परिचित कराते हैं . विमली के इस वृहत्तर परिवार या विस्तार को यह समाज आज भी पूरी तरह समझने या उसको मान्यता देने में असमर्थ है .  इन्हीं संबंधों के कलंक का साक्ष्य देकर विसराम उसे पंचायत से दण्ड पारित करवाता है .भारतीय स्त्री के लिए यौनिकता एक पराई अमानत है . विमली उसे ही विभिन्न खतरों से बचाती आई थी . शिवमूर्ति नें भारतीय स्त्री के लिए इस समाज को ठीक ही बीहड़ या जंगल का रूपक दिया है . जहाँ कितने जानवर और शिकारी पद-पद पर मिलते हैं . कहानीकार उसे मुकाम तक सुरक्षित पहुंचकर भी लुट जाना कहता है और छल से मेड द्वारा ही खेत का खा जाना . यौन-कुंठित भारतीय समाज से सम्बंधित शोध भी इसकी पुष्टि करते हैं कि अधिकांश मामलों में स्त्रियों के प्रति लैंगिक अपराध निकट सम्बन्धियों द्वारा ही होते हैं . यौन-प्रसंगों को लेकर कहानीकार का मजाकिया और खिलंदड़ा अंदाज ही ‘तिरियाचरित्तर’ कहानी को एक अश्लील कहानी बन जाने से बचाता है और वह भारतीय काम-विमर्श पर  केंद्रित हिंदी की एक विशिष्ट और अविस्मरणीय  कहानी बन पाती है
         परंपरागत भारतीय स्त्री के एकांत प्रेमी चरित्र को सहानुभूति के साथ चित्रित करने वाली कहानी  ‘सिरी उपमा जोग में वस्तुतः नगरीकरण से उपजे अलगावबोध तथा सत्ता के आभिजात्यबोध के गठबंधन की शिकार एक पीढ़ी के अमानवीय एवं निष्ठुर वर्गांतरण की कथा कही गयी है . यह पीढ़ी अपनी संवेदनशीलता को व्यक्तित्व की दुर्बलता; निष्ठुरता को साहस और बहादुरी तथा अपने पिछले संबंधों को तोड़ने और छोड़ने को प्रगति और विकास समझती है . दांपत्य में अमानवीकरण को समर्पित यह कहानी अपनी देहाती पत्नी के दुख ,संघर्ष ,परिश्रम और त्याग की कीमत पर उच्च प्रशासनिक अधिकारी बनें एक ऐसे द्विखंडित व्यक्तित्व वाले व्यक्ति की कहानी है ,जो अपने दीन-हीन अतीत से पलायन करने के प्रयास में अतीत के सारे पारिवारिक रिश्तों से सम्बन्ध-विच्छेद कर लेता है . शिवमूर्ति के संस्मरणों और साक्षात्कारों से गुजरने वाले यह स्वीकार करेगे कि इस कहानी के कथा-नायक और उसकी देहाती पत्नी के वृत्तान्त का कुछ अंश स्वयं शिवमूर्ति की अपनी ही जीवन-कथा का ही आत्मप्रक्षेपण है . वे स्वयं कुछ ऐसी ही परिस्थितियों से जूझते हुए अपनी पत्नी के सहयोग से एक दिन उच्च अधिकारी बने थे . बनने के बाद वर्गांतरण के लिए दूसरा विवाह कर लेने वाले अधिकारीयों की वास्तविक दुनिया में भी कमी नहीं है . ऐसे लोगों के लिए यह कहानी विमर्श का पूरा अवसर उपलब्ध कराती है . हीनता और श्रेष्ठता के द्वैत में फंसा ‘सिरी उपमा जोग ‘का कथा-नायक पहले तो अपने अतीत के रिश्तों से मुंह छिपाते हुए अतिक्रमित होने का मिथ्या सामाजिकबोध जीता है -निम्न आर्थिक वर्ग से उच्च वर्ग में अपने अंतरण पर अपने ही फैलाए झूठ और दमित ऐषणाओं का शिकार होकर  एक दिन अपने विवाहित होने का तथ्य छिपाकर , एक आधुनिका और अभिजात्य युवती ममता – जो जिला–न्यायाधीश की पुत्री है ; के मोहपाश में पड़कर उससे दूसरा विवाह कर लेता है . मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो पाठकों को एक अभुक्त अपराधबोध से भरे ,दांपत्य संबंधों की दृष्टि से विश्वासघाती एवं भगोड़े नायक के पास पहुंचाकर छोड़ जाना ही इस कहानी की ताकत है . कहानी में नायक का पुत्र किसी लावारिस बाहरी अजनबी लडके की तरह सरकारी आवास के बाहर पेड़ के नीचे चबूतरे पर सो कर चला जाता है . उसके वापस चले जाने को ‘गाँव का वापस’ चला जाना कहकर कथाकार गाँव को लेकर फैले हीनताबोध पर करारा व्यंग्य करता है .
       ‘आखिरी छलांग’ में उसके कथानायक पहलवान के आखिरी छलांग का सांकेतिक अमूर्तन यथार्थ पर मानवीय जिजीविषा के संघर्ष और उसकी विजय की प्रत्याशा के पक्ष में है . इसमें संदेह नहीं कि बाजार व्यवस्था मानव निर्मित एक ब्लैकहोल बन गयी है ,जिसमें आधार-सभ्यता (किसान ) न सिर्फ हाशिए पर चला गया है बल्कि राजनीतिक व्यवस्था की उपेक्षा से और भी विषम हो गया है . कभी घाघ की कविताओं में ‘उत्तम खेती माध्यम बान’  के रूप में श्रेष्ठताबोध को जीने वाली सभ्यता का वारिस ,उसका प्रतिनिधि-प्रतीक नायक पहलवान सत्ता के प्रतीक राजस्व विभाग के साधारण से चपरासी द्वारा सार्वजनिक स्थल पर बंधक बनाकर लांछित किया जाता है . यह कहानी सरकारी शिक्षा नीति के बाजारीकरण ,उसके अभिजात्य सम्पन्न वर्ग के पक्ष में मंहगे किए जाने , आजीविका की दृष्टि से कृषि-कार्य के पिछड़ते जाने के साथ-साथ दुनिया के सबसे नैसर्गिक और सम्मानित पेशे के आधुनिक सभ्यता द्वारा लांछित-अपमानित–उपेक्षित किए जाने को प्रश्नांकित करती है .
    
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       हिंदी-विभाग
      राजकीय महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय ,
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शिवमूर्ति पर केंद्रित इंडिया इनसाइड साहित्य वार्षिकी 2016


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 शिवमूर्ति पर केंद्रित इंडिया इनसाइड साहित्य वार्षिकी 2016





Tuesday, June 23, 2015

शिवमूर्ति की रचनाओं पर अन्य लेखकों के मत

शिवमूर्ति की रचनाओं पर अन्य लेखकों के मत
1- भाषा पर शिवमूर्ति की पकड़ गजब की है। अपनी भाषा से वे पूरा दृश्य पैदा कर देते हैं। उनके बिंब इतने सजीव होते हैं कि कहानियां पढ़ते हुए आप पुस्तक से निकल कर उनके द्वारा वर्णित गांव में टहल रहे होते हैं। जब वे लिखते हैं कि घर्र....घर्र.... करके ट्रक स्टार्ट हुआ तो ऐसा लगता है कि ट्रक हमारी आंखों के सामने से निकला है। भाषा से दृष्य बनाने की ऐसी क्षमता बहुत कम लोगों में होती है। 
शिवमूर्ति की छवि प्रबन्धक लेखक की नहीं है। वे अपने आप को प्रक्षेपित नहीं करते। यही कारण है कि उन्हें पुरस्कार भी कम मिले हैं और उनकी चर्चा भी अपेक्षाकृत कम हुर्इ है। लेकिन उनका पाठक वर्ग इतना मजबूत है कि वे शिवमूर्ति को ढूंढ़-ढूंढ़ कर पढ़ते हैं। अपनी दो तीन रचनाओं के साथ ही उन्होंने प्रसिद्धि का शिखर छू लिया। 
ममता कालिया - लमही, अक्टूबर-दिसम्बर 2012 पृष्ठ 246
2- शिवमूर्ति के पास अनुभवों का जो जटिल यथार्थ है उससे उनकी यह समझ मजबूत होती है कि रचना में किसके प्रति संवेदनसशील होना है और किसके प्रति क्रूर या सरस। यहां शिवमूर्ति कुछ उसी तरह का सन्तुलन साधते हैं जैसी रस्सी पर बांस लेकर चलने वाला नट अपने हुनर से साधता है। उनकी रचनाओं में तमाम शेडस हैं। जिससे उनकी लेखकीय छवि व्यापक बनती है। मैं शिवमूर्ति की रचनाओं की फैन हूं और मुझे उनसे और भी उम्दा रचनाओं की उम्मीद है। 
चित्रा मुदगल - लमही, अक्टूबर-दिसम्बर 2012 पृष्ठ 248

3- शिवमूर्ति की रचनाओं में कथावस्तु और चरित्र इतने प्रबल हैं कि वे भाषा के किसी भी ऊपरी तामझाम और छलावे के बिना अपने को पाठकों के बची धमाकेदार तरीके से स्थापित कर लेते हैं। शिवमूर्ति ने बहुत कम लिखा है लेकिन बहुत अच्छा लिखा है।
दूधनाथ सिंह - लमही, अक्टूबर-दिसम्बर 2012 पृष्ठ 243
4 - शिवमूर्ति की सबसे बड़ी ताकत यह है कि वे अपनी जड़ों को कभी भूलते नहीं। उन्हें बड़े ही पारदर्शी तरीके से प्रस्तुत करते हैं। कहानियों के अतिरिक्त शिवमूर्ति की जो जीवन परक रचनाएं हैं वह भी काफी स्पष्ट व अपीलिंग हैं। बिल्कुल पारदर्शी। इतने बडे़ पद पर होने के वावजूद वह अपने बचपन या लड़कपन का जिक्र करते हैं तो किसी तरह का घालमेल नहीं करते। शिवमूर्ति का आत्म विश्वास इतना प्रबल है कि वह कुछ छिपाते नहीं। उनकी व्यापक स्वीकृति की यही वजहें हैं। 
शेखर जोशी  - लमही, अक्टूबर-दिसम्बर 2012 पृष्ठ 242
5 - शिवमूर्ति का लेखन विशिष्ट है। उन्हें प्रेमचंद और रेणु के साथ रखना ठीक नहीं होगा। उनका अपना स्थान है। अच्छे लेखक हमेशा ही पाठकों और आलोचकों के बीच सराहे जाते हैं। शिवमूर्ति इसके अपवाद नहीं हैं। अपनी कहानियों से उन्होंने अच्छा स्थान बनाया है इसलिए सराहे जाते हैं।... एक ऐसा लेखक जो अच्छा और सार्थक लिखता है। 
मुद्राराक्षस - लमही, अक्टूबर-दिसम्बर 2012 पृष्ठ 241
6 - शिवमूर्ति किसान जीवन को अच्छे से जानते हैं। जानने का मतलब ग्राम्य संस्कृति को, वहां के समाज को, परिवार को, वहां के राजनैतिक तंत्र और ढांचे को भली भांति समझते हैं। वह किसानों की कहानियां लिख रहे हैं, पर समृद्ध की नहीं, वंचित की, शोषित की लिख रहे हैं। वह शोषण की नहीं, शोषित किसानों के जीवन की चुनौतियां लिख रहे हैं।... उन्होंने ग्रामीण जीवन में दलित स्त्री के शोषण को जिस तरह अपनी कहानियों में रेखांकित किया है वह दुर्लभ है। उन्होंने स्त्री के शोषण को कर्इ स्तरों पर देखा है। उन्होंने उसके शोषण की वह पीड़ा भी लिखी है जिसे वह अपने ही परिवार में अपने ही लोगों के कारण झेल रही हैं। इसलिए मैं कहूंगा कि उनकी कहानियों के स्त्री चरित्र बहुत प्रभावशाली हैं जिसमें 'तिरिया चरित्तर की नायिका को भुलाया नहीं जा सकता।... शिवमूर्ति के पास बहुत अच्छी भाषा है। ग्राम्य जीवन की, किसान जीवन की ऐसी भाषा इस समय किसी के पास नहीं है। उनके पास तदभव शब्दों का भंडार है। उनकी कहानियों में पद ही पदार्थ का रूप ग्रहण कर लेता है। यही उनकी भाषा का जादू है। 
डा. विश्वनाथ त्रिपाठी - लमही, अक्टूबर-दिसम्बर 2012 पृष्ठ 240-241
7 - वरिष्ट हिन्दी लेखक शिवमूर्ति ने अपने सन 2004 में लिखित उपन्यास तर्पण द्वारा कर्इ मायनों में दलित शोषण केनिद्रत लेखन को एक नये मुकाम तक पहुंचा दिया है। वक्त और बदलते राजनीतिक सामाजिक परिवेश को देखते हुए इसकी सख्त जरूरत भी थी। साहित्य में दलित वर्ग को केवल निहायत लाचार और निरीह शोषित शिकार के रूप में चित्रित करने के दिन अब लद गये। संभवत: तर्पण वह चिर प्रतीक्षित उपन्यास है जिसने दलितों को इस एकांगी भूमिका से मुक्त किया है। 
जर्मन इन्डोलिस्ट इनेश फारनेल - लमही, अक्टूबर-दिसम्बर 2012 पृष्ठ 126
8 - शिवमूर्ति का उपन्यास 'आखिरी छलांग कल्पना से कहीं अधिक भयावह यथार्थ को पकड़ने की र्इमानदार कोशिश है। शिवमूर्ति के कथा साहित्य में ग्रामीण जीवन के भरोसेमंद दृष्य मिलते हैं। कायदे से देखा जाय तो ग्रामीण परिवेश की जीवंत दृष्यात्मकता में पुनर्रचना करना शिवमूर्ति की ऐसी खासियत है जो समकालीन कथाकारों को उनसे रश्क करने पर बाध्य कर सकती है।
प्रखर आलोचक प्रियम अंकित - लमही, अक्टूबर-दिसम्बर 2012 पृष्ठ 139
9 - आजादी के बाद का भारत, वह भी ग्रामीण भारत अपनी तमाम विद्रूपताओं और जटिलताओं के साथ यदि किसी कथाकार के कथा साहित्य में संजीदगी और व्यापकता के साथ अभिव्यक्त हुआ है तो वह कथाकार हैं शिवमूर्ति। शिवमूर्ति मन के मनोविज्ञान को बखूबी समझते हैं। उन्हें मन की पकड़ है और आस-पास की परिसिथतियों का अनुभव। किसी भी कहानी में व्यक्त परिवेश का चप्पा-चप्पा जैसे उनका देखा हुआ और जिया हुआ लगता है। 
शिवमूर्ति की कहानियों में कथ्य जितना प्रभावशाली और मारक है, उनकी भाषा उससे भी ज्यादा बेधक। आदमी की अच्छार्इ बुरार्इ को पकड़ना और उसे उन्हीं की भाषा में व्यक्त करना उनके जैसा अनुभवी और उस भाषा को गहरायी से जानने वाला विलक्षण कथाकार ही कर सकता है। 
वरिष्ठ कथाकार उर्मिला शिरीश  - लमही, अक्टूबर-दिसम्बर 2012 पृष्ठ 71 व 75
10 - शिवमूर्ति की कर्इ कहानियां अपनी पठनीयता के बल पर लम्बे समय तक स्मृति में अपना स्थान बनाए रखती हैं। गांवों को लेकर ऐसी पठनीय कथायें हिन्दी साहित्य जगत में सचमुच बेहद दुर्लभ हैं।... शिवमूर्ति का साहित्य स्वतंत्रयोत्तर भारत के वर्ण और जाति के पंक में आकंठ धंसे गांवों की हकीकत से परिचित कराने वाला साहित्य है। उनके गांव रहस्यमय कल्पनाओं से आवृत्त भी नहीं हैं जहां इन्सान से ज्यादा ध्यान चिडि़या की टीं टीं-टूं टूं पर जाय। उनकी कहानियों में चित्रित गांव मेंं हर तरफ आतंक है और यह आतंक सीधी गोलाबारी या हिंसा से नहीं बलिक महीन स्तरों पर सरकार-राजनीति और सामंती संस्कृति के बीच से पैदा षड़यंत्रों के सहारे फैलाया गया है। 
प्रसिद्ध आलोचक वैभव सिंह - लमही, अक्टूबर-दिसम्बर 2012 पृष्ठ 53
11 - 'सिरी उपमा जोग कहानी में ऐसा क्या है जो यह कहानी लगभग तीस साल के अंतराल को पाटते हुए आज भी उसी प्रकार ताजा की ताजा है। कहानी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह एक सहज सरल और तरल कहानी है।... कहानी को भूल जाओ, लेखक को भूल जाओ लेकिन (इस कहानी की) लालू की मार्इ को कैसे भूला जाय। जहां तक मुझे याद है, इस कहानी को मैने कर्इ-कर्इ बार कर्इ-कर्इ प्रत्रिकाओं या इंटरनेट पर पढ़ा। जब भी पढ़ा तो लालू की मार्इ उसी प्रकार सामने खड़ी थी। अपने प्रश्न लेकर। लालू के बप्पा ने भले ही लालू की मार्इ को भुला दिया लेकिन मैं उसके बाद फिर लालू की मार्इ को नहीं भुला पाया। 
चर्चित कथाकार पंकज सुवीर - लमही, अक्टूबर-दिसम्बर 2012 पृष्ठ 95
12 - 'त्रिशूल' भारतीय वर्ण व्यवस्था वाले हिन्दू समाज की जातिवादिता, धार्मिकता और सामंती मानसिकता को तार-तार कर देता है। त्रिशूल की सफलता और सार्थकता इस बात में भी है कि वह मुसिलम दलित पिछड़ों के माध्यम से प्रतिरोध और विद्रोह का परिप्रेक्ष्य निर्मित कर जनजागृति का सर्जनात्मक कार्य करता है। इनकी यही जागृति, यही चेतना समानता, मानवीय अधिकारों और मूल्यों के लिए प्रतिरोध का परिप्रेक्ष्य निर्मित करता है जिसे त्रिशूल की घटनाओं और पात्रों के माध्यम से देखा जा सकता है। ऊंची जाति के जनार्दन तिवारी यदि छोटी जाति के बाबा को प्रमाण नहीं करते हैं तो बाबा ही उन्हें कहां प्रणाम करते हैं। 
त्रिशूल भारतीय साहित्य और समाज का ऐसा 'टेक्स्ट' है जिसमें वर्ण जाति, धर्म समप्रदाय राजनीति, अर्थनीति और संस्कृति की भेद-मूलक संरचनाएं आपस में इस तरह गुंथी हुर्इ हैं कि भारतीय लोकतंत्र भी उन्हीं के सहारे 'सरवाइव' कर रहा है, 'भेद' को बनाए रखकर। लेकिन जब तक भेद रहेगा तब तक अन्याय भी रहेगा। 
दुर्गाप्रसाद गुप्त - लमही, अक्टूबर-दिसम्बर 2012 पृष्ठ 224-125
13 - शिवमूर्ति शब्दों के पारखी हैं। शब्दों को चुनने की और उसे अपनी कथा में बरतने की उनकी तमीज काबिले तारीफ है। शिवमूर्ति की भाषा में निहित बेधकता, सम्प्रेषणीयता, सांगीतिकता, चित्रात्मकता सांकेतिकता, ध्वन्यात्मकता आदि गुणों के मूल में उनकी 'शब्द शक्ति' को सूंघने महसूसने की क्षमता है। वे एक साथ अभिधा, लक्षणा और व्यंजना का मारक इस्तेमाल करने वाले कथाकार हैं।... अपने सुदीर्घ रचनाकाल में अत्यन्त संक्षिप्त रचनाओं की सूची प्रस्तुत करने वाले शिवमूर्ति के कथासाहित्य ने आज के दौर में एक दुर्लभ सी लगने वाली ख्याति और विश्वसनीयता दोनों अर्जित किया है। यही कारण है कि अल्प लेखन के बावजूद शिवमूर्ति हिन्दी कथा साहित्य में विश्वसनीयता के किसी 'हालमार्क की तरह हैं। 
प्रसिद्ध आलोचक राहुल सिंह - लमही, अक्टूबर-दिसम्बर 2012 पृष्ठ 40
14- शिवमूर्ति हिन्दी कथा साहित्य में एक ऐसा नाम है जिसकी अपनी एक अलग पहचान ही नहीं बलिक जो सामाजिक जीवन के गंभार सरोकारों और संवेदनाओं की एक विशिष्ट निर्मिति के चिंतक भी हैं। शिवमूर्ति की कहानियों में ग्रामीण जीवन की विषमताएं और अन्र्तविरोध नग्न यथार्थ के रूप में अभिव्यकित पाते हैं। जहां जाति व्यवस्था की गहरी जडे़ं मानवीय सम्बन्धों को छिन्न-भिन्न करती दिखायी देती हैं। जहां स्त्री और दलित को लगातार गहन यातना और विवशता में जीना पड़ता है। शिवमूर्ति ग्रामीण जीवन की जटिलताओं और विषमताओं को अभिव्यक्त करने में सिद्धहस्त कथाकार हैं। 
वरिष्ट दलित चिंतक और कथाकार ओम प्रकाshshr वाल्मीकि - लमही, अक्टूबर-दिसम्बर 2012 पृष्ठ 42
15 - शिवमूर्ति की कहानियों को पढ़ते समय उनके स्त्री पात्रों की मनोदशा को हम उनके साथ घटित हो रही घटनाओं के सन्दर्भ में जिस बेचैनी, उत्सुकता व संवेदना के साथ महसूस करते हैं वह अदभुत है। किसी भी अन्य कथाकार की कहानियां पढ़ते समय ऐसा महसूस नहीं होता। प्रेमचंद की कहानियां पढ़ते समय भी नहीं। इसका मुख्य कारण है शिवमूर्ति द्वारा इन कथापात्रों के संवादों में आम बोलचाल की खाटी अवधी भाषा का इस्तेमाल। इस भाषा में अभद्र गालियों, मुहावरों व आक्षेपों का नैसर्गिक व भरपूर इस्तेमाल होता है। कलात्मक आलोचना की दृषिट से देखा जाय तो शिवमूर्ति एक नया ही सौन्दर्य शास्त्र गढ़ते नजर आते हैं। वे अपने स्त्री कथा पात्रों को उतने ही सुन्दर अथवा दीन हीन रूप में हमारे सामने लाकर खड़ा कर देते हैं जैसे वे वास्तविक जगत में होते हैं। इन कथा पात्रों में बाल-विवाह की त्रासदी व कुपोषण तथा गरीबी की शिकार बहुएं हैं, पतिनयां हैं, मायें हैं, वृद्धायें हैं। 
शिवमूर्ति की कहानियां स्त्री विमर्श की कहानियां हैं।... उनका स्त्री विमर्श समाज की उन निम्नवर्गीय औरतों के शारीरिक व आत्मीय सौन्दर्य, दैहिक ताप व उत्पीड़न जिजीविशा, प्रतिरोध, राग द्वेश परिवारिक क्लेश आदि पर केनिद्रत हैं जो दूर दराज के गांवों में घर जवार की सीमाओं में कैद होकर अपना जीवन गुजार रही हैं। इनमें अनपढ़, गरीब, विस्थापित बाल ब्याहता, श्रमिक शोशित व उपेक्षित वर्ग की साधारण स्त्रियों  का जिंदगीनामा है, जिसमें न हार की फिक्र है, न जीत की। बस संघर्ष ही संघर्ष है, वेदना ही वेदना है। 
प्रसिद्ध कवि व आलोचक उमेश चौहान - लमही, अक्टूबर-दिसम्बर 2012 पृष्ठ 57-64
16 - शिवमूर्ति पाठकों को इसलिए रूचते हैं क्योंकि उनके यहां शिल्प है, शिल्प सजगता नहीं, कला भरपूर है लेकिन कलाबाजी नहीं। विचार है लेकिन विचारधारा का आतंक नहीं। जीवन दर्शन है लेकिन दार्शनिकता का घटाटोप नहीं। जाति असिमता की चेतना है लेकिन जातिवादी जहर नहीं। वे पाठकों से बातियाते हैं उन्हें बतलाते नहीं।... शिवमूर्ति में पर्यवेक्षण गजब का है।... उनके पास असंख्य लोकगीत, लोककथाएं लोकवार्ताएं और कहावतें हैं। 
प्रसिद्ध कथाकार सृंजय - लमही, अक्टूबर-दिसम्बर 2012 पृष्ठ 163
17 - शिवमूर्ति की कहानियां दलित असिमता को र्पुनपरिभाषित करती हैं। वे दलित असिमता के बारे में कहते ही नहीं, उसे सिद्ध भी करते हैं। शब्द दर शब्द, पंकित दर पंकित, कहानी दर कहानी, वह निरन्तर दलित और वंचित वर्ग की असिमता का साहित्य रचते रहे हैं।... शिवमूर्ति ने कम लिखा है लेकिन थोडे़ में ही बहुत लिखा है। जरूरत है, उसमें गुंथे हुए सूत्रों को बिलगाने की, उन्हें समझने की। वह अपनी बिल्कुल अलग तरह की कहानियों की दुनिया के फक्कड़ और बिना पगड़ी के सरदार हैं। 
कथाकार विवेक मिश्र - लमही, अक्टूबर-दिसम्बर 2012 पृष्ठ 162
18 - शिवमूर्ति ग्रामीण जीवन के विश्वसनीय कथाकार है। किसान जीवन को अपनी रचना का विषय उन्होंने किसी साहितियक प्रवृतित या साहित्यक आकांक्षा के तहत नहीं अपनाया है। वे ग्रामीण और किसान जीवन के सहज जानकार हैं। उनका व्यकितत्व रहन सहन बोली बानी- सब कुछ ग्रामीण और किसानी है, एक आंतरिक ठसक के साथ। जितने विनम्र हैं उतने ही दृढ़। यह भी लगता है कि उन्हें अपने लेखन के प्रति आत्मविश्वास है। इस आत्मविश्वास का आधार रचित वस्तु की गहरी सूक्ष्म और व्यापक जानकारी है। निजी फर्स्ट हैंड जानकारी। 

मरण फांस से पार जाने की छलांग

प्रसिद्ध आलोचक डा. विश्वनाथ त्रिपाठी - मंच जनवरी - मार्च 2011 पृष्ठ 32
19 - 'कसार्इ बाड़ा' और 'तिरिया चरित्तर से लेकर 'आखिरी छलांग तक का जो परिदृष्य है वह समकालीन भारत का यथार्थ रूप है। परिवार, थाना, कोर्ट, कचेहरी, स्त्री, दलित, किसान, धर्म, साम्प्रदायिकता, खेती, नौकरी सबसे जो एक समग्र चित्र निर्मित होता है, वह असुन्दर और दागदार है। 'रंगे सियार' भरे पडे़ हैं। थाना दारोगा के वास्तविक चित्र कर्इ कहानियों में हैं। शिवमूर्ति ने झूठ को कर्इ रूपों में चित्रित कर यह बताया है कि यह सर्वत्र फैला हुआ है।
शिवमूर्ति का कथा संसार
प्रख्यात आलोचक रविभूषण - मंच जनवरी - मार्च 2011 पृष्ठ 43
20 - जब वे (शिवमूर्ति) गोष्ठियों में बोलते हैं तो उनका सीधे सादे पूरबी गंवर्इ मानुष का चोला उतर जाता है और हम अपने एक जहीन और सुलझे हुए बुद्धिजीवी को पाते हैं जिसका अध्ययन मनन और चिंतन दो टूक और वस्तुनिष्ठ है। हां, कटु आलोचना, पीठ पीछे निन्दा और किसी को भी नीची नजर से देखने का व्यसन उनमें नहीं है। वैसे भी साहित्यकारों के सभी फितरती ब्यसनों से वे दूर हैं, सिवाय एक के। इस हातिमतार्इ में बस एक ही कमजोरी है- नारी सौन्दर्य के प्रति अदम्य आकर्षण। सुन्दर स्त्री को देख कर वे मन ही मन प्रणाम करते हैं। विधाता की किसी भी अनुपम कृति की सहराहना न करना इनकी दृष्टि में अक्षम्य अपराध है। 
कसार्इबाडे़ में बुद्ध
वरिष्ठ कथाकार राजेन्द्र राव - मंच जनवरी - मार्च 2011 पृष्ठ 103

21 - शिवमूर्ति की कहानियां अपनी अन्तर्वस्तु और कथारस के लिए ज्यादा प्रशंसित हुर्इ हैं।... शिवमूर्ति ने अपनी कहानियों से सिद्ध किया कि कथारस वह चीज है जिसके साथ रचबस कर अन्तर्वस्तु पाठक की आत्मा तक उतर जाय और उसे रोमांच और सौन्दर्य से भर दे। या पाठक को ऐसी बेचैनी और तनाव में ले जाय कि उसकी नींद ही उड़ जाय। आप यकीन करिए, 'तिरिया चरित्तर' कहानी पढ़ने के बाद मैं और मेरी पत्नी उस रात ठीक से सो नहीं पाये थे। 
दलित यथार्थ और स्त्री संवेदना के अप्रतिम कथाकार 
वरिष्ठ कथाकर मदन मोहन  - मंच जनवरी - मार्च 2011 पृष्ठ 105
22 - शिवमूर्ति में प्यार और अनुराग का वह गहरा भाव ही रहा है जो उनकी कहानियों में न केवल मनुष्य के प्रति छलकता दिखायी पड़ता है बलिक मनुष्येतर जीव जंतुओं के प्रति भी ममत्व और नेह में कोर्इ कमी दिखलायी नहीं पड़ती। इस सन्दर्भ में अपने समकालीनों के बीच शिवमूर्ति एक ऐसे विलक्षण कथाकार हैं जिनमें संवेदना की अनंत गहरायी है। इसके अनेक साक्ष्य उनकी कहानियों में सहज ही उपलब्ध हैं। 
दलित यथार्थ और स्त्री संवेदना के अप्रतिम कथाकार 
वरिष्ठ कथाकार मदन मोहन - मंच जनवरी - मार्च 2011 पृष्ठ 104
23 - शिवमूर्ति भले किसी खास संगठन से न जुडे़ हों लेकिन उनके लेखन में विचारधारा सुस्पष्ट है। आप उन्हें पढ़िये। उनकी कहानियों में एक विशेष प्रकार का कथारस है जो आप को बांधे रखता है। शिवमूर्ति की रचनाओं से यह साबित होता है कि किसी संगठन विशेष से न जुड़ कर भी विचारवान या विचारयुक्त लेखक बनना सम्भव है। शिवमूर्ति एक विचारवान लेखक के रूप में ही सामने आते हैं।... और एक अजीब बात मुझे लगी जो किसी बडे़ अधिकारी में नहीं होती। जिस पद पर वे कार्यरत थे वहां तमाम प्रकार की सुख सुविधाएं हर प्रकार की सम्पन्नता थी, उसके बावजूद उनके अंदर एक साधारणता थी। मैंने देखा, शिवमूर्ति के अंदर एक बहुत ही सहज और सामान्य व्यकित है। उनकी साधारणता की असाधारणता ने मुझे बहुत आकर्षित किया। 
वरिष्ट कथाकार अब्दुल बिसमिल्लाह
मंच जनवरी - मार्च 2011 पृष्ठ 239
24 - शिवमूर्ति हमारे समय के अत्यन्त महत्वपूर्ण कथाकार हैं। किसी भी नये हिन्दी पाठक या अहिन्दी भाषी पाठक को हिन्दी साहित्य से स्नेह हो जायेगा यदि उसे शुरू में शिवमूर्ति की कहानियां पढ़ने को मिल जाये। उनकी सभी कहानियां जीवन के अनुभवों से छन कर निकली हुर्इ हैं इसलिए उन्हें पढ़कर आप एक साथ भौचक आहत, उदास और स्पनिदत होते हैं तथा निखर जाते हैं। आप भौचक होते हैं क्योंकि वे जिस संवेदना को प्रशस्त करते हैं उसका मर्म आपके भीतर गड़ जाता है। आप निखर जाते हैं क्योंकि साहित्य, कला आपको उदात्त कर देती है। उनकी कहानियों से आप अपने समकालीन समाज, राजनीति, गरीबी, जातिवाद, छलप्रपंच और शोषण के अनेकानेक रंग और तरीकों से वाकिफ हो जाते हैं। 
कथाकार ओमा शर्मा
संवेद अंक 73-75 पृष्ठ 234
25 - जिस कथाक्षेत्र से शिवमूर्ति आते हैं वहां उनका किसी से कोर्इ मुकाबला है ही नहीं। वहां फिलहाल वे अकेले राज करते नजर आ रहे हैं। 
कथाकार राजकुमार गौतम - संवेद अंक 73-75 पृष्ठ 235
26 - शिवमूर्ति के उपन्यासों और कहानियों से यह साबित होता है कि हिन्दी कथा साहित्य प्रेमचंद की परम्परा को भूला नहीं है। भारतीय ग्रामीण जीवन की अनेक त्रासदियों के कथाकार हैं शिवमूर्ति, एक ओर उनकी कहानियों में गांव की स्त्रियों की अपार यातना का दर्द है तो दूसरी ओर उपन्यास में किसान जीवन की तबाही के कारणों और रूपों की पहचान। किसानों की आत्महत्या की समस्या उनके उपन्यास 'आखिरी छलांग' की केन्द्रीय समस्या है। 
वरिष्ठ आलोचक मैनेजर पांडे, वागर्थ जून 2014 पेज 24
27 - गहरी अंतर्दृष्टि एवं उचित परिप्रेक्ष्य के अभाव में जहां समाज व राजनीति के बडे़ मुददे भी सरलीकृत होकर रह जाते है। वहीं सरल सी दिखने वाली सतह की सच्चाइयां कैसे राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य प्राप्त करती हैं, इसका एक उदाहरण शिवमूर्ति का उपन्यास 'त्रिशूल' प्रस्तुत करता है। कलेवर में क्षीणकाय होने के बावजूद साम्प्रदायिकता और सामाजिक न्याय के मुद्दे को रोजमर्रा की घटनाओं के माध्यम से शिवमूर्ति ने प्रामाणित अभिव्यकित दी है। उपन्यास में महमूद की त्रासदी भारतीय समाज के सेकुलर माडल की त्रासदी है।... बाबरी मिस्जिद से जुड़ी घटनाओं एवं मंडल कमीशन की पृष्ठभूमि पर केनिद्रत यह औपन्यासिक कथा भारतीय जीवन में साझी संस्कृति एवं सामुदायिक जीवन में आती दरार को अत्यन्त बेबाकी के साथ उद्घाटित करती है। वर्णाश्रम व्यवस्था एवं व्राह्मणवादी संस्कृति की नग्न सच्चाइयों का खुलासा करने के साथ-साथ उपन्यासकार ने नयी शक्तियों के उभार के संकेत भी दिए हैं। शिवमूर्ति की लोकभाषा, लोकमुहावरे व लोकजीवन में गहरी पैठ है। उनकी ये सारी खूबियां नर्इ अर्थछवियों के साथ 'त्रिशूल में उपस्थित हैं। 
वीरेन्द्र यादव - 'नवें दशक में औपन्यासिक परिदृष्य' पहल पुसितका मार्च 1998 पृष्ठ 38 
28 - उपवमूर्ति ने नवे दशक में जिन गांवों को स्थापित किया वे नास्टेलिजया के गांव नहीं हैं। वे आज के गांव हैं। वहां के लोगों की निराशा, संघर्ष, जिजीविशा और रागद्वेष उनकी कहानियों में वास्तविक रूप में आये हैं, जैसा बहुत कम लेखकों के कथा साहित्य में पाया जाता है।... उपवमूर्ति का कथा साहित्य किसी सिफारिस का मोहताज नहीं है। उनका योगदान ग्रामीण और निम्नवर्ग के पात्रों को उठाने में है, जिन्हें और लोगों ने नहीं उठाया। 
प्रख्यात कथाकार मैत्रेयी पुष्पा : मंच जनवरी-मार्च 2011 पृष्ठ 237
29 - शिवमूर्ति का कथा साहित्य कर्इ साहितियक धाराओं से अन्त:सम्बद्ध है। पारम्परिक आंचलिक कथा साहित्य, दलित लेखन, अमरीकी डर्टी रियलिज्म और अफ्रीकी अमेरिकी ब्लैक साहित्य से। डर्टी रियलिज्म वास्तव में यथार्थवाद का ही एक उपवर्ग और साहितियक मिनिमलिज्म का एक प्रभेद है। उस पीढ़ी के कुछ लेखकों को चिन्हित करते हुए 'ग्रान्टा के सम्पादक बिल ब्रफोर्ड ने उनके लेखन को 'बेलिसाइड' (पेट की भूख का लेखन ) बताते हुए उसकी कुछ विशेषताएं निर्दिष्ट की थीं- कामेडी की छोर छूते हुए व्यंग्य, हिंस्त्र कोप अथवा गहरे अवसाद से विरूपित पात्रों के बिगाड़ के खुलासे, अनलंकृत किन्तु करूणा पर बल देती हुर्इ भाषा, सिथतियों के विवरण और उनके प्रति आत्मीयता की एक प्रच्छन्न धारा। शिवमूर्ति की कहानियां अकालदण्ड, कसार्इबाड़ा तथा भरतनाटयम मुझे इन्ही विशेषताओं से भरपूर लगती हैं। 'भरतनाट्यम' के उस बेरोजगार युवक के बारे में उसके पिता का वह भयावह कथन किसे याद नहीं रहेगा- साला चलता कैसे है, शोहदों की तरह। चलता है तो चलता है, साथ में सारी देंह क्यों ऐंठे डालता है। दरिद्रता के लक्षण हैं ए, घोर दरिद्रता के। और देखता कैसे है, शनिचरहा। इसकी पुतली पर शनीचर वास करता है। सोने पर नजर डालेगा तो मिट्टी कर देगा। 
इस युवक का वृतान्त हमें चार्ल्स ब्रकोवस्की के उपन्यास फैक्टोटम के नायक की याद दिलाता है। इस सन्दर्भ में मैं रेमंड कार्वर का नाम लेना चाहती हूं जिन्हे 'मिनिमलिज्म का उस्ताद माना जाता है। निचले दर्जे के मजदूर पात्रों को चित्रित करते हुए वे उन्हें ऐसे वाक्य दे डालते थे जो उनके पाठकों पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं : डोन्ट कम्पलेन, डोन्ट एक्सप्लेन (फरियाद मत करना। सफार्इ मत देना।) या- वी न्यू अवर डेज आर नम्बर्ड, वी हैड फाउल्ड अप अवर लाइव्ज (हम जानते थे कि हमारे दिन गिने चुने हैं। और हम अपने जीवन को उलझा चुके हैं) अपने कथा साहित्य में शिवमूर्ति ऐसी ही कुछ फाउल्ड अप लाइव्ज लाया करते हैं जो अपने उलझे हुए जीवन में परिवर्तन चाहते हैं या प्रतिशोध।
वरिष्ट कथा लेखिका दीपक शर्मा
संवेद 73-75 पृष्ठ 40-41
30 - शिवमूर्ति जमीन से जुड़े रचनाकार हैं। जनजीवन से जुडे़ होने के कारण उनके पास व्यापक जीवन अनुभव हैं। इस कारण उनकी रचनाओं में हमे हमारे समाज का बदलता हुआ चेहरा दिखायी देता है। अगर हमारे समय और समाज को समझना है तो शिवमूर्ति जी इसके लिए आवश्यक कहानीकार हैं। शिवमूर्ति का दर्जा काफी ऊंचा है। वे शीर्ष रचनाकारों में से एक हैं। हिन्दी साहित्य उन्हें उसी रूप में याद रखेगा। 
असगर वजाहत (वरिष्ठ उपन्यासकार तथा नाटककार) संवेद 73-75 अंक पृष्ठ 231 पर 
31 - शिवमूर्ति की 'तिरिया चरित्तर' पढ़ कर शेक्सपियर की याद आती है। शिवमूर्ति की कहानियों की जो बनावट है वह भी शेक्सपीयर जैसी है। उनके अंदर क्लासिक हाइट है जो ग्रीक नाटकों में होती है। उन्होंने कम लिखा और महान लिखा। 
वरिष्ठ कवि इब्वार रब्बी, संवेद 73-75 अंक पृष्ठ 231

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शिवमूर्ति के कुछ कथन
1. सिद्धान्तों से जीवन नहीं बना, जीवन से सिद्धान्त बने हैं। जैसे हाइड्रोजन और आक्सीजन एक खास अनुपात में मिलकर पानी बनाते हैं लेकिन पानी का गुण धर्म इन दोनों गैसों से बिल्कुल अलग हो जाता है। जिसे सृजन कहते हैं वह इस आनुपातिक योग का प्राप्य होता है। जैसे मुर्गी अण्डे को सेती है तभी अंडे के अंदर का पदार्थ जीवन मेंं बदलता है, उसी तरह सृजन की प्रक्रिया है।
2. कहानी लेखन आर्ट तो है ही साथ ही यह क्राप्ट भी है। कहानी में प्रभावी कन्ट्रास्ट पैदा करने के लिए आपको भिन्न गुण धर्म वाले शेड्स और करैक्टर पैदा करने होते हैं। सीधे सादे चरित्रों से कहानी कैसे निकलेगी। ड्रामा कैसे निकलेगा। 
3. सामप्रदायिकता और जातिवाद दोनों प्रमुख सामाजिक बीमारियां हैं। एक नागनाथ है तो दूसरा सांपनाथ। लेकिन जातिवाद साम्प्रदायिकता से ज्यादा विभाजनकारी है। सामप्रदायिकता समाज को दो हिस्सों में बाटती है लेकिन जातिवाद उसे खंड-खंड कर देता है। जातिवाद हमारे साथ पैदा होने के दिन से चिपक जाता है और मरने तक नहीं छोड़ता।
4. आदमी की संकीर्णता और स्वार्थ ने मार्क्सवाद की मूल संकल्पना का मटियामेट कर दिया है। हम अभी तक प्रजातंत्र से बेहतर शासनप्रणाली र्इजाद नहीं कर सके। उसी तरह मार्क्सवाद से बेहतर समतामूलक बैचारिकी का विकल्प नहीं मिला। उम्मीद करते है  कि हम आगे ऐसी कोर्इ प्रविधि खोज सकें जिससे प्रजातंत्र और मार्क्सवाद की कमियों और क्रियान्वयन की खामियों पर नियंत्रण किया जा सके। 
5. कभी-कभी मुझे लेखन की एब्सर्डिटी भी महसूस होती है... कि ज्यादा लिख करके भी क्या होगा? इसलिए वही लिखूं जिसे लिखते हुए सुख मिलता है। धीरे-धीरे लिखता हूं तो यह सुख लम्बा चलता है। लेखन में ही नहीं, मेरे जीवन के हर क्षेत्र में यह धीमापन मौजूद है। एक कप चाय पीने में मुझे आधे घंटे लग जाते हैं। कहानी का एक ड्राफ्ट करने में तीन महीने लग जाते हैं। मेरे मिजाज मे यह धीमापन कहां से आ गया? मेरी हृदयगति, मेरा सूगर लेबल, मेरी स्वासगति तीनों सामान्य से कम हैं। शायद यही कारण हो मेरे धीमेपन का।
6. कहानी लिखना मेरे लिए कबाड़खाने से पुर्जे खोज कर साइकिल कसने जैसा है। फ्रेम खोजा, रिम खोजी, हैंडिल खोजा, टायर खोजा और असंब्ल करके साइकिल तैयार कर दी। पता नहीं कुछ लोग एक सिटिंग में पूरी कहानी कैसे लिख डालते हैं। ऐसे लोग जीनियस होते होंगे। 
7. लेखन मैराथन दौड़ है। इसमें जल्दबाजी में कुछ नहीं हो सकता। तुरंत यानी इस्टैंट मे तो नूडल्स ही बन सकता है। सिरका के फर्मेटेशन में समय लगता है।  
8. लेखक जनोन्मुख हो और स्वतंत्रचेता होकर लिखे। जनपक्षधरता ही मेरी नजर में एक लेखक की राजनैतिक पक्षधरता है। 
कथाकार ओमा शर्मा को दिए साक्षात्कार में 
लमही अक्टूबर दिसम्बर 2012 पृष्ठ 13
9. अक्सर लोग पूछते हैं कि कहानी के लिए कला ज्यादा जरूरी है या प्रतिबद्धता? यह ऐसा ही है जैसे कोर्इ पूछे कि दायीं आंख ज्यादा जरूरी है या बायीं। कहानी माने लड़की, स्त्री। उसमें कला नहीं है तो वह निर्वसन है और प्रतिबद्धता या दृष्टि नहीं है तो अन्धी है। प्रतिबद्धता किसके प्रति? यदि कहानी को किसी स्थूल राजनैतिक विचारधारा का भोंपू बना देंगे तो भी साहित्य का महत्तर उद्देश्य क्षरित होगा। प्रतिबद्धता आमजन के कल्याण के प्रति होनी चाहिए। 
15-   -1997 की डायरी का अंश - लमही पृष्ठ 126
10. प्रकृति को एक खेल करना चाहिए। हर मरने वाले को एक मौका देना चाहिए, हजार दो हजार साल बाद वापस आकर इस दुनिया को, इसमें आये परिवर्तनों को देखने का। हर एक को नहीं तो कम से कम महान माने गये लोगों को। फराऊन को, बुद्ध को, र्इसा को, मोहम्मद साहब को, अरस्तू को, सिकन्दर को, गैलीलियो और न्यूटन को, तैमूर लंग को, कोलम्बस वगैरह को। यह महसूस करने के लिए कि कैसी दुनिया छोड़कर वे गये थे और कैसी हो गयी। 
12 दिसम्बर 2004 की डायरी से- लमही पृष्ठ 218
1. कहानी निबन्ध नहीं है। निबन्ध में सब कुछ लेखक बोलता है लेकिन कहानी में जब बोलने के लिए उसने पात्रों की पूरी फौज खड़ी कर दी तो फिर लेखक को बीच में बोलने की जरूरत क्यों पड़े ? इसका मतलब उसने गूंगे पात्र खड़े किए। उनके मुंह में जबान नहीं दिया। तभी तो लेखक को उनके पीछे खड़े होकर प्राम्पटिंग करनी पड़ रही है। यह कथाकार की असफलता है। 
सृजन का रसायन पृष्ठ .......
2. साहित्य का मूल आधार संवेदना है। किसी को रेडिक्यूल करना या किसी विचारधारा के पक्ष में स्थूल नारेबाजी करना रचना का मूल स्वर नहीं होना चाहिए। विचारधारा रचना में उसी तरह समाहित होनी चाहिए जैसे पानी में घुली हुर्इ चीनी। उसकी मिठास का स्वाद मिले लेकिन वह दिखे नहीं। जब तक चीनी दिखायी देती रहेगी, पानी में घुल कर अदृष्य नहीं हो जायेगी तब तक वह मिठास नहीं दे सकती। रचना में भी विचारधारा अलग से दर्ज नहीं होनी चाहिए। वह कहानी में अनुस्यूत होनी चाहिए। 
वृजेश यादव से बातचीत : संवेद 73-75 फरवरी-अप्रैल 2014 पृष्ठ 217 
3. यह कहना बहुत कठिन है कि कौन सा आलोचक किसी रचना को पूरा-पूरा समझता है। बाप बेटे को पूरी तरह नहीं समझता। पत्नी पति को पूरी तरह नहीं समझती। किसी के द्वारा पूरी तरह समझे जाने की अपेक्षा व्यावहारिक नहीं है। कोर्इ आलोचक किसी रचना को कितना समझ सकेगा यह इस बात पर निर्भर करता है कि उस आलोचक का वर्ण्य विषय से कितना तादात्म्य रहा है। उसका अनुभव क्षेत्र क्या है? उसकी दृष्टि क्या है? वर्गीय और वर्णीय दृष्टिकोण का भी असर पड़ता है।
वृजेश यादव से बातचीत : संवेद 73-75 फरवरी-अप्रैल 2014 पृष्ठ 217 
4. कथा के आलोचक को उसकी सृजन प्रक्रिया का ज्ञान होना चाहिए। कैसे कोर्इ विचार, घटना, दृष्य या बिंब रचना के रूप में परिवर्तित होता है, यह जानकारी हो। आलोचक से भी पहले वह रसज्ञ पाठक हो। कथा आलोचक कथाकार का दुश्मन या कम्पटीटर नहीं है। लेकिन उसे कथा क्षेत्र का हलाकू या तैमूर लंग भी नहीं होना चाहिए।
वृजेश यादव से बातचीत : संवेद 73-75 फरवरी-अप्रैल 2014 पृष्ठ 220 
5. लेखक की भूमिका योगी और भोगी की साथ-साथ होती है। सबसे सम्पृक्त और सबसे संवेदित। भोगी नहीं होगा तो अंदर तक धंसेगा कैसे? और योगी नहीं होगा, साधक नहीं होगा, एकाग्र नहीं होगा तो अपनी चित्वृत्तियों को चारों तरफ से मोड़कर अपने भीतर उतरेगा कैसे? दूरी बना कर नहीं रखेगा तो नि:संग होकर लिखेगा कैसे?
सृजन का रसायन पृष्ठ .........
6. कथा लेखक को आकड़ेबाज तो नहीं ही होना चाहिए, विशेषज्ञ भी नहीं होना चाहिए। विशेषज्ञता सहज बोध की दुश्मन है। आलोचक तो विशेषज्ञता अफोर्ड कर सकता है, कथा लेखक नहीं। विशेषज्ञता उसके 'लेखक के सिर पर चढ़ कर बैठ जायेगी। जैसे किसी पुजारी की डील या देंह पर देवता या भूत सवार हो जाता है। तब उस सवारी की जबान से देवता या भूत बोलने लगता है। लेखक को किसी की सवारी नहीं बनना चाहिए, उसे सावधान रहना चाहिए कि कोर्इ उस पर सवारी न गांठ सके। 
सृजन का रसायन पृष्ठ .........
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सहजता बातचीत को सार्थक व जीवन्त बनाती है

पुस्तक समीक्षा

सहजता बातचीत को सार्थक व जीवन्त बनाती है

कथाकार स्वाति तिवारी

साक्षात्कार मानवीय अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है। साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में यह विधा भेंटवार्ता, इंटरव्यू, बातचीत, मुलाकात और भेंट के रूप में खासी लोकप्रिय है। कह सकते हैं कि साक्षात्कार मतलब दो व्यक्तियों के बीच प्रश्न और उत्तर के माध्यम से विचारों का आदान-प्रदान या यूँ कहें किसी एक विशिष्ट व्यक्ति को जानना। किताबघर प्रकाशन ने प्रतिनिधि कहानियों की तरह हिन्दी सहित्य को समृद्ध करने वाले कालजयी रचनाकारों के साक्षात्कारों की भी एक श्रृंखला शुरू की है। यह एक अत्यन्त महत्वपूर्ण श्रृंखला इसलिए कही जा सकती है क्योंकि यह साहित्य विवेचन में रचनाकार के अंतर्साक्ष्य और बहिर्साक्ष्य दोनों ही से समान रूप से पाठकों की जिज्ञासाओं का समाधान करती है। साक्षात्कार लेने वाला देने वाले के दोनों साक्ष्यों से मिलता है फिर वह एक मिलाजुला साक्ष्य पाठक के सामने रखता है जो कहने को तो अन्तः साक्ष्य होता है पर वह उस व्यक्ति का एक बिम्ब पाठक के मन में शब्दों से गढ़ देता है। पाठक उस व्यक्तित्व से रू-ब-रू होता है। वे उसके व्यक्त्वि की एक परिकल्पना भी करने लगते हैं। 

संवेद ७३-७५ (कथाकार शिवमूर्ति पर एकाग्र)


Saturday, June 13, 2015

शिवमूर्ति के गाँव में - बलराम

शिवमूर्ति के गाँव में - बलराम 
     दिल्ली से चल कर लखनऊ के गोमती नगर स्थित विकास खंड-2 में बाबा महाबीर दास की कुटी पर टिकान और वहां से सीधे सुलतानपुर-अमेठी के गांव कुरंग में रात्रि विश्राम। राहुल गांधी के क्षेत्र अमेठी के गांव कुरंग से अगले दिन सुलतानपुर के प्रेस क्लब में पहुंचकर सोमेशशेखर चंद्र के उपन्यास ‘गंवई गंध गुमान’ की संगोष्ठी में भाग लिया और फिर अमेठी के जन जीवन और स्मारकों को देखने निकल पड़े। जायसी की मजार ही नहीं, उनका जन्म स्थान भी देखा। फिर उनके नाम पर बने शोधपीठ और पुस्तकालय को देखने गए, जिनकी हालत देखकर मन दुखी हो गया। 
गांव कुरंग में शिवमूर्ति के पुश्तैनी कुएं की जगत पर उनके साथ कुछ देर बैठकर कैशोर्य की बातें करते रहे। उस कुएं का ही पानी पीते-पीते शिवमूर्ति देश के सिद्ध-प्रसिद्ध कथाकार हो गए। ककई ईंटों और खपरैल वाला शिवमूर्ति का पुश्तैनी घर तब की याद दिलाता है, जब उसे छोड़कर उनके पिता महावीर साधु हो गए। तब दस-ग्यारह बरस के किशोर शिवमूर्ति के लचकते कंधों पर आ टिकी थी परिवार की जिम्मेदारी। बचपन मेें ही शादी हो जाने से जल्दी ही वे पति और फिर पहली बेटी रेखा के पिता बन गए तो पढ़-लिखकर कुछ करने-धरने के उनके सपने टूटने-टूटने को हो गए? लेकिन सरिता जैसी ग्रामीण पत्नी के अथक श्रम और आगे बढ़ने-बढ़ाने के हौंसले ने सन् 1972 में शिवमूर्ति को पहले तो गांव के पास पीपरपुर के आसलदेव माध्यमिक विद्यालय में मास्टर बनवाया। फिर रेलवे में नौकरी पाकर ढाई साल वे पंजाब में रहे। और फिर पीएससी की परीक्षा पास कर अफसर हुए और उत्तर प्रदेश शासन में काफी ऊंचे ओहदे तक पहुंचे। 
गांव में पुश्तैनी घर और सब कुछ को जस का तस सहेज-संभालकर रखते हुए ससुर के बनाए गए घर को सरिता ने शहरी सुविधाओं से युक्त कर दोमंजिला करवा लिया। लखनऊ के गोमती नगर की भव्य कोठी में रहने की बजाय गांव में रहना उन्हें ज्यादा रास आता है। बीसियों बीघे जमीन पर खेती-बाड़ी का काम खुद ही देखने-भालने वाली सरिता चाहतीं हैं कि शिवमूर्ति जमकर लिखें-पढे़ और फणीश्वरनाथ रेणु की तरह खूब नाम कमाएं, लेकिन शिवमूर्ति हैं कि लिखने में उनका मन ही नहीं नगता। बहुत हांके जाने पर साल दो साल में कभी-कभार एकाध कहानी लिखकर लंबी तान लेते हैं। हां, देशी-विदेशी लेखकों को पढ़ते खूब हैं और सभा-गोष्ठियों में जाते हैं तो वक्तृता के अपने अनोखे अंदाज में सबकी छुट्टी कर देते हैं। गालिब की तरह उनका अंदाजे बयां कुछ और ही, एकदम अलग होता हैं अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के आयोजन में हमने देखा था कि बडे़-बड़े विचारकों-चिंतकों की ग्रामीण जीवन संबंधी हवाई बातें सुनकर उत्तेजित हो गए और सीधी-सच्ची बातें कहते हुए श्रोताओं से खूब तालियां बटोरीं और चिंतक-विचारक हाथ मलते रह गए। प्रेमचंद के बारे में तो पता नहीं, लेकिन रेणु जब गांव जाते तो रिवाल्वर अपने पास रखते थे और कुरंग जाने पर शिवमूर्ति की जेब में भी हमने रिवाल्वर देखा तो पूछ लिया कि इसकी क्या जरूरत पड़ती है तो बोले, ‘क्या गांव और क्या शहर, हर जगह जड़ और जमीन हमेशा खतरे में रहती है। इसलिए सावधानी जरूरी होती है।’
सरिता भले ही वनस्पति विज्ञान की स्नातक न हों, लेकिन लखनऊ वाली कोठी से लेकर गांव कुरंग के अपने बाग तक सैकड़ों प्रजातियों के देशी-विदेशी पेड़-पौधों को पालते-पोसते हुए जब उनके हिंदी-अंग्रेजी नाम उच्चारती हैं तो विज्ञान के बडे़-बड़े प्रोफेसर तक दांतों तले अंगुली दबा लेते हैं। ऐसा कौन-सा अनाज है, जो अपने खेतों में उपजा नहीं लेतीं सरिता। अनेक सब्जियां और ज्यादातर फल उनके खेतों और बगीचे में उपजते हैं। गाय-भैंस से दूध-दही भी मिल जाता है। बड़ा-सा इनवर्टर भी घर में है, जो बिजली कटौती होने पर भी घर को रोशन रखता है। बीस-तीस लोग भी अचानक आ जाएं तो कुरंग स्थित सरिता-शिवमूर्ति के घर में सहज रूप से रह सकते हैं। सरिता को गांव-घर और शहर, सब एक साथ संभालते देखकर कोई भी कह सकता है कि हर सफल आदमी के पीछे सरिता जैसी कोई औरत जरूर होती है। 
लखनऊ में कई पिल्ले सहसा कार की चपेट में आकर मां समेत मारे गए। अकेला बचा पिल्ला आंसू बहाते हुए रो-रोकर हलकान हो रहा था कि सरिता की नजर पड़ गयी। उन्होंने उसके लिए दूध और पानी का इंतजाम ही नहीं किया, जतन से छायादार जगह में रखकर देखभाल करते हुए उसे बचा लिया। घर के सामने एक पेड़ बड़ा हो रहा है और वे चाहतीं हैं कि गांव के बाग में स्थानांतरित कर दिया जाए, पर डरती हैं कि उखाड़नें में कहीं जडें टूटने से वह सूख न जाए। एक लेखक की पत्नी का पेड़-पौधों और पशु--पक्षियों के प्रति ऐसा लगाव दुर्लभ है। लखनऊ तो लखनऊ, कुरंग में बूढे़ और खजहे कुत्ते को शहरी महिलाएं हाथ तक न लगाएं। गाय, भैंस, बछडे़, यहां तक कि बिल्लियां, जलमुर्गियां, मोर, तीतर, बटेर, नीलकंठ, महोक, बया, नेवले और सांप तक उनके घर के परिसर में पूरे अधिकार से रहते हुए प्यार-दुलार पाते हैं। गढ़ई किनारे घात लगाकर बैठे सांप महाशय धूप खाने के लिए बाहर निकले मेढक मोशाय का शिकार करने के बाद चुपचाप अपने बिल में चले जाते हैं। कुरंग में शिवमूर्ति के घर के आसपास ऐसे दृश्य आम हैं। 
शिवमूर्ति के पिता महावीर दास अपने जीवन काल में परिसर के कोने में एक जगह इंगित कर गए थे, जहां न रहने पर भी बने रहने का उनका बड़ा मन था। शिवमूर्ति के लाख मना करने पर भी सरिता ने उसी जगह ससुर की समाधि बनवा दी तो आने-जाने वाले लोग सहज श्रद्धा से वहां फूल चढ़ाने लगे। इस तरह शिवमूर्ति के घर में शिव की नहीं, पार्वती की चलती है। उम्र में थोड़ी बड़ी सरिता ने मां-बाप से टूटे-छूटे शिव (मूर्ति) को पाल-पोसकर बड़ा कर दिया। सो, एक दिन हमने उनका नाम शिव पाल रख दिया, सरिता शिवपाल। शिवमूर्ति हिंदी की बड़ी शख्सियत हैं तो होते रहें, हमें तो सरिता उनसे भी बड़ी, बहुत बड़ी शख्सियत लगती हैं। वे बड़ी न होतीं तो शिवमूर्ति भी इतने बड़े न हो पाते! हमने भी शिवमूर्ति के बड़ा होने में किंचित सहयोग उनके लेखन के आरंभ में किया। यह वह समय था, जब अकालदंड, सिरी उपमा जोग, कसाईबाड़ा और भरतनाट्यम जैसी अपनी कहानियों का पुलिंदा हमें सौंपते हुए अपने नाम से छपा लेने की बात कहकर शिवमूर्ति कानपुर से कहीं दूर, शायद बस्ती चले गये थे! फिर काफी समय तक उनसे हमारा कोई संपर्क न रहा। अगर उनकी उन कहानियों को हम अपने नाम से छपा लेते तो दुनिया उन्हें कथाकार शिवमूर्ति के रूप में शायद ही देख पाती, जैसे काफ्का को भी हम इस रूप में कहां देख पाते! माक्स ब्राॅड ने जलाने की बजाय काफ्का की रचनाएं प्रकाशित करवा दीं और हमने शिवमूर्ति की रचानाएं उन्हीं के नाम से छाप और छपवाकर एक बार फिर उन्हें लिखने-पढ़ने के झमेले में फंसा दिया। शिवमूर्ति का वश चले तो वे कभी कुछ लिखें ही नहीं, लेकिन अखिलेश और हरिनारायण जैसे मित्र उन्हें चैन ही नहीं लेने देते। उन्हीं के कारण शिवमूर्ति ने ‘ख्वाजा ओ मेरे पीर’ तथा ‘बनाना रिपब्लिक‘ जैसे कहानियों लिखीं और रवींद्र कालिया ने उन्हें ‘नया ज्ञानोदय‘ में ‘आखिरी छलांग’ लगाने के जिए विवश किया। 
तोल्स्ताॅय से शिवमूर्ति की कोई तुलना नहीं, सिवाय दोनों में एक जैसे फक्कड़पने के। तोल्स्ताॅय रूस के बहुत बड़े जमींदार थे, किंतु शिवमूर्ति उतने बडे़ नहीं हैं, लेकिन कुरंग में उनका गांव-घर, उनकी जमीन-जायदाद देखकर सहसा तोल्स्ताॅय के यास्नाया पोल्याना को देखने का मन हो आया। जिज्ञासा हुई कि तोल्स्ताॅय का घर भी क्या ऐसा ही रहा होगा, शिवमूर्ति के घर जैसा! ऐसा तो हो सकता है, लेकिन सरिता जैसी दिव्य नायिका तोल्स्ताॅय के घर और जीवन में कहां कोई थी?
शिवमूर्ति बड़ी कथा शख्सियत हैं तो होते रहें, हमें तो सरिता जी उनसे भी बड़ी, बहुत बड़ी शख्सियत लगती हैं। वे ऐसी न होतीं तो शिवमूर्ति भी आज ऐसे न होते। भरतनाट्यम, कसाईबाड़ा और अकालदंड जैसी अपनी कहानियों का पुलिंदा देकर मुझे अपने नाम से छपा लेने की इच्छा जाहिर कर शिवमूर्ति चले गए थ! अगर उनकी उन कहानियों को हम अपने नाम से छपा लेते तो दुनिया उन्हें कथाकार शिवमूर्ति के रूप में शायद ही देख पाती, जिस तरह काफ्का की इच्छानुसार उनके मित्र माक्स ब्राॅड ने उनकी रचानाएं जलाकर राख कर दी होतीं तो काफ्का को भी दुनिया इस रूप में कहां देख पाती। माक्स ब्राॅड ने काफ्का की रचानाएं जलाने की बजाय प्रकाशित करवा दीं और हमने शिवमूर्ति की रचनाएं अपने बजाय उन्हीं के नाम से छाप और छपवाकर लिखने के झमेले में उन्हें फिर से फंसा दिया। शिवमूर्ति का वश चले तो वे अभी भी कुछ न लिखें, लेकिन अखिलेश और हरिनायण जैसे मित्र उन्हें चैन ही नहीं लेने देते। उन्हीं के कारण शिवमूर्ति ने पिछले दिनों ’ख्वाजा ओ मेरे पीर’ तथा ‘बनाना रिपब्लिक’ जैसी कहानियां लिखीं और रवींद्र कालिया ने उन्हें ‘आखिरी छलांग' लगाने के लिए मजबूर किया, जो ‘तद्भव’, 'कथादेश’ और 'नया ज्ञानोदय’ में प्रकाशित होकर इस दिनों शहरी कथाकारों के सिर पर होरा भून रहीं हैं। खुदा खैर करे!

( लोकायत १६-३० अप्रैल २०१३ से साभार) 



Pride of Lucknow Award In Lucknow Leterary Festival


Sunday, May 17, 2015

जुल्मी

    'जुल्मी' मेरी शुरूआती कहानियों में से एक है लेकिन कब लिखी गयी, ठीक-ठीक याद नहीं। एक अन्य शुरूआती कहानी 'उड़ि जाओ पंछी' खोजते हुए पुरानी फाइल में यह मिल गयी। आज पढ़ते हुए यह बहुत बचकानी लगती है, लेकिन कहां से चलते हुए यहां तक पहुंचे, इसे जानने का यह उपयुक्त श्रोत है। कथा प्रत्रिका 'निकट' ने इसे अपने जनवरी 14 के अंक में प्रकाशित किया है। अब ब्लाग के पाठकों के लिए यहां प्रस्तुत है- 

जुल्मी

                                                                'शिवमूर्ति'
नहर की नाली पर घास छीलते हुए कोइली की नजर सामने दिख रहे अपने दुआर पर गयी। 
यह कौन है सफेद कपड़ों वाला? साइकिल लेकर पैदल चलता हुआ। दुआर वाले नीम के पेड़ की ओर बढ़ रहा है। उसके बप्पा ओसारे से निकल कर उसकी ओर जा रहे हैं। सायकिल खड़ी करके वह शायद बप्पा के पैर छूने के लिए झुका। 
उसकी नजरें वहीं जम गयीं। 
अब बप्पा ओसारे से खटिया निकाल कर नीम के पेड़ की छाया में ला रहे हैं। वह आदमी खटिया पर बैठ रहा है। 
बप्पा घर के अंदर गये। 
थोड़ी देर में अंदर से माँ निकली और उस आदमी को पंखा झलने लगी। वह शायद माँ का पैर छूने के लिये झुका। बप्पा बाल्टी लेकर कुएं की ओर जा रहे हैं।
कौन है यह आदमी? मेहमान।
इतना स्वागत तो मेहमान-खास मेहमान का ही होता है। और उसका जी 'धक' से रह गया। कहीं कामापुर वाला उसका भोला भंडारी तो नहीं। 
इतने दिन बल्कि इतने वर्षों बाद। सोचते ही उसके हाथ पैर कांपने लगे। तलुवे सुन्न होने लगे। पसीने-पसीने उसने मेड़ की टेक ले ली। 
इतने दिनों बाद सुध आयी? क्या जरूरत थी? वह मायके में ही उम्र काट देती। कौन यहां लडऩे के लिये कोई भौजाई बैठी है जो दिन काटना पहाड़ हो जायेगा। वह माँ से साफ-साफ कह देगी- नहीं जाऊँगी। जीते जी उनकी ड्योढ़ी नहीं लाघूँगी। आधी जवानी तो कट ही गयी। बाकी भी कट जायेगी। 
आंखे मुंदने लगीं। खुरपा हाथ से छूट गया। वह आंसुओं की बाढ़ में डूबती चली गयी। 
आठ साल बीत गये जब बिना अनवार के वह रोते हुये ससुराल से मायके आयी थी। उसका एकलौता भाई पेड़ से गिर कर बेहाश था और अस्पताल में भर्ती था। मां और बाबू जी उसके साथ अस्पताल में थे। घर पर दस-साल की छोटी बहन भर थी। बाप ने पड़ोसी के बेटे से उसकी ससुराल संदेश भेजा था- घर पर जानवरों को संभालने वाला कोई नहीं है। समधी भाई, इसी लड़के के साथ तुरंत बिदायी कर दें। या खुद पहुंचा जायें। 
पर ससुर ने इंकार कर दिया- आज कैसे भेज सकते हैं? कल घर में कथा-पूजन है। इसके बाद लिवा जायें। 
उसके पति ने अपने पिता से कहा भी- क्या पता ऊपर वाला कल तक की मोहलत न दें। आज जाने पर भाई का मुंह देख लेगी दादा। 
सास ने आकर ससुर को समझाया-जाने दीजिए। जब से सुना है, बहू का रोते-रोते बुरा हाल है। कहीं कुछ हो हवा गया तो अपजस लगेगा कि बहिन को भाई का मुंह भी नहीं देखने दिये हम लोग। 
पर नहीं माने बुढ़ऊ। पड़ोसी लड़का लौट पड़ा। 
उसने आँगन में पति के कुरते की टोंक पकड़ी-क्या कहते हो? बोलो!
पति 'महासिधवा'। बोला- बाबू की मरजी के खिलाफ मैं कैसे बोल सकता हूँ? वे घर के मालिक हैं। वह बाहर आकर ससुर के पैरों पर गिर पड़ी- बाबू। इतने 'कठकरेजी' मत बनिये। एक ही तो भाई है मेरा। 
-देखो बहू। तुम्हें जाना है तो जाओ। लेकिन जैसे बिना 'पठये' जा रही हो वैसे ही बिना 'आनने' का इंतजार किये लौट आना।
इतनी इजाजत भी बहुत थी। बस तैयार होने में जितनी देर लगे। पर वह लड़का तो जा चुका। 
उसने फिर पति से बिनती की-पाँच कोस जमीन है और सिर्फ घड़ी भर दिन बाकी है। अँधेरा हो जायेगा। चलिए छोड़ आइये। 
-बाबू जी गुस्सा होंगे। 
-किस माटी से सिरजा है आप लोगों को विधाता ने? मेरा भाई 'मरन सेज' पर है और आप लागों के मन में तनिक भी 'दरद-दरेग' नहीं उठता। 
वे फुसफुसाये थे- तुम 'पक्की' पकड़ कर चलना। मैं पीछे से नब्बू इक्केवान को भेजता हूँ। लेकिन यह बात बाबू जी न जानने पावें कभी। 
और ऊपर वाले की ऐसी मरजी कि नब्बू इक्केवान ही वापसी में संदेश ले गया- अपने दुलारे भइया का साला नहीं रहा। रीढ़ की हड्डी टूट गयी थी। नाक से भी खून निकला था। अगले शनीचर को तेरही है।
भाई की तेरही में आये बुढ़ऊ (ससुर)। दाढ़ी, मूँछ, सिर मुंड़वाया लेकिन मन के गुस्से को नहीं निकाल सके। बिना बिदायी की बात किये लौट गये। दुख की घड़ी में बिदायी के बारे में मायके में भी किसी ने नहीं सोचा। 
लेकिन कई महीने बाद जब सास ने बहू की बिदायी के लिये जाने को याद दिलाया तो बुढ़ऊ ने साफ-साफ सुना दिया- मैंने तो जाते समय ही कह दिया था, जैसे अपने पैरों गयी है वैसे ही लौटना भी होगा। मैं आनने नहीं जाने वाला। 
तब तक बुढ़ऊ को बेटे द्वारा नब्बू के इक्के से बहू को भेजने की बात पता चल गयी थी इसलिए कुछ दूर पर बैठे बेटे को सुना कर कहा था-इनसे मेहरिया का मुंह देखे बगैर न रहा जाता हो तो जैसे अपने भाड़े किराये से भेजा है वैसे ही जाकर लिवा लावें। लेकिन जाने के पहले अपना चूल्हा चौका अलग करते जायें। 
-तो क्या वे जिन्दगी भर अपनी बेटी को मायेकें में बैठाये रहेंगे? आप नहीं लायेंगे तो उनको दूसरा घर वर खोजने से कैसे रोकेंगे?
-कौन रोकता है? खोजें। उनको बीसों लड़के मिलेंगे हमको बीसों लड़कियाँ। पर इस घर में आना है तो खुद आवे। कोई लिवाने न जायेगा। 
यह बातें एक बार बाजार में मिलने पर नब्बू ने ही बतायी थी। उसकी माँ से फिर कहा था- काकी, आप ही एक जबान कह दें कि बेटी को उसकी ससुराल पहुँचा दो तो पहुँचा दूँगा। भाड़ा किराया भी न लूँगा। पर कोई कहे तो। 
हम अपने मुँह से आपको कैसे कह दें भइया? उनके घर में कोई मर्द मानुष न होता तो दूसरी बात थी। भला बेटी भी कभी माँ बाप पर भारी होती है। पर बहू की शोभा तो उसकी ससुराल में ही है। बुढ़ऊ नहीं आना चाहते न सही। एक बार नाऊ से, नहीं कूकुर से संदेश भेजवा दें कि उनकी बहू उनके घर भेजवा दो तो देखिये हम साड़ी-पिछौरी, कूंडा-दौरी और गठरी-मोटरी के साथ भेजवाते हैं या नहीं? इतना मान-गुमान भी ठीक नहीं। भगवान बड़े-बड़ों का गुमान तोड़ देते हैं। भाई का मुँह देखने के लिये आकर कौन सा गुनाह कर दिया मेरी बेटी ने। न आती तो जनम भर का पछतावा बना रहता। भगवान ने हम लोगों की जिंदगी में हमेशा-हमेशा के लिए अँधेरा भर दिया। उस घड़ी में बहू का आना उन्हें बुरा भी लगा हो तो हमारा दु:ख देख कर उन्हें माफ कर देना चाहिये था।
जमाई को अलग से समझाना- उनकी 'बियही' है। सात फेरा डाल कर अपनाया है। खेलने खाने की उमर में इतना 'बियोग' ठीक नहीं। 
समधिन से कहना- हम मूरख आदमी ठहरे। किस विधि से समझायें? पाँच-पाँच साल बीत गये। जवान जहान अहिबाती बेटी रांड की तरह दिन काट रही है। यह देखा नहीं जाता। गले के नीचे कौर नहीं उतरता। बुढ़ऊ तो लगता है खटिया पकड़ लेंगे। एक ओर बेटे के जाने का दुख दूसरी ओर बेटी के न जाने का। अकेले में पता नहीं क्या-क्या बुदबुदाते रहते हैं। 
शुरू में उसने खुद भी कम कोशिश नहीं की अपने 'मरद' और ससुर की मति पलटने की। अपनी सखी से कहकर ओझा से मुर्गे की बलि दिलवायी थी। माँ से कह कर सत्य नारायण की कथा करवायी थी। अगर बिना 'प्रसाद' लिये चले आने के कारण सत्य नारायण स्वामी नाराज हुये हैं तो कथा से प्रसन्न हो जायेंगे और जैसे कन्या कलावती के 'दिन बहुरे' वैसे ही उसके भी 'बहुर' जायेंगे। 
लेकिन उधर से कोई संदेश नहीं आया।
लोगों ने समझाना शुरू किया- सौ बेटियों में एक बेटी है आपकी। सुदर, स्वस्थ, कमासुत, लम्बी-तगड़ी, मेहनती। कब तक उन मूर्खों के आस में घर में बैठाए रहिएगा। इतने दिन हो गये। 'मनई' की चाहत होती तो इस तरह मुँह फेरे रहते? 'खेह डारिये' उन पर। बिदा कर दीजिए किसी खाते-पीते घर में। राज करे। नहीं तो कहीं ऊँचे नीचे पैर पड़ गया, दाग लग गया तो सात पुस्त तक नहीं छूटेगा। उनका तो बेटा है। कुछ कर भी गुजरा तो भोज-भात देकर बरी हो जायेगा।
माँ को समझाने की भला क्या जरूरत थी। उसने बप्पा की नाक में दम करना शुरू किया- बेटी को घर में बैठाये-बैठाये बूढ़ी कर डालना है क्या? कितनी तेजी से उसके बाल पक और झड़ रहे हैं, मालूम है। कल को हम दोनों की आँख मुॅद गयी तो उसेे किस कुएँ तालाब की शरण मिलेगी? उठाइये अपनी लाठी पनही। जाइये, पता लगाइये। बहुत लड़के मिलेंगे। 
बेटी को भी समझाया- क्या रखा है उस रिश्ते में। सोने जैसी जवानी गला कर रांगा कर रही हो, किसके लिये? लेकिन नहीं मानी बेटी- नहीं माई नहीं! मुझे दूसरे दुआर की लालसा नहीं है। तेरी ड्योढी पर ही जिंदगी काट दूँगी और तेरे जाने के बाद आग लगा कर 'भसम' हो जाऊँगी। 
थोड़े दिन पहले उसे नब्बू की मार्फत ही पता चला था कि बाप बेटे में उसे आनने को लेकर तकरार हुई है। नब्बू का कहना था कि अगर 'भात' खा लिये होते तो वे खुद ही लिवाने आ जाते। इस इलाके में दूल्हा तभी ससुराल आना जाना शुरू करता है जब एक बार उसे औपचारिक रूप से ससुराल से बुलावा आता है। उसके साथ दो एक नजदीकी रिश्तेदार आते हैं। सबको यथाशक्ति कोई नेग दिया जाता है- गाय, भैस, घड़ी, अँगूठी या साइकिल। इसे भात खाने की रस्म कहते हैं। बिना भात खाये ससुराल जाने वालों की बड़ी जग-हंसाई होती है। 
और वही हो गया। बिना भात खाये ही उसे उसके 'भोला भंडारी' को ससुराल आना पड़ा। उसने अपनी देह में नयी ताकत, नयी गुदगुदी का एहसास किया। उसने देखा, नीम के पेड़ के नीचे दो और चारपाइयाँ बिछ गयी हैं। चार-पाँच लोग आ गये हैं। बड़ी लानत मलामत हो रही होगी उसके आदमी की। उसे पति का भोला गंभीर जवान चेहरा याद आया। दो कछी धोती, नंगे बदन। गले में काले धागे में लटकी पीतल की ताबीज। पतली नरम रोयें वाली तनिक भूरी मूंछे। यही रूप पिछले आठ सालों से लगातार उसके मन पर छाया रहा है। 
-बहुत सिधवा है। एक भी बात का जवाब नहीं दे पा रहा होगा। 
सुहागरात में उसके अंदर आते ही वह खटिया से उठकर खड़ी हो गयी थी। कोने में मिट्टी के तेल की ढिबरी जल रही थी। रिश्ते की बुआओं और जेठानियों ने जब उन्हें अंदर ठेलते हुये कहा था- लेव। संभालो अपना धन और बाहर से जंजीर लगा कर चली गयी थीं तो वे आकर उसके बगल में खड़े हो गये थे। कंधे पर हाथ रखते हुए कहा था- खड़ी क्यों हो गयी। बैठो। 
बाँह थाम कर उन्होंने उसे खटिया पर बैठाया था। फिर खुद बैठे थे। वह लेटने को तैयार नहीं हुई तो खुद भी बैठे रह गये थे। रह-रह कर उसे अंकवार में भरते। उसका घूँघट खोलने का प्रयास करते और उसे काँपती पाकर छोड़ देते- जाड़ा लग रहा है क्या? अभी तो अगहन का महीना है।
मुँह देखे बिना ही एक जोड़ी पायल टेंट से निकाल कर 'मुँह-देखायी' में दिया था। अपने हाथ से पहनाया था। गोड़हरों के ऊपर। सच, इन पैरों को अपने हाथ से छुआ था उन्होंने। अपनी गोद में रखा था। वह छुअन कैसे भूल सकती थी। उसने हाथ बढ़ाकर पैर में पड़ी पायलों को सहलाया। 
कुल तीन ही बार का तो साथ रहा- दो साल के दौरान। पहली बार दो रातों का? दूसरी बार पन्द्रह और तीसरी बार दो महीने का, पर वे दिन कैसे मन पर आज तक छाये हुये हैं। 
खिलवाड़ी भी कम नहीं थे। पहली होली उसकी ससुराल में ही पड़ी थी। दिन में पिछवाड़े वाले आंगन में खूब भिगोया था और रात में 'फगुआ' सुनकर लौटे तो हरी-हरी गोलियां लाये थे। अपने हाथ से खिलाया था। मुझे क्या पता की भांग है। नशा करेगी। मीठी लगी। खाती गयी। थोड़ी देर में सिर चक्कर काटने लगा। बोलना कुछ चाहूँ और मुँह से निकले कुछ। बिना बात के हँसी छूटे। सास को पकड़ कर बार बार भींचू और गले लगाकर हँसू। 
सास ने उन्हें डॉटा- क्या खिला दिया तूने बहू को रे? सास ने गुड़ निकाल कर दिया- खा ले। नशा उतर जायेगा। पर उन्होंने गुड़ नहीं खाने दिया। ले लिया। माँ से कहा- इसे बाहर ठंडी चांदनी में घुमा देता हूँ। उतर जायेगी। 
बाहर लाकर उन्होंने उसे गोद में उठा लिया और थोड़ी दूर स्थित खलिहान में लाये थे। मड़ाई किये जाने वाले गेहूँ की पयार पर ही वह रात कटी थी। भूसे की सेज। उसे लगा वह आसमान में उड़ रही है। सारी रात उड़ती रही थी। 
भोर में सास के किवाड़ खोलने की चरमराहट सुनकर वह भागी आयी थी और सास की मीठी झिड़की खाकर अंदर भाग गयी थी। बालों में भूसा ही भूसा। कहाँ नहीं था भूसा। 
वैसे तो उसे चिढ़ाते थे- ढाई मन की धोबन। और उस रात कितनी आसानी से गोद में उठाकर भागे थे। 'बौरा' गये थे। 
-बुआ। दादी बुला रही है। 
 उसकी तन्द्रा टूटी। पड़ोसी की छह साल की बेटी सामने खड़ी थी। 
-काहें रे? 
-मेहमान आये हैं। रोटी बनानी है।
उसने लड़की को गोद में भर लिया और बार-बार उसका मुँह चूमने लगी। आँचल से उसकी आँख और मुँह पोंछा। छीली हुई घास खाँची में भरते हुये उसके पैर एक बार फिर काँपने लगे। आँखे धुँधलाने लगी। इस बार गुस्से और माख से। ये इतने 'लजकोंकर' क्यों हैं कि अपने परानी की हाल खबर लेने में आठ साल लगा दिये। ऐसे ही नहीं चली जायेगी वह। चार आदमी बैठाकर 'पद' करायेगी। उमड़ती जवानी माटी कर डाला। अपनी भी मेरी भी। 
घास की खांची उसने सिर पर रखा और लड़की को गोद में लेकर चली। अरे, खुरपा तो भूली ही जा रही है। उसके दुआर पर मेला जैसा लग गया है। पास पड़ोस के बीसों आदमी घेरे हैं। कैसे उन्हें देख पायेगी?
-लड़की थोड़ी समझदार होती तो उसी से पूछती। उसने लोगों की भीड़ के बीच एक झलक पाने की कोशिश की। पास से गुजरते हुए तो नजर उठ न पायेगी। उसे लगा कि पीठ की जो एक हल्की झलक मिली है वह उन्हीं की है। बहुत 'दुर्बल' हो गये हैं। सास ठीक से रोटी पानी न कर पाती होंगी। उसे तरस आने लगा। एक गीत की पंक्ति याद आयी-
घरवा मा खाया सामी सूखी भउरिया 
अउत्या हमरे नइहरे 
घिउ खिचरिया तोहैं खियउतिउं 
अउत्या हमरे नैहरे। 
सूखी 'भउरी' खा कर दुबराये हुए 'स्वामी' मेरे नैहर आओ। घी, खिचड़ी खिला कर तुम्हें फिर 'तैयार' कर लूँगी।
 आज आये हैं 'घी-खिचड़ी' खाने। समझो 'भात' खाने आये हैं। बाबू से कहूँगी भात खाने के नेग में भुअरी भैंस भी हंकवा दें साथ-साथ, बिदायी में। 
दुआर के नजदीक पहुँच कर उसने सिर का आंचल माथे पर खींच लिया। भीड़ के बगल से गुजरते हुये उसकी नजरे भले झुकी हैं पर 'वे' तो देख ही रहे होंगे। गोद की लड़की को देखकर पता नहीं क्या क्या सोच डालें भोले बाबा? वह लजा गयी। लड़की को वहीं उतारा और सिर की खाँची ओसारे में पटक कर आँचल से आँख-मुँह का पानी पसीना पोछते हुये आँगन में भाग गयी। कोने में खटोला बिछा था। वह उसी पर ढ़ह गयी। 
खटोले के बगल में पीढ़े पर बैठकर माँ ने उसका माथा सहलाना शुरू किया तो आँसुओं की बाढ़ नये सिरे से उमड़ आयी। 
माँ घबरा गयी- क्या हुआ रे? रोती काहे है? 
-तनिक दम लेकर नहा ले बेटी। ढंग के कपड़े पहल ले। रसोई करनी होगी। 
माँ मेहमान के बारे में कोई बात नहीं करती। क्यों नहीं बताती?
खाना बनाकर, ढंक कर वह रसोई से बाहर आ गयी- माँ, तू जाकर परस। 
-क्यों? तू क्यों नहीं परसती? 
-नहीं। कह कर उसने सामने की कोठरी में घुसकर किवांड़ बंद कर लिये। 
खाना खाने के लिये बाबू जी के साथ आँगन में बैठे मेहमान की एक झलक लेने के लिये दबे पाँव आकर उसने किंवाड़ की झिरी में आँख लगाया और 'झटका' खा गयी।
-यह कौन? खिचड़ी मूछों और झुके कंधो वाला। उसे दूसरे ढंग की झुरझुरी छूटी। वह मुड़ी और 'मूड़ोमूड़' करके खटिया पर पड़ गयी। 
मेहमान को खिलाकर माँ ने उसकी कोठरी के किवांड़ खटखटाये- खोल। आ तू भी खा ले। 
किंवाड़ खोलकर वह फिर लेट गयी- मुझे भूख नहीं है माँ।
-क्या हुआ? धूप लग गयी क्या? सिर दबा दूँ?
-नहीं यह बता, यह मेहमान कौन है? किसलिये आया है?
-कैसा लगा?
-क्या? उसकी शंका ने फन काढ़ लिये।
-बेटी कब तक हम लोग तुझे घर में बैठाये रहेंगे? बाप का अकेला बेटा है। औरत दो साल पहले मर गयी। कुल तीन 'परानी' हैं। आदमी की 'चाहत' रहेगी। सुखी रहेगी।
-मेरी रोटी इतनी भारी हो गयी माँ?
-सो बात नहीं बेटी। लेकिन हम बूढ़े-बूढ़ी कितने दिन के मेहमान हैं? हमारे आंख मूँदने के बाद तेरी कैसे कटेगी? और जब तक तू मेरी ड्योढ़ी छेंक कर बैठी रहेगी- मैं क्या चैन से मर सकूँगी। 
-अपने चैन के लिये तू अपने हाथ से फाँसी लगा दे माँ पर किसी और के लिये दुबारा घर से न निकाल। तू कहे और बप्पा की हेठी न हो तो मैं अकेले ही अपनी ससुराल चली जाऊँ।
-उन लोगों ने इसका भी मौका नहीं छोड़ा बेटी। तेरी 'गद्दी' संभालने कोई और आ चुकी है।
उसकी चीख निकलते-निकलते बची।
-हाँ बिटिया। छ: महीने हुये। उसके बाद ही तेरे बप्पा ने दौड़ धूप शुरू की तेरे लिए।
माँ ने पास पड़ोस की सहेलियों को बुलवा लिया- पास बैठ लो बेटी। उसका मन बहल जाय।
सहेलियों ने मजाक शुरू किया। साथ-साथ कंघी-चोटी।
-बहुत सेवा करनी पड़ेगी तुझे। भर कातिक जोते गये बैल की तरह टूटे हुये हैं जीजा जी।
-अरे ए छह महीने में 'तैयार' कर लेगी।
-तीन ही महीने में।
सामूहिक हँसी। चुहल।
-इस बार उसे आँचल के टोंक में ठीक से बाँध कर रखना। और जाते ही सबसे पहले सास-ससुर को कब्जे में करना।
उसे देखने के लिये मेहमान आँगन में आया तो उसकी पलकें बंद थीं और सांस तेज।
उसके मानस पर एक दो बार खिचड़ी बालों का अक्स उभरा लेकिन हर बार जल्दी ही उस पर नरम भूरे बालों की पतली मूँछों का रूप हावी हो गया।
ससुरू भेजा डोलिया कहरवां
हम गवनवा अउबै ना।
ससुर जी, हम गौने लायक हो गये हैं। जल्दी डोली कहार भेजिए।
डोली कहार तो आये लेकिन वहां से नहीं जहां से इंतजार था।
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चैत नवरात्रि के पहले मंगल को लगने वाला गूदर बाबा का मेला इलाके का मशहूर मेला है। आसपास के दस-पंद्रह कोस के ग्रामीण यहां लपसी, सोहारी चढ़ाने आते हैं। खासकर महिलाएँ। गूदर बाबा कौन थे? कब थे? कुछ पता नहीं। पर धीर-धीरे उन्होंने लोक मानस में महादेव का स्थान ले दिया है। 
पीर, डीह, और देवी-देवताओं की हैसियत उनके भक्तों की हैसियत के अनुसार ही घटती-बढ़ती है। गूदर बाबा लपसी, सोहारी के भोग से ही प्रसन्न हो जाते हैं। लपसी माने हलुआ का जनता संस्करण। आटा, गुड़ और पानी का अवलेह। सोहारी माने पूड़ी। जनता का पकवान। यही पकवान पाकर गूदर बाबा कुछ भी देने को तैयार हो जाते हैं।  
घर गृहस्थी चलाने की धुरी हैं औरतें। सोहारी, लपसी चढ़ाने का काम भी उन्हीं को। इसलिए इस मेले में औरतों और बच्चों की बहुतायत रहती है। पति, बेटे या बाप, सहयोगी के रूप में शामिल होते हैं। साइकिल के कैरियर या सिर पर जलौनी लकड़ी और आटा, गुड़, तेल की गठरी या छोटे बच्चों को कंधे पर लादने, संभालने के लिये। रंग-बिरंगी साड़िय़ों कपड़ों में लदी फंदी औरतों का गीत गाता हुआ झुंड एक के पीछे एक। चारों ओर से गूदर बाबा के धाम की ओर प्रस्थान करता हुआ। 
-मांग। क्या 'मांगन' माँगती है?
-बैल बीमार है बाबा। पति गंजेड़ी हो गया है। दूसरी औरत से 'अरझ' गया है या भविष्य सॅवारने वाले सपने। बेटा चाहिये बाबा। गोद नहीं भरी अभी तक। अगले जनम में भी मानुष जोनि मिले। सुअर कौआ होकर न जन्मना पड़े। 
कौन है जिसके पास कोई दुख न हो। कोई सपना न हो। पूरा इलाका उमड़ पड़ता है। कितनों की मनोकामना बाबा लगे हाथ पूरी कर देते हैं। नया मचनाहा साथी दे देते हैं। वे माँ-बाप, गाँव-देश का मोह छोड़कर यही से सीधे कलकत्ता, बम्बई, दिल्ली, लुधियाना की गाड़ी पकड़ लेते हैं। पार करें गूदर बाबा।
कोईली अपने दोनों बच्चों और पति के साथ भोर में गूदर बाबा के मेले के लिये निकली। गूदर बाबा का धाम उसके घर से तीन कोस पड़ता है। सबेरे पहुँचिये तो 'कराही' चढ़ाने में भीड़ का सामना नहीं करना पड़ता। दोपहर से भीड़ बढ़ जाती है। एक बड़ी गठरी पति के सिर पर। तीन साल की बेटी उसकी गोद में और तेल की शीशी हाथ में। आठ साल का बेटा कभी पैदल कभी बाप के कंधों पर। 
थान के चारों तरफ कई बीघे में आम और महुए का बाग फैला है। हर गाँव का मेला अलग-अलग पेड़ के नीचे डेरा डालता है। चार-चार पाँच-पाँच के समूह में जमीन खोद कर चूल्हे बन जाते हैं। कड़ाही चढ़ जाती है। तेल, घी, और गुड़ की महक! धुँआ। पूरा क्षेत्र महकने लगता है।
थान पर टिकरी चढ़ाकर उसने दोनों बच्चों का माथा टेकाया। पति को माथा टेकने के लिये कहा। फिर खुद सिर को आँचल से ढक, आँचल का खूँट दाँत से पकड़, माथा टेक कर माँगन माँगा। -इसी तरह कल्यान से रखो बाबा। अगले जन्म में भी यही पति यही बच्चे मिलें, सात जनम तक। लौटकर पति, बेटे को खिलाकर वह बेटी को गोद में डालकर 'परसाद' पाने बैठी। पति, बेटे को लेकर पिपिहरी भोंगारा खरीदने चले गये। 
अचानक दिल्लू बुआ प्रकट हुई।
-का हो धेरिया। कब से खोज रहे हैं? 
उसने उठकर जूठे हाथों आँचल का खूँट पकड़ा और बुआ के पैर छूकर तीन बार माथे से लगाया। 
दिल्लू बुआ उसे बहुत मानती थीं। उसकी पहली ससुराल कामापुर के पड़ोस में ब्याही हैं। जब वह गौने नहीं गयी थी बच्ची ही थीं तो अपनी ससुराल से लौटने पर दिल्लू बुआ उसकी सास के झूठे किस्से सुनाकर उसे चिढ़ाया करती थीं। उनकी एक बात उसे अभी तक याद है। बताया कि कोइली की सास की इतनी लम्बी पूँछ है कि उससे वह एक ही जगह बैठे-बैठे सारे घर में झाड़ू लगा देती है। और भी कई बातें...
-लगता है सब निबटा दिया? 
-हाँ बुआ! आप भी परसाद लीजिए।
-अभी नहीं। अभी हमारी टिकरी नहीं चढ़ी। 
बहुत दिन, दस-बारह साल बाद मिली थी बुआ। उसका हाल-चाल पूछती, अपना बताती रही। उसके खा लेने के बाद बोलीं- चल तुझे एक 'पहचानी' से मिला लाऊँ।
-किससे बुआ?
खुद ही देख और पहचान।
-पराना बुआ आयी हैं क्या?
पराना बुआ गवने गयीं तो कभी लौटकर मायके नहीं आयी। ससुराल वालों ने कभी बिदा ही नहीं किया। यहीं कहीं ब्याही गयी हैं। अब तो बूढ़ी हो गयी होंगी। बहुत पुरानी बात हो गयी। लेकिन उसके मायके में उनकी चर्चा होती रहती थी क्योंकि जब भी पराना बुआ को मायके का कोई आदमी मिलता वे एक-एक आदमी, रूख, बिरिछ, ताल, तलायी तक का हाल पूछती थीं। इस मेले में उनसे मिलने की संभावना बनती थी।
-चल, उठ।
कोइली ने अपनी कड़ाही, झोला बगल की औरत को सौंपा और बुआ के पीछे-पीछे चल पड़ी। बुआ उसे लेकर मेले के बाहर आयी और थोड़ी दूर के एक पेड़ की ओर ऊँगली उठा कर कहा- उस पेड़ के नीचे जा। 
उसने देखा, पेड़ के एक तरफ दो लद्दू घोड़े बंधे थे। एक तरफ एक खुली बैलगाड़ी खड़ी थी। उसके सामने दो सफेद ऊँचे बैल बोरे पर रखा भूसा खा रहे थे।
वहाँ तो कुछ दिखता नहीं बुआ। बताओ ना, कौन?
-तू अंदाज लगा।
-आप तो बुझौवल बुझाने लगीं। आप भी आइये। उसने बुआ का हाथ पकड़ कर साथ ले लिया। 
बैलगाड़ी की आड़ में एक आदमी खड़ा था। अकेला। कुरता-धोती। गले में मटमैला गमछा।
पास पहुँच कर बुआ ने उसकी गोद से बेटी को ले लिया। अब दोनों आमने सामने थे।
कामापुर वाला उसका भोला भंडारी।
दोनों ने भर नजर एक दूसरे को देखा फिर आदमी आगे बढ़ा। उसके ठीक सामने। दोनों की नजरें धुँधला गयीं। वे एक दूसरे के गले लग गये।
फिर कोइली ने कारन करके रोना शुरू किया। सुर ताल में रोना। रोना गाना, उलाहना साथ-साथ।
कौने कसुरवा ना, जुन्मी कौने कसुरवा ना।
देहला चित से तू उतारी, जुल्मी कौन कसुरवा ना। 
(ऐ जुल्मी! क्या था मेरा कसूर जो इस तरह चित से उतार दिया?)
दिल्लू बुआ ने आकर दोनों को अलग किया। दोनों ने अपने-अपने आंसू पोंछे और खर्च हो चुके पिछले पन्द्रह बरस की जिंदगी का हिसाब करने लगे।
-:0:-

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गोमती नगर, लखनऊ
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कहानी ऐसे मिली