Sunday, September 23, 2012

जैक लंडन के देश में

                                                            जैक लंडन के देश में




यात्रा वृतांत
शिवमूर्ति



भ्रमण का नशा और वह भी दुर्गम स्थलों का, मेरे साथ बचपन से रहा है। जब बच्चा था और गाँव की सीमा ही मेरे लिए दुनिया की सीमा थी तो अपने घर से पश्चिम सड़क पार करके जंगल में चला जाता था। वहाँ एक विशाल और गहरा तालाब था। नाम था वीरनतारा। वीरनतारा के तीन तरफ झाड़ियों, लताओं और विशाल वृक्षों का घटाटोप था। उनके बीच रास्ता खोज पाना मुश्किल। अंदर घुसकर झाड़ी और पानी के संधि स्थल पर बैठ जाइये और दुनिया जहान की आँखों से ओझल हो जाने का आनंद लीजिये।
और बड़ा हुआ तो जिस-तिस के साथ बाजार, मेला, रिश्तेदारी, भोज-भात, जहाँ जाने का मौका मिला, जाता रहा। जिस साल दर्जा पांच पास किया, उस साल पड़ोस के साधू सुग्रीम दास के साथ पैदल मांगते-खाते अस्सी किलोमीटर दूर संगम नहाने चला गया। और बड़ा हुआ, रेलवे से परिचित हुआ तो कितने ही वर्ष उत्तर दक्षिण पूरब पश्चिम ट्रेन से बिना टिकट भ्रमण करता रहा। बच्चे हुए, नौकरी मिली तो उनको घुमाया, हिमालय और नेपाल के पहाड़, पूर्वोत्तर राज्य, दक्षिण, पश्चिम।
अंडमान निकोबार के बिंदु की तरह दूर तक फैले टापू, जैसे तालाब में छिछली मारने पर उसके गंतव्य बनते हैं और लद्दाख के बारे में पढ़ी गयी जानकारी बहुत सम्मोहित करते थे। वह भी देख आये। तब विदेश जाने का नंबर आया।
विदेश के दो लेखक मुझे सबसे ज्यादा सम्मोहित करते हैं। शेक्सपियर और जैक लंडन। पिछले वर्ष शेक्सपियर की धरती पर पहुंचने का अवसर मिला था। इस वर्ष अमेरिका के पर्यटन की शुरुआत जैक लंडन की कर्मस्थली सान फ्रांसिस्को से करने की योजना बनी।
बाप रे, दुबई से सान फ्रांसिस्को की साढ़े पन्द्रह घंटे की हवाई यात्रा। खाओ पिओ, सो जाओ। फिर खाओ पिओ सो जाओ। मेरे जैसा आदमी जिसको जीवन में बहुत कम हवाई यात्रा का संयोग मिला हो, निश्चय ही सोने को समय व्यर्थ गंवाना मानेगा।  इस समय में आस-पास के दृश्य देखा जाय। लेकिन दृश्य भी क्या। तीस-पैंतीस हजार फीट की ऊंचाई पर रूई के सफेद गोले जैसे बादलों के अलावा। वह थोड़ी देर बाद रात के अंधेरे में डूब गये। बस और ट्रेन में तो चलते समय शरीर थोड़ा -बहुत हिलता भी है लेकिन प्लेन में। लगता है जैसे कमरे में बैठे हों कुर्सी पर। इकोनामी क्लास की सीट। जेट लागिंग क्या चीज है यह पहली बार समझ में आया।
 इसकी तुलना में दिल्ली से दुबई तक सबेरे-सबेरे की गयी पांच घंटे की यात्रा तो जैसे पलक झपकते हो गयी थी।
दो दिसंबर 12 का सारा दिन संजीव जी के घर पर मित्रों से मिलने-जुलने, फोना-फोनी में बीत गया। शाम को 9 बजे विवेक मिश्र जी के साथ सुशील सिद्धार्थ जी आ गये। फिर पंकज शर्मा जी पाखी का नया अंक लेकर आ गये। खाते-पीते ग्यारह बज गये।
पंकज शर्मा हम लोगों के साथ हवाई अड्डे तक आ गये, यह बड़ा अच्छा हुआ। चेक इन शुरू होने और हम लोगों के भीतर प्रवेश करने तक हम लोग हिंदी से लेकर दुनिया जहान तक के साहित्य पर बात करते रहे। पंकज अच्छे आदमी हैं। सुसंस्कृत, मिट्ठभाषी और व्यावहारिक। पढ़ाई-लिखाई में तो अव्वल हैं ही।
इमिरेट्स एयरलाइन की एयरहोस्टेस के सिर पर घड़ा रखने की गेंड़ुली जैसी लाल पगड़ी ने मरजीना की याद दिला दी। चोरों के सरदार को चाकू मारने के पहले नृत्य के दौरान पहनी गयी पगड़ी। पर सुंदरता में तो भाई जार्डन एयरवेज की होस्टेसेज का कोई मुकाबला नहीं। पिछले बरस देखी गयीं उनकी सूरतें आँखों में बसी हुई हैं।
कस्टम क्लियरेंस पर लंदन के हीथ्रो हवाई अड्डे जैसी ही भीड़। हम हिंदुस्तानी इधर से उधर लाइन तोड़ने और आगे निकल जाने के जुगाड़ में लगे रहे। इतनी पुरानी और प्रिय आदत इतनी जल्दी परायी धरती पर उतरते ही कैसे छोड़ दें? अपेक्षाकृत जल्दी ही उन लोगों ने सबको निपटा दिया।
एयरपोर्ट के लाउंज में बैठकर साथी यात्रियों के निपटने का इंतजार करने के बाद बाहर आकर बस में बैठे तो पता चला कि पत्नी तो अपना पर्स लाउंज में ही भूल आयी हंैं। बाप रे। काटो तो खून नहीं। पासपोर्ट वगैरह कई जरूरी कागजात उसी में थे। आधे घंटे के करीब हो गये थे। अब कहाँ मिलेगा। लेकिन मैं गया। पर्स बेचारा कुर्सी पर अकेला बैठा हमारा इंतजार कर रहा था। आस-पास की भीड़ ने उसकी तरफ आँख उठाकर देखना भी गंवारा नहीं किया था। इंडियन्स तो बहुत दिख रहे थे। क्या हो गया इन लोगों को इस धरती पर उतरते ही? अपनी मूल प्रवृति ही भूल गये? जान में जान आयी।
होटल बेस्ट-वेस्टर्न का रूम काफी बड़ा और सजा-बजा था। बेडशीट और रजाई-तकिया की सफेदी के क्या कहने। बस, काफी कोशिश करने के बाद भी हम पति-पत्नी को उस मशीन से काफी बनाना नहीं आया। उसकी कमी देर तक गरम पानी से नहाकर पूरी की गयी। फिर छोटे से फ्रिज में धरी खाने-पीने की चीजों को यथासंभव बारी-बारी से निपटाया गया।
जो सिम तीन हजार रुपये सिक्यूरिटी के जमा करके लखनऊ से लेकर चले थे, वह एक्टिवेट ही नहीं हो पाया। यहाँ के दोनों सर्विस कनेक्शन उसे स्वीकार ही नहीं कर रहे हैं। टूर मैनेजर के फोन से अपनी कुशल-क्षेम का एसएमएस घर पर दिया। टूर मैनेजर का नाम है शावक। 60 के हुए, अभी शावक ही हैं। दो दिन में ही महसूस हुआ कि फोन साथ न रहने का भी अपना आनंद है। मजबूरी में ही सही इस आनंद का आनंद लेते रहे। अच्छा शहर है। ज्यादातर मकान बस दोमंजिले। सड़कें चौड़ी और साफ। आबादी बहुत कम और हरियाली बहुत ज्यादा। रात में खाना खाने के बाद देर तक घूमते रहे। सान फ्रांसिस्को और भारत के समय में साढ़े ग्यारह घंटे का अंतर है। जब भारत में लोग आफिस जाने के लिए निकलने को हुए तो हम सो गये।
नाश्ता दिव्य था। इतनी चीजें, क्या खायें, क्या छोड़ें? नाश्ते के बाद निकले खाड़ी देखने। सान फ्रांसिस्को की खाड़ी मशहूर है। जैक लंडन ने 13 साल की उम्र में एक छोटी सी जहाज छीनकर डकैती (पाइरेसी) करना शुरू कर दिया था। वाह, जैक लंडन का घर भी देखना है। ओकलैंड यहीं कहीं होना चाहिए।
पानी रात भर बरसा था, तेज हवा चल रही थी। सर्दी बढ़ गयी थी। बाप रे। इतनी ठंड के बारे में तो चेताया नहीं गया था। आसमान में काले-भूरे बादल दौड़ रहे थे। कभी-कभी हल्की झीसी भी पड़ने लगती थी। सबसे पहले भागकर स्वेटर, पुल ओवर वगैरह खरीदा गया। टोपी खरीदी गयी।
रेस्टोरेंट में बड़े-बड़े केकड़े भुन रहे थे। सेल्समैन उनकी बाहें फैलाकर ग्राहकों को आकृष्ट कर रहे थे। एक-एक बाह सवा-सवा फीट की। वजन होगा 4-5 किलो तक। देखकर ही डर लग रहा था।
टिकट लेकर क्रूज में बैठे। यह क्रूज गोल्डेन गेट ब्रिज तक घुमाने ले जाता है। सिंगल स्पान सस्पेंशन पर बना यह ब्रिज सान फ्रांसिस्को की पहचान है। पास में ही एक अन्य ब्रिज है-बे ब्रिज। एक तीसरा बन रहा है। 2030 तक बनकर तैयार होगा और दो द्वीपों को मिलायेगा। रास्ते में एक छोटा सा आईलैंड ध्यान आकर्षित करता है। इसके ऊपर जेल बनी हुई है, जिसमें पहले स्पेन के कैदी रहा करते थे। इनमें मूल अमेरिकन, जिन्हें रेड इंडियन कहते हैं, ज्यादा थे। क्या जमकर शिकार किया गया यहाँ रेड इंडियन्स का। अब नाम मात्र को ही बचे हैं। इस जेल को अब म्यूजियम बना दिया गया है।
लंच के बाद हम शहर देखने निकले। हमारी गाइड थी तीस बत्तीस वर्ष की दुबली-पतली लंबी हंसमुख लड़की एनी-डा। उसने बताया कि इंडियन्स के लिए मैं अनीता हूं, अंग्रेजी-दाँ के लिए एनी-डा। स्पेनिश लोगों के लिए कुछ और बताया। बताया कि उसका भाई भी गाइड है। नाम है सैम, भारतीयों के लिए श्याम, बंसी बजाने वाला। उसने हिंदी, पंजाबी, कन्नड़, अंग्रेजी और स्पेनिश में कई गाने सुनाकर सबको मोह लिया। बताया कि मेरे पिता बंगलूर से थे और माँ कैलीफोर्निया की। उसका पति अल्जीरियन है। कई धुनें सुनाकर बताया कि किन-किन हिंदी फिल्मों में स्पेनिश और अन्य यूरोपीय भाषाओं की धुनें चुरायी गयी हैं। बंगलूर से आयी दो कन्नड़ बहनों को उसने कन्नड़ का एक गीत सुनाकर प्रसन्न कर दिया। एक पेड़ दिखाते हुए उसने बताया कि इसका नाम है रेड वुड ट्री। लंबाई होती है 112 मीटर तक और उम्र होती है दो हजार साल। मकानों को दिखाते हुए बताया कि यहाँ 20 फीट चौड़ाई और 40 फीट लंबाई में बने एक मकान की कीमत है तीन से चार मिलियन डालर। और ऐसा नहीं कि आप ने खरीद लिया तो लगे मंजिल पर मंजिल बनाने। एकदम नहीं। जो बना है बस वही रहेगा। परिवर्तन नहीं कर सकते। मिलिटरी एरिया में ले जाकर उसने इन्सपिरेशन प्वाइंट या लव प्वाइंट दिखाया। साइकिल चालकों की ओर ध्यान आकर्षित होने पर उसने बताया कि इस शहर में 50 हजार बाइकर्स अर्थात साइकिल चलाने वाले हैं। हर फ्राईडे को बाइकर्स की मीटिंग होती है। सेहत बचाकर रखना है तो साइकिल चलाना ही होगा। साइकिल का नाम आते ही चाइना का नाम आ गया। उसने बताया कि यहाँ की आबादी के 30 प्रतिशत चाइनीज हैं। 15 फीसदी स्पेनिश, 15 फीसदी इटैलियन, पांच फीसदी अन्य एशियाई। बताया कि पास के आईलैंड की मेयर जीन क्वाल चाइनीज लड़की है। यहाँ की प्रथम भाषा अंग्रेजी और द्वितीय भाषा चाइनीज है।
जैक लंडन के बारे में पूछने पर उसे आश्चर्य और खुशी दोनों हुई। बताया कि वह सामने जो बस्ती है, वही है ओकलैंड। वही है जैक लंडन का घर और स्मारक। उसने बताया कि मैं भी ओकलैंड में ही रहती हूं। कहा कि जबसे मैं गाइड का काम  कर रही हूं, आप पहले एशियाई और पांचवें विश्व पर्यटक हैं, जिन्होंने जैक लंडन के बारे में पूछा है। ड्यूटी के बाद मैं आप को वहाँ ले जा सकती हूं।
जैक लंडन स्क्वेयर जाकर मन तृप्त हो गया। करीब एक दशक पहले इस स्क्वेयर पर चीमा मानुमेंट की स्थापना हुई है। काँसे की 18 फीट ऊंची आड़े उड़ते ईगल के धुले हुए पंख की पृष्ठभूमि में नारी मूर्ति। अद्भुत, अद्भुत। कितना संभालकर, संजोकर रखा है इस देश के लोगों ने अपने प्रिय लेखक की यादगार को। मन करता था इस मनोरम स्थल पर बैठे ही रहें। 

Thursday, September 13, 2012

भरतनाट्‌यम

यह  कहानी पत्रिका 'सारिका' के अगस्त १९८२ के अंक मे प्रकाशित हुई थी और मेरे कहानी संग्रह 'केसरकस्तूरी' मे संग्रहीत है । ब्लॉग के पाठकों के लिये यहाँ प्रस्तुत --
भरतनाट्‌यम

     ''भी भी तुझे भिनसार नहीं हुआ है क्या रे?'' बाप का क्रोध और घृणा से चिलचिलाता हुआ स्वर कानों में पड़ता है तो मैं झट से चादर फेंककर ठ बैठता हूं। बस एक मिनट की देर हो गर्इ। सोच ही रहा था कि अब उठूं, अब उठूं। पर उससे कोर्इ फर्क नहीं पड़ना था। डांट खाने का यह मौका बचा लेता तो वे कोर्इ और मौका ढूंढ़ निकालते, बल्कि डांटने का एक चांस खो देने की चिढ़ उन्हें और भी आक्रामक बना जाती। जिसने गाली-फटकार सुनाने की कसम ही खा ली हो, उससे कब तक भागा जा सकता है? उन्हें तो मेरे उठने, बैठने, देखने, चलने, यहां तक कि आंखों की पलकें उठाने-गिराने के ढंग तक में खराबी नजर आने लगी है.... ''साला, चलता कैसे है, शोहदों की तरह! चलता है तो चलता है, साथ में सारी देह क्यों ऐंठे डालता है, दरिद्रता के लच्छन हैं ये, घोर दरिद्रता के। मांगी भीख भी मिल जाए इस हरामखोर को तो इसकी पेशाब से मूंछ मुंड़ा दूंगा... और देखता कैसे है? शनिचरहा! इसकी पुतली पर शनीचर वास करता है। सोने पर नजर डालेगा तो मिट्‌टी कर देगा। ससुर, जम्हार्इ ही लेता रहेगा या चारपार्इ भी छोडे़गा? देख लेना, यह चारपार्इ भी दो महीने से ज्यादा नहीं चलेगी।''
         मैं झट चारपार्इ से नीचे उतरकर बिस्तर समेटता हूँ। चारपार्इ हटाने में जरा-सी देर होते ही वे चीखने लगेंगे, ''तोड़ डाल! धूप में न टूटे तो मिट्‌टी का तेल डालकर फूंक दे।'' अंदर दरवाजे में मेरी पत्नी जांत चला रही है। शायद काफी देर से लगी है। तीन-चार किलो आटा मेड़री के गिर्द इकट्‌ठा हो गया है। चेहरे पर पसीने की धाराएं बह रही हैं। ब्लाउज पसीने से तर है और आंचल नीचे सरक गया है। वह सिर उठाकर मुझे देखती है। स्वच्छ, चमकती हुर्इ बड़ी-बड़ी आंखें। उसके स्वस्थ, सुडौल और युवा शरीर को देखकर मेरे मन में कुछ होने लगता है, पर मैं आगे बढ़ जाता हूं। जब से जाड़ा कुछ कम हुआ, मैंने पत्नी के साथ सोना बंद कर दिया है। ओसारे में अकेले सोने लगा हूं। जब से पत्नी को तीसरी लड़की पैदा हुर्इ, बाप की बड़बड़ाहट ने लाज और मर्यादा की सारी सीमाएं तोड़ दीं। एक घंटा दिन रहते ही चरखा शुरू कर देते हैं, '' साला, शाम होते ही मेहरारू की टांगों में घुस जाता है। चार साल में तीन पिल्लियां निकाल दीं। खबरदार! अगर चौथी बार मूस भी पैदा हो गया तो बिना खेत-बारी में हिस्सा दिए अलग कर दूंगा।''
         लगातार तीन-तीन बच्चियों को जन्म देने के बाद भी पत्नी की शारीरिक भूख भले ही कम न हुर्इ हो, पर मेरी भूख जरूर कम हो गर्इ है। अब तो हफ्ते-दस दिन में एकाध घंटे का मौका ही काफी है। फिर भी, जाडे़-भर बाप की गालियां और ताने सहते हुए मुझे घर में यानी पत्नी के साथ सोना पड़ा था, क्योंकि ओढ़ने की समस्या थी। दोनों बड़ी लड़कियां अपनी दादी के पास सोती थीं और हम दोनों के हिस्से में एक रजार्इ पड़ी थी, जिसमें इस साल एक तीसरा जीव भी हिस्सेदार बन गया था। यद्यपि पत्नी ने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की थी कि बाप के तानों और गालियों की परवाह किए बगैर मैं उसके साथ ही रात में सोता रहूं किंतु मेरी हया पूरी तरह मरी नहीं थी और जाड़ा कुछ कम होते ही मैंने एक सेकंड-हैंड कंबल खरीदकर ओसारे में सोना शुरू कर दिया था। सोचा था, इससे बाप की गालियां कम हो जाएंगी। जी हां! बाप ही कहना ठीक लगता है। लगता है 'बाप' नहीं, 'बाघ' कह रहा हूं। दोनों ही के नाम पर मेरे आगे लाल-लाल आंखें कौंध जाती हैं। 'पिताजी' संबोधन उनके लिए ठीक नहीं बैठता। मेरे खयाल में 'पिताजी' बहुत ही पालतू, सीधा-सादा जीव होता होगा, जो प्राय: शहरों में पाया जाता होगा या फिर प्राइमरी अथवा मिडिल स्कूल का चोटी-धोतीधारी 'गुरूजी' होता होगा।
        चारपार्इ रखकर बाहर आते हुए एक बार फिर पत्नी पर नजर डालता हूं। उसकी आंखों की चमक सही नहीं जाती। महीनों हो गए हैं उससे सहवास को। उसके असाधारण स्वास्थ्य से अपनी तुलना करने पर हीन भावना उभरती है। सारी उमर किताबों में गुजार दी। थोड़ा भी ध्यान देता तो कम-से-कम देह-मुंह से तो देखने लायक रहता। बाहर मंड़हे में पिताजी बड़बड़ाए जा रहे थे। (चलिए, एकाध बार पिताजी भी कह लेता हूं।) उनके बड़बड़ाने का तात्पर्य यह था कि बड़ा भार्इ एक घंटे रात रहते ही खेत में जा चुका है और यह साला डिप्टी कलक्टर की तरह दोपहर को चारपार्इ तोड़कर उठता है। बीच-बीच में वे मां के साथ यौन-संबंध स्थापित करने की धमकी भी देते जाते हैं। मैं उनकी बातों की परवाह किए बगैर शौच के लिए नहर की तरफ बढ़ जाता हूं। दिल में कुछ हौल मारने लगता है। मैं लाख बेरोजगार होऊं, लेकिन पिताजी की तरह बदनाम तो नहीं हूं, मेरे चरित्र पर कोर्इ उंगली तो नहीं उठा सकता। उनके हमजोली उनके बारे में बताते हैं। बहुत कुछ सुनने को मिलता है। चोरी-चकारी के मामले में ये बदनाम हुए थे। औरतों के पीछे हाथ-पैर ये तुड़वाए थे और आज बूढे़ होने पर मड़हे में शंकर भगवान, हनुमानजी और काली मार्इ के कैलेंडर टांगकर, शंख-घंटा बटोरकर, कंठीमाला लटकाकर और चंदन-टीका लगाकर महंत बन गए हैं। मेरी नजर में तो जितनी कुमार्गी और ढोंगी पुरानी पीढ़ी रही है, उसकी चौथार्इ भी नर्इ पीढ़ी नहीं है। फिर भी लोग नर्इ पीढ़ी को मुफ्त में....
        रास्ते में गड़ही के किनारे मां गोबर पाथ रही है। एक नजर मेरी तरफ डालती है, निर्विकार, निर्लिप्त और फिर सिर नीचा करके हाथ चलाने लगती है। अरसा हो गया मां से कोर्इ बात किए हुए। जब से मैं सेक्रेटेरिएट की क्लर्की से निकाला गया, उसने बोलना ही बंद कर दिया है। मुझे बड़ी पीड़ा होती है। कभी-कभी तो रोना आ जाता है। अपनी सगी मां सिर्फ इसलिए मौन साधकर बेटे को जला रही है, क्योंकि उसका बेटा, जिसे उसने पेट काटकर, एक-एक पैसा जोड़कर चौदह वर्ष तक पढ़ाया, बेकार बैठा हुआ है। आशा रही होगी कि उसका पैसा मय सूद के वापस आएगा, लेकिन मूल भी डूबता देखकर यह असहिष्णु और आक्रामक हो उठी है। इसकी अभिव्यकित वह मेरे प्रति मौन व उपेक्षा प्रदर्शित करके तथा मेरी पत्नी के प्रति उसके बाप और भार्इ से उसका यौन-संबंध जोड़कर करती रहती है। उसका विश्वास है कि पहले मैं बड़ा ही लायक और भाग्यवान था, पर जब से मेरी कुलच्छनी पत्नी इस घर में बहू बनकर आर्इ, इस घर में शनीचर की पैठारी हो गर्इ। मैं मां को बेहद प्यार करता हूं। पिताजी के अत्याचार और तानाशाही तले वे तिल-तिल करके जली हैं। मेरे पास हजार रूपए होते तो मैं उनके पैरों पर रखकर आज ही मना लेता पर...मुझे देखकर वे अपना हाथ गोबर पर और जोर-जोर से पटकने लगती हैं। लगता है, यह हाथ गोबर पर नहीं, मेरे गालों पर पड़ रहा है-थप्प, थप्प! और मेरे चेहरे पर गोबर छोप उठा है।
      नहर में ही स्नान करके मैं वापस आता हूं। तब तक पिताजी पूजा पर बैठ चुके हैं। पांच मिनट के हनुमानचालीसा और दो-चार इधर-उधर के दोहे-सोरठों के सहारे वे पता नहीं कैसे दो घंटे काट देते हैं? मैं तार पर अपना गीला जांघिया डालने लगता हूं, तभी मेरी बड़ी लड़की आकर बताती है, ''रोटी बन गर्इ है।'' मैं अंदर जाने लगता हूं तो पिताजी टोकते हैं, ''दूध बच्चों के काम भर का ही होता है। जीभ को कंटरोल में रखने की आदत डालो।'' जब से भैंस बियार्इ है, शायद ही कभी मैंने अपने मुंह से दूध मांगा हो और बिना मांगे कौन कहे, मांगने पर भी उसके मिलने के कोर्इ लच्छन नहीं हैं। एक बार खाना खाते समय पत्नी ने जाने कैसे एक गिलास दूध लाकर बगल में रख दि था। मुझे पता नहीं था कि इसे वह भाभी और मां की चोरी से दे रही है, लेकिन आखिरकार भाभी ने उसे देख ही लिया था। इसकी सूचना उन्होंने तुरंत मां को दी थी। मां ने आकर गिलास तो नहीं छीना, लेकिन झुककर, ऐन अच्छी तरह गिलास में झांककर उन्होंने तसल्ली कर ली थी कि भाभी का अभियोग रार्इ-रत्ती सच था। मुझे इतना मलाल हुआ कि दिल में आया, दूध का गिलास उठाकर आंगन में फेंक दूं। निश्चय ही यह मां और भाभी के मुंह पर तमाचा मारने जैसी बात होती, पर मैं भी क्या कम घटिया हूं! पावभर दूध का लालच कर गया था। और उसके बाद पत्नी को हफ्तों नहीं, महीनों भाभी और मां के ताने सुनने पड़े थे- 'सांड़ बनाना चाहती है भतार को। तीन-तीन बेटियां बियाने के बाद भी गर्मी कम नहीं हुर्इ है, पलटन तैयार करने की कसम खाकर आर्इ है मायके से। इस हरजार्इ की कोख में लड़का  फल सकता है भला!''....  पर मेरी पत्नी अब भी कभी-कभी मौका पाकर, सबके लेट जाने के बाद रात में गरम दूध का गिलास मुझे दे जाती है। इसमें सहज स्नेह कम और एक निहित स्वार्थ अधिक होता है। विचित्र स्वार्थ!
        सबको पता है कि भैंस दोनों जून में मिलाकर पांच सेर दूध देती है, जिसमें से एक तोला भी बेचा नहीं जाता। बेचने की जरूरत भी नहीं है। खेती में कम-से-कम इतना तो पैदा हो ही जाता है कि पूरे परिवार के खाने-पीने के लिए पर्याप्त हो सके। बच्चों की जरूरत का हवाला देना भी बेमानी है, क्योंकि इस घर में सिर्फ भाभीजी के दोनों लड़कों को ही यह छूट है कि वे जब जितना चाहें दूध पी सकते हैं। मेरी बच्चियों को खाना खाते समय जो मिल गया, सो मिल गया।
        कपडे़-लत्ते देने के मामले में भी यही पक्षपात होता है...और बच्चों में भी कोर्इ अवचेतन शक्ति अवश्य निहित होती है, जिससे वे बिना बताए आसपास के वातावरण की अनुकूलता-प्रतिकूलता का अनुमान लगा लेते हैं। मैंने कर्इ बार देखा है, जब अमर और विनोद आंगन में दूध पी रहे होते हैं, मेरी बच्चियां भाभीजी के गिर्द खड़ी होकर चुपचाप हरसरत-भरी नजरों से खाली होते गिलासों को टुकुर-टुकुर ताकती रहती हैं, पर कभी भूलकर भी हठ नहीं करतीं कि वे भी अमर और विनोद की तरह दूध पीएंगी। उनमें इतनी दीनता कहां से आ गर्इ? उनमें बाल-सुलभ जिद क्यों नहीं है? जन्म लेते ही इतनी प्रौढ़ता कैसे आ गर्इ? ज्यादा दिनों की बात नहीं हुर्इ, मैं ताखे पर कोर्इ किताब ढूंढ रहा था, अमर और विनोद दूध पीने के बाद जूठा गिलास आंगर में रखकर बाहर निकल गए थे, तभी मेरी ढार्इ साल की मंझली लड़की डरी-डरी-सी चौकन्नी नजरों से आसपास देखती हुर्इ आंगन में आर्इ और एक गिलास उठाकर मुंह से लगा लिया, पर गिलास में सिर्फ फेन शेष था, जिसे उसने उंगली से चाटना शुरू कर दिया। उसके चेहरे पर गहराया हुआ आत्मतोष उभर रहा था, तभी बाहर से हरहराती हुर्इ भाभी आंगन में आर्इं। गुस्से से पैर पटकती हुर्इ बाहर जाकर दोनों लड़कों को पीटने लगीं, ''हरामजादो! पीना नहीं होता तो पूरा गिलास क्यों भरा लेते हो? कंजडि़यों को पिलाने के लिए?''
        रसोर्इ में जाकर पीढे़ पर बैठ जाता हूं। भाभी मुझे देखते ही किसी काल्पनिक व्यक्ति या परिस्थिति के विरूद्ध भुनभुनाने लगती हैं। सिंकी हुर्इ रोटी को कठौते में इतनी जोर से पटकती हैं, जैसे कठौता-कठौता न हो, सात दुश्मनों का सिर हो। मैं जानता हूं, भाभी की कल्पना का यह सिर मेरे अलावा किसी और का नहीं हो सकता। उनके चेहरे पर गुस्सा है। भाभी के चुचके चेहरे पर गुस्सा आता है तो उनकी कुरूपता और भी बढ़ जाती है। बचपन में डाइन या चुड़ैल की जो कल्पना करता था, भाभी उसी का साक्षात प्रतिरूप नजर आती हैं। शायद यह गुस्सा खाना बनाते-बनाते तंग आ जाने के कारण है। कोर्इ और कार्य होता तो अब तक यह कभी का मेरी पत्नी के जिम्मे पड़ चुका होता। लेकिन भंडार का मामला। इसकी चाभी सौंपने का मतलब है, पूरी गृहस्थी का चार्ज सौंप देना, जो संभव नहीं है। भाभी एक थाली में कुछ रोटियां और शाम का बना साग रखकर मेरे आगे सरका देती हैं। ठंडे साग को गरम कर दिया होता तो एकाध रोटी और खार्इ जा सकती थी।
        बगल की कोठरी में पत्नी बड़ी लड़की को डांट रही है। मैंने कभी इन लड़कियों पर अपना प्यार प्रकट नहीं किया। सच तो यह है कि चौबीस साल की उम्र में तीन बच्चों का बाप हो गया हूं, यह सोचकर ही रोना आता है। दिल में आता है, मंड़हे में पूजा कर रहे बाप का शंख-घडि़याल उठाकर गड़ही में फेंक दूं। आखिर क्या अधिकार था उन्हें पांच साल की उम्र में मेरी शादी करने का? कभी-कभार पत्नी के सामने अपनी नसबंदी कराने का प्रस्ताव रखता हूं तो वह इतनी गमगीन हो जाती है, जैसे मैं उसका गला काटने का प्रस्ताव रख रहा होऊं। मेरी कमर के गिर्द लिपटी उसकी बांहें सुन्न पड़ जाती हैं। उसकी नजर में बैल बधिया करना और आदमी की नसबंदी करना एक ही बात है।
        उसे कितनी बार समझा चुका हूं कि दोनों में बहुत फर्क है। नसबंदी के बाद भी सब कुछ पहले जैसा ही होगा, सिर्फ बच्चे नहीं होंगे। वह आश्वस्त नहीं होती और पलटकर दूसरा तर्क करती है, '' कोर्इ लड़का तो होना चहिए, बेटियों से क्या होगा?'' यह तर्क मुझे भी वजनदार लगता है, लेकिन लड़का आएगा कब? वह कहती है, ''क्या पता इस बार...'' क्या घर, बाहर, हर जगह मैं फालतू माना जाने लगा हूं। मेरी बेटियां मुझे ''बाबू' (पिताजी) कहकर नहीं बुलातीं। बडे़ भार्इ साहब को वे 'बाबू' कहती हैं, क्योंकि बाजार से कोर्इ चीज लाने पर वे घर के सभी बच्चों में उसे बराबर-बराबर बांट देते हैं। इस उदारता के लिए उन्हें भाभी जी का प्रबल बिरोध सहना पड़ता है, पर उन्हें कोर्इ कुछ कहे, परवाह नहीं। सबेरे खेतों में जाते हैं तो एक घंटा रात बीते ही वापस आते हैं। दोपहरी खेत में गडे़ माचे पर ही काट देते हैं। कभी किसी फसल की रखवाली का समय हुआ तो दो-चार रातें भी माचे पर ही कट जाती हैं। हद दर्जे के शांत और मितभाषी। कभी किसी बात पर मेरी उनसे तकरार हुर्इ हो, याद नहीँ पड़ता। मैं घर से पूरी तरह विरक्त नहीं हो गया हूं, इसके पीछे उनकी भलमनसाहत का बहुत बड़ा हाथ है। इतने लंबे-चौडे़ डील-डौल वाले भार्इ साहब की यह परमहंसी मुद्रा आश्चर्य में डाल देती है।
        मैं आंगन में बैठकर हाथ-मुंह धोने लगता हूं। तभी रूक- रूककर रोती हुर्इ बड़ी बेटी, पत्नी के हाथ का भरपूर झापड़ खाकर चिल्लाते हुए एक हाथ में तख्ती-बस्ता और दूसरे हाथ में मिट्‌टी की दवात पकड़े बाहर की ओर भागती है। मैं बिना उसका कोर्इ नोटिस लिए मुंह पोंछता हुआ पत्नी की कोठरी में घुस जाता हूं। शायद मैं एकांत चाहता भी था। पत्नी अपना बक्सा खोलकर उसके सामने बैठी है। कुछ निकाल अथवा रख रही है। मुझे देखकर खड़ी हो जाती है। मौन, बड़ी-बड़ी आंखों से ताकने लगती है। जितनी उसकी जबान चुप है, आंखें उतनी ही मुखर। कुछ गुस्सा या खीज है, फिर भी कितनी स्निग्ध, कितनी आकर्षक! दिल में प्यार उमड़ पड़ता है। आगे बढ़कर बाहुपाश में घेर लेता हूं। वह पिघल जाती है। सिर मेरी छाती से टिका देती है। नतसिर। उसकी पीठ थपथपाते हुए पूछता हूं, ''शहर जा रहा हूं, कुछ मंगाना है?''
            ''बेटी के लिए किताब लेते आइएगा।''
            ''और! अपने लिए कुछ?''
            ''मेरे लिए क्या!'' वह अलग हो जाती है।
        मैं पिताजी के पीछे-पीछे मंड़हे में घुसते हुए कहता हूं, ''लाइए!'' पिताजी मुड़कर मेरी तरफ भरपूर नजरों से घूरते हैं। फिर टेंट से रूपए की थैली निकालने लगते हैं। उनकी नजर सामने कुएं पर लगी है, जहां मां पानी भर रही है। पिताजी नोट गिनते हैं- पूरे एक हजार। जब मां बाल्टी लेकर कुएं से चल पड़ती है तो नोटों को मेरे हाथ में रखते हैं और हाथ जोड़कर कहते हैं, ''इसके बाद भी अगर मेरा पिंड छोड़ दोगे तो समझूंगा, तुमने गयाजी में मेरा जीते-जी पिंडदान कर दिया।'' मैं बिना कुछ बोले रूपए लेकर चल पड़ता हूं। पीछे से पिताजी हिदायत देते हैं, ''वाजिब जगह पर खर्च करने से चूकना नहीं। दलाल को हर तरह से खुश कर लेना।''
         रास्ते में मां मिलती है, भरी हुर्इ बाल्टी लेकर, माथे पर ताजा सिंदूर लगाए हुए। मुझे टोकती है, ''जा रहे हो?'' इसका यह मतलब बिलकुल नहीं कि मां मेरे प्रति सहज हो गर्इ है। यह टोकना, माथे में सिंदूर लगाकर रास्ते में पानी से भरी बाल्टी लेकर मिलना, सब पिताजी द्वारा जुटाए गए सगुन हैं, मेरी यात्रा सफल बनाने के लिए। पिताजी ने इसी तरह मेरी जाने कितनी यात्राएं सफल बनाने के लिए सगुन का इंतजाम किया है, लेकिन....
        खेतों को पार करके सड़क पर आ जाता हूं और टैक्सी या बस की राह देखते हुए बस-अड्डे की तरफ बढ़ता हूं। आज मैं अपने नाम से सस्ते गल्ले की दुकान का लाइसेंस लेने शहर जा रहा हूं। सारा काम हो चुका है, सिर्फ अफसर के दस्तखत होने बाकी हैं, लेकिन इसी जरा-से काम के लिए बीस-इक्कीस दिन से दौड़-दौड़कर शहर जाना पड़ रहा है। अब जाकर समझ में आया है कि मैं अपनी ही गलती से परेशान हो रहा हूं, दलाल ने मुझ पर तरस खाकर समझाया था, ''मुफ्त में दस्तखत नहीं होते, मिस्टर! माना कि तुम अनइम्प्लायड ग्रैजुएट हो। तुम्हें प्रेफरेंस मिलना चाहिए, लेकिन इसी लाइसेंस के लिए समुझ बनिया डेढ़ हजार देने को तैयार है। साहब निरबंसिया तो हैं नहीं। अभी दो बहनों की शादी करनी है....बुरा न मानना। नाम तुम्हारा जरूर ज्ञान है, लेकिन अकल-ज्ञान का सारा रास्ता तुमने बंद कर रखा है।''
         ठीक कहा था दलाल ने। मेरे ज्ञान के रास्ते सचमुच बंद हैं। वह आठ सौ पर उतर आया था, लेकिन मुझे वे भी अधिक लगे थे। आज मिलने का वादा करके लौट आया था। पिताजी को बताया तो लगे गालियां देने, ''तुम्हें कभी अकल आ ही नहीं सकती ससुर के नाती। इस तरह के बिचकर्इ सबको नसीब होते हैं?...गदहे को भी चौदह साल पढ़ाया जाता तो आदमी बन जाता, लेकिन तू....''
        मुझे अपनी गलती समझ में आ गर्इ है। आज गलती नहीं करूंगा। बस या टैक्सी मिलने की उम्मीद न देखकर मैं इक्का पकड़ता हूं। धूप खुलकर निकल आर्इ है। रबी की फसल कट गर्इ है और सड़क के दोनों तरफ वीरान खेत फैले हैं। गेहूं की पीली खूंटियों-से पीले, महत्वाकांक्षाहीन! मेरे मन की तरह रीते और उदास!
         ''गुरूजी, नमस्कार!'' हाथ प्रत्युत्तर में जुड़ गए हैं, जी जुड़ गया है। लड़कों का साइकिल पर शहर से लौटता हुआ झुंड! पहचान लेता हूं। अपने पढ़ाए हुए लड़कों को कौन नहीं पहचानेगा! तीन-चार साल पहले जो चेहरे यतीमी लगते थे, शहर की हवा लगते ही चिकना गए हैं। जाते-जाते एक लड़का चिल्लाकर सूचित करता है, ''पंडितजी सस्पेंड हैं, गुरूजी!'' पंडितजी यानी प्रिंसिपल साहब। सस्पेंड! जरूर कोर्इ रूपए-पैसे का मामला होगा। पूरे विद्यालय को पता था कि मेरी प्रिंसिपल साहब से नहीं पटती। लड़के ने यह सूचना निश्चय ही मुझे खुशखबरी के तौर पर दी है।
        मेरा मन अतीत में लौट जाना चाहता है। ग्रैजुएट होने के बाद साल-भर भटकने पर भी मैं कहीं खप न सका तो घर वालों का धीरज छूटने लगा था। पिताजी आए दिन समझाते (गालियां देना तब शुरू नहीं किया था) कि इस तरह बेकार घूमना बेइज्जती की बात है... और जब मेरे प्रयासों से निराश हो गए तो स्वयं 'स्थानीय प्राइवेट हार्इ स्कूल' के मैनेजर-अध्यक्ष आदि के पीछे-पीछे घूमने लगे। आखिरकार मैं गणित अध्यापक हो गया। दस्तखत करने वाली तनख्वाह डेढ़ सौ और मिलने वाली पचहत्तर रूपए। 'मिलने वाली' से पांच रूपए प्रतिमाह अनिवार्य रूप से बिल्डिंग फंड में कट जाते थे।
        पिताजी को बहुत खुशी हुर्इ थी। रिश्तेदारों तथा पड़ोसियों को महीनों घेर-घेरकर बताते रहे थे कि ''देर से ही सही, लड़के को उसकी पढ़ार्इ-लिखार्इ के लिहाज से अच्छी जगह मिल गर्इ। तनख्वाह घट ही सही, लेकिन आगे बढ़ने का 'चानस' है। बी. एड. कर ले तो प्रिंसिपल तक हो सकता है।'' तनख्वाह मिलती कितनी है, इसे वे बड़ी सफार्इ से गोल कर जाते थे। कोर्इ बहुत कुरेदता तो तनिक अप्रकृतस्थ होकर कहते, ''दाल रोटी भर को मिल ही जाता है। और क्या रूपया गाड़कर रखना है? असल चीज है विद्यादान।''
         पर यह विद्यादान मैं अधिक दिनों तक नहीं कर सका। डेढ़ सौ पर दस्तखत करके सत्तर रूपए लेना अंदरूनी मामला था। इंटरवल में मैनेजर और अध्यक्ष के बेटे-बेटियों को नि:शुल्क ट्‌यूशन पढ़ाना तथा आठ पीरियड में से एक का भी 'वैकेंट' न रहना भी बहुत बुरा नहीं लगता था पर कुछ ऐसी स्थितियाँ भी आती थीं, जिन्हें झेल पाना असह्य हो उठता था। मैनेजर या अध्यक्ष के घर कोर्इ उत्सव होता तो स्कूल के अध्यापकों को वहां व्यवस्था संभालने के लिए पहुंचना होता था। वहां आए आगंतुकों में से कोर्इ यह जानना पसंद नहीं करता था कि आप एक हार्इ स्कूल के तथाकथित सम्मानित गुरूजन हैं। वैसे हर अध्यापक अपनी तरफ से यह प्रयास करता था कि उसकी स्थिति वहां काम कर रहे मजदूरों-कहारों से एक डिग्री ऊपर, उन पर निगरानी कर रहे सुपरवाइजरों जैसी मानी जाए, पर इस प्रयास में वे प्राय: असफल रहते थे। ऐसे मौकों पर विद्यालय के बच्चे भी दर्शक अथवा आमंत्रित के रूप में उपस्थित रहते थे। वे प्रत्येक क्रिया-कलाप और संवाद गौर से देखते-सुनते तथा अपने भाग्यविधाताओं के भाग्य के पेंदे तक पहुंच जाते थे। छठी-सातवीं कक्षा के बच्चे भी अच्छी तरह समझने लगे कि हम सब किराए के टट्‌टू हैं। उसमें भी कोढ़ में खाज हो गर्इ थी, स्कूल के मास्टरों की पार्टीबंदी। सवर्ण और निचली जातियों के आधार पर दो गुट बन गए थे। निम्नवर्ग वाले अपने-आपको 'दलित-पैंथर्स' के ग्रुप का मनाते थे और चूंकि 'दलित' शब्द से उन्हें एलर्जी थी तथा 'दलित' जितना दलित मानने में थोड़ा अपमान-सा भी लगता था, इसलिए 'दलित' की बजाय 'एंग्री' शब्द का इस्तेमाल करते थे। टीचर्स रूम की बहसों में खुलकर एक-दूसरे पर कीचड़ उछाला जाता। हरिजन मास्टर साहब तर्क करने में अद्वितीय थे। जाने कहां से सामग्री इकट्‌ठी कर और लियोनार्ड बूली, मैक्समूलर, गिल्गमेश, ओल्ड टेस्टामंट, हिब्रू, ऊर, मीडियन, जरथुष्ट्र आदि शब्दों का भयंकर प्रयोग करके अंत में यह सिद्ध कर देते थे कि मूल ब्राहमण जाति तो कब की विलुप्त हो चुकी है। भारत के मौजूदा ब्राहमण तो सिकंदर के साथ यूनान से आए भिश्तियों की औलाद हैं।
          इसके प्रत्युत्तर में मिश्रा जी मूंछों में मंद-मंद मुस्कराते हुए तर्क देते कि कायदे से तो हरिजन मास्टर साहब 'दलित पैंथर्स' के सदस्य ही नहीं हो सकते। क्योंकि यद्यपि उस समय तक उनका (मिश्रा जी का) जन्म नहीं हो सका था पर परवर्ती सूचनाओं से यह सिद्ध होता है कि हरिजन मास्टर साहब का जन्म उनके पिता की मृत्यु    के पूरे एक साल-भर बाद हुआ था। तुलसीदास आदि के जन्म का हवाला देने के बावजूद हरिजन मास्टर साहब की यह बात मानने के लिए कोर्इ तैयार नहीं होता था कि पैदा होने में वे थोड़ा लेट हो गए थे। मिश्रा जी के इस तर्क का उनके पास कोर्इ जवाब नहीं बन पाता था कि जो आदमी स्कूल में छह घंटे नहीं टिक पाता, वह वहाँ बारह महीने कैसे टिका रह गया? इम्पासिबल।
            फिर तो महाभारत ही शुरू हो जाता।
         और तब अपने ऑफिस से निकलते प्रिंसिपल साहब! उनका ऑफिस कहीं दूर नहीं था। रेवेन्यू रेकार्ड में बीस फीट लंबा दालाननुमा जो कमरा पंचायत-घर के रूप में दर्ज था, उसी के 14 फीट के हिस्से को टीचर्स रूम और पांच फीट के हिस्से को प्रिंसिपल ऑफिस बना दिया गया था। बीच में एक फुट मोटी और साढे़ तीन फीट ऊंची कच्ची र्इंटों की दीवार। बीच के दरवाजे में कोर्इ पर्दा या किवाड़ नहीं था। सिर्फ मानसिक अलगाव किया गया था। और एक तरफ की हर गतिविधि का अवलोकन दूसरी तरफ खडे़ होकर ही नहीं, लेटे-लेटे भी सुविधापूर्वक किया जा सकता था। प्रिंसिपल ऑफिस में या तो एक चारपार्इ पड़ सकती थी या एक कुर्सी-मेज। प्रिंसिपल साहब ने चारपार्इ को वरीयता दी थी।
          प्रिंसिपल साहब इसलिए नहीं निकलते थे कि दोनों गुटों में सुलह करा दें। उन्हें तो मजबूरन निकलना पड़ता था, क्योंकि शोर के कारण उनका पोस्ते के छिलके का नशा फिसलने लगता था। उनकी दशा 'चकित चकत्ता चौंकि-चौंकि उठै बार-बार' वाली हो जाती थी। कुछ देर तक वे प्रिंसिपल ऑफिस और टीचर्स रूम के संधि-द्वार पर खडे़ रहते। एक-एक चेहरे को बारी-बारी से घूरते। फिर खंखारकर थूकते। तब तक लोग बनावटी लिहाज से शांत होने लगते । वे वापस जाकर फिर औंधे मुंह चारपार्इ पर गिर पड़ते। हरिजन मास्टर साहब बताते थे कि जब प्रिंसिपल साहब इस औंधी मुद्रा में पडे़ होते हैं तो उनके मुंह से प्रति घंटे सौ से दो सौ ग्राम तक राल निकलकर तकिया में जज्ब होती रहती है। यही कारण है कि गर्मी में तकिया तर रहता है, और ठंडक पहुंचता है।
         उस समय तक 'सिद्धांत' शब्द से मेरा मोह टूटा नहीं था। अन्य मास्टर लोग भी अपनें आपको कम सिद्धांतवादी नहीं मानते थे। अंतर यह था कि जहां और लोग सिद्धांत को 'शोकेस' में रखते थे, मैं कभी-कभी उसका 'रफ यूज' करने लगता था। जिस घटना के कारण मुझे विद्यालय छोड़ना पड़ा, उस समय भी यही हुआ था। घटना सत्रावसान के दिन की है। विद्यालय में छठे, सातवें और नौवें दर्जे का रिजल्ट सुनाया जा चुका था। कुछ स्पेशल केस से संबंधित लड़के, जिनमें कुछ दो-चार नंबरों से फेल हो रहे थे और कुछ, जो निर्धारित गुरू-दक्षिणा की रकम अभी तक नहीं दे सके थे, रोक लिए गए थे। प्रिंसिपल साहब देर तक उन्हें उनके सीरियस केस के बारे में और गुरू-दक्षिणा की महिमा के बारे में समझाते रहे थे कि वे नहीं चाहते कि उनके हाथों किसी का भविष्य अंधकारमय हो जाए। उनके तो जीवन का मंत्र ही है- तमसो मा ज्योतिर्गमय, लेकिन छात्रों को भी गुरू का ध्यान रखना होगा। वे कोर्इ उंगली-अंगूठा तो मांग नहीं रहे हैं....
           सारी गुरू दक्षिणा वसूलते और हिसाब-किताब करते शाम के चार बज गए। कुल सात सौ बयालीस रूपए चढे़ थे, जैसा कि प्रिंसिपल साहब ने घोषित किया, किंतु 'एंग्री पैंथर्स' के सदस्यों ने आरोप लगाया कि घोषित राशि मूल राशि से काफी कम है, किंतु गुरू-दक्षिणा के लिए वहां कोर्इ कमेटी गठित नहीं थी, इसलिए काफी बकझक के बाद घोषित राशि ही मूल राशि मान ली गर्इ। तब प्रिंसिपल साहब ने घोषणा की कि इसमें से बयालीस रूपए वे संयुक्त हिंदू परिवार की प्राचीन परंपरा के अनुसार ज्येष्ठांश के रूप में अपने पास रख लेते हैं। शेष सात सौ रूपए बांटने के लिए उन्होंने मुझे आमंत्रित किया। मैंने दोपहर में एक लड़के को कहते सुन लिया था, ''साले, इसी 'पास करार्इ' वाले रूपए से एकाध कुर्ता-पैजामा बनवा लेंगे। फिर उसी को साल भर रेतेंगे।'' मेरा मुंह कड़वा हो चुका था। अत: मैंने घोषणा कर दी, ''चूंकि अधिकांश रूपया जबरदस्ती बसूला गया है और इसमें से तिरस्कार और अपमान की बू आ रही है, इसलिए यह रूपया मैं छुऊंगा भी नहीं, हिस्सा लेना तो दूर रहा।''
          मेरी घोषणा से प्रिंसिपल साहब की मुद्रा परमहंसी हो गर्इ। उन्होंने कोर्इ दुख नहीं प्रकट किया। खुशी हुर्इ होगी तो उसे भी दबा गए। धीर भाव से नोटों को नाक तक ले जाकर सूंघा, आश्वस्त हुए कि कोर्इ बू नहीं आ रही है और घोषणा की कि ऐसी स्थिति में त्यागी गर्इ इस समस्त राशि पर श्रेष्ठ ब्राहमण का हक होता है। अत: उनके हिस्से का रूपया मैं लेता हूं।
         इस घोषणा से शेष ब्राहमण, एंग्री पैंथर्स और अन्य सवर्ण सभी भड़क उठे। आरोप-प्रत्यारोप के मध्य चाक -डस्टर फेंके जाने लगे। जो दो-चार लड़के अभी तक विद्यालय में रूके हुए थे, वे खिड़की के रास्ते कंकर -पत्थर सप्लार्इ करके गुरूजनों की मदद करने लगे। कुहराम मच गया।
        दूसरे दिन प्रचार हो गया कि गुरू-दक्षिणा का रूपया हड़पने का प्रयास करने के फलस्वरूप अध्यापकों ने मेरी जमकर पिटार्इ की है और लोगों ने अध्यापकों को आचार-संहिता बताना शुरू कर दिया।
         जून में जब मैनेजमेंट की मीटिंग में मुझसे इस संबंध में स्पष्टीकरण मांगा गया तो मैंने उत्तर में इस्तीफा भेज दिया। पिताजी को मेरे इस्तीफे का पता चला तो लगे गालियां देने, ''साला, लाट साहब बनना चाहता है। दाने-दाने को न तरस गया तो कहना!'' 
        गालियों के प्रति मैं बचपन से ही उदासीन था। गाली से ज्यादा तरजीर पीटे जाने को देता रहा हूं, जिसकी संभावना अब नहीं के बराबर थी।
      शहर पहुंचकर इक्का रूकता है तो मेरी तंद्रा टूटती है। मैं उतरकर सप्लार्इ ऑफिस पहुंचता हूं। दलाल गोपीचंद प्रांगण में ही मिल जाता है। मेरी नमस्ते का बड़ी उदासीनता से जवाब देता है, लेकिन जब कोने में ले जाकर मैं उसे आठ सौ रूपए देता हूं तो उसकी उदासीनता गायब हो जाती है। वह हरकत में आ जाता है। मुझे ले जाकर जबरदस्ती चाय पिलाता है और फिर बाहर प्रतीक्षा करने को कहकर दफ्तर के अंदर चला जाता है। मैं एक खाली बेंच पर पसर जाता हूं। आंखों में पुराने दृश्य घूमने लगते हैं।
         मास्टरी छोड़ने के बाद घर में मेरी रही-सही साख भी समाप्त हो गर्इ थी। हर सदस्य मुझसे पहले से अधिक दूर हो गया। पिताजी ने साबुन, तेल, स्याही और कागज तक का पैसा देना बंद कर दिया। मुझे अपने कपडे़ साबुन की बजाय रेह से धोने पड़ते। दर्जा आठ तक तौ मैं वैसे ही रेह से कपड़े धोता रहा था, लेकिन ग्रैजुएट हो जाने के बाद भी आठ आने का साबुन न खरीद पाने की मजबूरी मुझे कभी-कभी अंदर से तोड़ने लगती। कमीज मेरे पास, जब से मैंने कमीज पहनना सीखा, तब से हमेशा एक ही रही है। पहले तो कभी-कभी ऐसा भी होता था कि पुरानी कमीज के पूरी तरह फट जाने और नर्इ कमीज के सिलकर तैयार होने के बीच तीन-चार दिन का अंतर पड़ जाता था। ये तीन-चार दिन बिना कमीज के ही निकल जाते थे। बनियान को हमेशा कमीज के बराबर का दर्जा मिलता आया था और एक ही साथ कमीज और बनियान दोनों पहनकर फाड़ने की मूर्खता हमारे यहां आज भी कोर्इ नहीं करता। हां, डिग्री कालेज में नाम लिखाने तक हवार्इ चप्पल पहनने की आदत पड़ गर्इ थी। इन दिनों जबकि पुरानी चप्पल के टूटे पट्‌टे बार-बार सिलवाते-सिलवाते सड़ गए थे और जेब में एक भी पैसा नहीं था। नंगे पैर पोस्ट-ऑफिस अथवा बाजार जाने में कुछ झेंप लगने लगी थी। यद्यपि इस झेंप के लिए कभी-कभी में स्वयं को कोसता भी था। मुझे कभी-कभी लगता कि ये सारे अभाव मुझे जबरदस्ती महानता की तरफ ढकेलकर ले जा रहे हैं। मैं महान लोगों की जीवनी पढ़ने लगा। पढ़ते-पढ़ते हिसाब लगाता कि इनमें से कितने लोग मेरी गांव में पैदा हुए थे और कितनों का बचपन अभाव में बीता था तो यह संख्या काफी अधिक होती। तब मेरा हृदय नर्इ आशा और विश्वास से भर जाता। ऐसे समय जबकि मैं मानसिक रूप से व्यग्र रहता, पत्नी से सहवास को भी व्याकुल रहता। पत्नी मेरी मुफलिसी से पूरी-पूरी असंतुष्ट थी, फिर भी बिना किसी खास एतराज के खुद को मेरे लिए प्रस्तुत करती रहती थी, लेकिन जब-जब मेरी नजर उसके फटे और मैले-कुचैले कपड़ो पर पड़ती, मैं अपराध-बोध से गड़ जाता। उसे चुपचाप भाभीजी के ताने सुनते देखता तो लगता, पूरे घर को अभी, इसी वक्त आग लगा दूं। मां का रूख उस समय तक इतना आक्रामक नहीं हुआ था, न उसके प्रति, न मेरे प्रति, लेकिन धीरे-धीरे आत्मनिर्भरता की अनिवार्यता मेरी समझ में आने लगी थी।
       इसी बीच इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में अध्ययनरत मेरा एक दोस्त एक दिन 'क्लर्क्स ग्रेड परीक्षा' का आवेदन-पत्र लेकर आया। वह ओवरएज हो चुका था। मुझसे कहा कि भरना चाहूं तो भर दूं, फीस वह दे देगा। मैंने फार्म भर दिया। बाद में कर्इ जगह और कर्इ माध्यमों से पूछताछ करने पर यू.पी.एस.सी. तथा प्रांतीय लोक-सेवा आयोग के कार्यो और उद्देश्यों के संबंध में जानकारी प्राप्त हुर्इ। यह मेरी ही नहीं, मेरी तरह उन हजारों-हजार ग्रामीण स्नातकों की नियति है, जो बिना शहर का मुंह देखे, जंगल या गांव के बाजार में स्थित डिग्री कालेजों में डिग्री प्राप्त करते हैं। आगे की कड़ी के रूप में वे केवल बी.एड., एल.टी. या एल-एल.बी. का नाम ही जान पाते हैं। शिक्षा और रोजगार के बीच की कड़ी यू.पी.एस.सी. के बारे में जानकारी देने वाला वहां कोर्इ नहीं है।
         मैनें परीक्षा दी और चुन लिया गया। सालों बाद ज्वाइनिंग लेटर मिला तो लगा, राजगद्दी का परवाना आया है। सोचा था, किसी को भी नहीं बताऊंगा। बहुत तंग किया है घर वालों ने। चुपचाप बिना बताए इनकी दुनिया से दूर चला जाऊंगा, लेकिन जब से पोस्टमैन रजिस्ट्री दे गया, पिताजी ने पूछते-पूछते कान बहरे कर दिए, ''ससुरा बताता भी नहीं कि कैसा कागज-पत्तर है? कुछ बोले भी कि कहां से आया है, क्या लिखा है?''
         मैंने बताया तो उनका मुंह खुशी से खुला-का-खुला रह गया। पान की पीक दाढ़ी तक बह निकली। संक्षेप में उन्होंने उस नौकरी में मिलने वाली तनख्वाह, काम के प्रकार (अर्थात कलम पकड़नी पडे़गी या कुदाल) तथा ऊपरी आमदनी के बारे में पूछा ओर सिर पर पगड़ी लपेटकर गांव वालों को खबर देने निकल गए। मैं पलक झपकते सबका दुलारा हो गया। होनहार हो गया। मां ने अपने हाथ से परोसकर खाना खिलाया। भाभी ने खाने के साथ दूध का गिलास देकर और पत्नी ने रात में सारे शरीर की मालिश करके और बीसों उंगलियां चटकाकर अपनी प्रसन्नता व्यक्त की। उस रात उसने मेरी कमर को इतने जोर से अपनी भुजाओं में कसकर दबाया था कि याद करने पर आज भी दर्द होने लगता है। बडे़ भैया ने यद्यपि अपनी खुशी का कोर्इ स्थूल प्रमाण नहीं दिया, लेकिन उस रात माचे से उनके गाने की आवाज बहुत देर तक आती रही थी।    
          पिताजी को कोर्इ न मिलता तो अपने आप ही बड़बड़ाते, ''बचपन से ही इसके राजयोग थे। अयोध्याजी के पंडा महाराज ने हाथ देखते ही कहा था, लड़का ओहदेदार होगा। स्कूल का मुंह नहीं देखा था, तभी पूरा 'हनुमानचालीसा' जबानी याद कर लिया था...छटांक-छटांक देशी घी दाल में डालकर पिलाया है जी। गांव में और किसी लड़के को सरकार ने रजिस्ट्री भेजकर बुलाया कभी! राजकाज चलाना सबके वश की बात नहीं होती।''
          जाते समय पिताजी ने महीने-भर के खर्च के लिए चार सौ रूपए दिए थे। दो सूती कमीजें और पैंट सिला दिया था। मां ने अचार, सत्तू, देशी घी, चबेना, गुड़, आलू-प्याज आदि बांध दिया था। बडे़ भैया वह सारा गट्‌ठर ढोकर बस-अड्डे तक लाए थे। बडे़ खुश थे, पर पैर नहीं छूने दिया। सिर्फ इतना कहा था, ''चिट्‌ठी जल्दी देना।'' और मैं बडे़ हौसले से केंद्रीय सचिवालय की नौकरी के लिए दिल्ली चल पड़ा था।
          सचिवालय की दुनिया में आने के बाद मैंने पहली बार महसूस किया कि गांव को मैं कितना प्यार करता हूं। गांव मेरे रोम-रोम में बस गया है, यह गांव छोड़ने के बाद जाना। मुझे दफ्तर में भी गांव के ताल, भीटें, बाग, ऊसर-बंजर, ढकुलाही, बंसवारी और रूसहनी की याद सताती, जैसे जंगली तोता पिंजडे़ में बंद हो गया हो। मैं अपने गांव के एक ग्वाले के साथ उसके मालिक के तबेले में रहता था। शाम को वह दूध देने निकल जाता तो मैं कभी-कभी रोने लगता।
          जैसे-जैसे मैं अपने शहरी सहयोगियों से घुसला-मिलता गया, मुझे उनसे विरक्ति होती गर्इ। सचिवालय मुझे ऐसा चिडि़याघर नजर आता, जहां एक ही किस्म की चिडि़यां कैद की गर्इ हों, जिन्हें चेहरे से पहचानना संभव न हो। मैं इन लोगों को चेहरे से नहीं, बल्कि इनके कपड़ों से पहानता था। लोग गांव के लोगों को कूपमंडूक कहते हैं, पर मुझे तो अपने दफ्तर में भी कम कपमंडूक नजर नहीं आए। दिल्ली में रहते हुए भी उनमें से अधिकांश ने कभी कुतुबमीनार, राजघाट या शांतिवन नहीं देखा था। सबकी दुनिया नितांत सीमित थी, दफ्तर और परिवार, बीच में कुछ नहीं। कोर्इ गाजियाबाद से भागता आता तो कोर्इ शाहदरा और सोनीपत से। महीने के मध्य से ही उधार मांगने का क्रम शुरू हो जाता। बहुतों को तो यह भी नहीं पता था कि चने का पेड़ बड़ा होता है या अरहर का।
          अनुशासन और व्यवस्था के नाम पर सब अपने बास के हाथ की कठपुतली बने रहते थे। जिसको वह अपने केबिन में बुलवाता, उसके दिल की धड़कन बढ़ जाती। अंदर घुसने से पहले अंदर के वातावरण की गंध पाने के लिए चपरासी को बीड़ी आफर करने लगता। बास का बात-व्यवहार का तरीका था भी बहुत भयावह। यहां बास की गुडबुक में होना इस बात पर निर्भर नहीं था कि आप कितने हार्ड-वर्कर हैं बल्कि इस बात पर कि आप कितनी चापलूसी कर लेते हैं, उससे कितना ज्यादा डरते और कितनी कम बातें करते हैं। उसके जायज-नजायज गुस्से को कितनी सहजता से 'सुखे-दुखे समे कृत्या' के भाव से सिर झुकाकर स्वीकार करते हैं।
           शुरू-शुरू में तो मुझे यह चाटुकारिता और अकारण भय-प्रदर्शन निहायत नागवार लगा, किंतु धीरे-धीरे समझौतावादी होने की कोशिश करने लगा। झूठ-मूठ भय-प्रदर्शन तो कोर्इ मेरा गला काटने पर उतारू हो, तब भी नहीं कर सकता। हां, एक-दो बार छोटी-मोटी भेंट लेकर बॉस  के बंगले पर जरूर गया। मुझे उम्मीद थी कि अपने अंत:करण की आवाज के विरूद्ध की जाने वाली इस नीचता से मेरे मन में जो मलाल आया है, उसे बॉस अपनी स्वागत मुसकान से दूर कर देगा। संबंध नार्मल हो जाएंगे, लेकिन बॉस तो मेरी उपस्थिति में भी मेरी बजाय अपने कुत्ते से बात करने में रूचि लेता था। मूझसे कभी बोलता भी तो यही कि अभी तुम्हारा काम संतोषजनक नहीं है। मत भूलो कि तुम प्रोबेशन पर हो और तुम्हारी नौकरी मेरे रिमार्क पर निर्भर है। मुझे लगता कि यह तो साफ-साफ धमकी दे रहा है, अकारण। कुत्ते की तरह पूंछ हिलाने पर उतारू भी हुआ तो उसका यह नतीजा। मन खट्‌टा हो गया। बॉस के बंगले पर जाना ही बंद कर दिया। वह इंतजार करता रहा कि मेरा रवैया सुधरेगा, लेकिन कुत्ते की पूंछ भी कभी सीधी हुर्इ है! एक दिन किसी मामूली भूल पर उसने मुझे अपने केबिन में बुलाकर जोर से डांट दिया। मैंने चुप रहने का निश्चय किया था, लेकिन बॉस ने इसे मेरी कायरता समझा और कुछ ऐसा भाव प्रदर्शित करने लगा कि अगर मैं केबिन से निकलकर तुरंत ही भाग नहीं गया तो वह जूते उतारकर मुझे पीटना शुरू कर देगा। मैं इस हद तक सह सकने के लिए अपने आपको तैयार नहीं कर सका, इसलिए जब गुस्से में जूते पटकता हुआ वह मेरे मुंह के पास अपना मुंह लाकर चिल्लाया, 'गेट आ-उ-ट...' तो मेरे अंदर सोया गंवार भड़क उठा। मैंने उसकी तोता-टाइप नाक पर कसकर एक घूंसा जमाया...भच्च!तल-तल करके उसके नाक-मुंह से खून बहने लगा। वह चिल्लाया। लोग इकट्‌ठा हो गए... और एक लंबी पूछताछ और स्पष्टीकरणों की औपचारिकता के बाद मुझे एक महीने का अग्रिम वेतन देकर नौकरी से निकाल दिया गया।
           घर वाले मेरे आकस्मिक आगमन पर किंचित चकित हुए और फिर स्वागत में जुट गए। मां ने शिकायत की कि दुबला हो गया हूं। भाभी ने खीर खिलार्इ। बड़ी बेटी ने सौ तक गिनती सुनार्इ। गांव में घूमने निकला तो गांव की औरतें किंचित संभ्रम, किंचित कुतूहल और किंचित आदर का पुट देकर कानाफूसी करने लगीं, ''दिल्ली में नौकरी पार्इ है गौरमिंट के दफ्तर में।'' रात में पत्नी ने नौ बजते-बजते ही काम समाप्त करके कोठरी में सेज सजा दी और दिलोजान से समर्पित हुर्इ। चरम बिंदु पर पहुंचते-पहुंचते उसने किंचित लाज और मान-भरे स्वर में कहा, ''इस बार मुझे भी ले चलिए अपने साथ। कब तक यहां सडूंगी। आज तक मैंने कभी शहर नहीं देखा है।'' मैं रस-भंग नहीं करना चाहता था। चुंबनों की बौछार से उसका मुंह बंद कर दिया।
           हिम्मत नहीं पड़ रही थी कि पिताजी को सारी बातें बताऊ। लेकिन पिताजी की नजरें तो गीध से भी तेज हैं। दूसरे दिन से ही पूछने लगे, ''कितने दिन की छुट्टी लेकर आए हो?'' तीसरे दिन मैंने शाम को खेतों में भार्इ साहब को डरते-डरते सारी बात बता दी। उनके चेहरे पर कोर्इ परिवर्तन नहीं आया। उन्होंने कहा, ''मैं चना उखाड़कर लाता हूं, तुम माचे से माचिस लाओ तो होरहा भूना जाए।''
          चौथे दिन ही घर, पड़ोस और फिर पूरे गांव की नजरों में नालायक हो गया। औरतें परस्पर बातें करने लगीं, ''गौरमिंट ने निकाल बाहर किया। कहा, चसमा-ठोंका लगाने वाला लड़का नहीं चाहिए। क्या पता, कब पूरा आन्हर हो जाए।'' पिताजी ने बिना एक दिन की भी मोहलत दिए गालियां देना शुरू कर दिया, ''मेहरा, साला! आवारा, लोफर! जोरू के बगैर नहीं रह सकता था तो मैंने कौन उसे गिरवी रख लिया था। ले जाता साथ में बनरी नचाने के लिए उसे भी।'' और अंत में, गाली देते हुए भविष्यवाणी की थी, ''साले तरार्इ में गुह गोड़ोगे और चमाइन फांसोगे। आखिर हो तो मेरे ही बेटे।'' सच, यह जानकर कि उन्हीं का बेटा हूं, बड़ी राहत मिली थी। स्कूल की मास्टरी छोड़ी थी तो इन्होंने घोषणा कर दी थी कि मैं इनका बेटा हो ही नहीं सकता, क्योंकि इनका बेटा इतना बुद्धू नहीं हो सकता। आज की घोषणा से सारा मलाल मिट गया। वैसे असली बाप का या हरामी का बेटा होने की बात मेरी नजर में कोर्इ खास अहमियत नहीं रखती। दुनिया में आना ही था। इनकी कोशिश से आते या किसी और की!
           पिताजी हमेशा दो मुंहे सांप रहे हैं। उनका एक मुंह खुलता, जब आस-पास कोर्इ पराया नहीं होता। उस मुंह से वे लगातार मेरी बुरार्इ करते। दूसरा मुंह खुलता, जब पास में कोर्इ परिचित या रिश्तेदार बैठा होता। यह मुंह मेरी बुराइयों को इतनी खूबी से अच्छाइयों में परिवर्तित कर देता कि सुनकर खुद मुझे आश्चर्य होता, ''मैं तो भर्इ बस, एक बात जानता हूं। जान जाए तो जाए, शान न जाने पाए। मेरे बेटे ने वही प्रत्यक्ष करके दिखा दिया। क्या नाम...वह इसका साहब ससुर। जाति का बनिया था। उसकी डांट-डपट तो मेरा बेटा सहने से रहा। दे दिया कसकर एक लात पेट में। फच्च-से मुंह से खून फेंक दिया। तीन दिन तक अस्पताल में होश ही नहीं आ रहा था। यह इस्तीफा देने लगा तो उस साहब के ऊपर वाले साहब ने कहा, ''तुम रहो ज्ञान, मैं इस साहब को ही निकाल बाहर करता हूं,' लेकिन मेरे बेटे ने भी चालीस सेर का जवाब दिया, 'इसको निकालोगे तो इसके बच्चे भूखों मर जाएंगे साहब! मेरा क्या, गांव में मूंछ ऐंठकर खेती करूंगा और भाले में तेल लगाकर घूमूंगा।'' फिर विषय की गंभीरता को थोड़ा हल्का करने के लिए पश्चाताप-भरे स्वर में कहते, ''ससुरा, शहर में जाकर मूंछें साफ कर आया, यही बेजा किया। शहर में रहकर तो आदमी सचमुच हिजड़ा बन जाता है। अच्छा ही हुआ...'' लेकिन उस बाहरी आदमी के हटते ही वह मुंह बंद हो जाता और अकेला होते ही वे फिर गालियां देना शुरू कर देते।
          आज सोचता हूं तो पश्चाताप होता है अपनी करनी पर, लेकिन गुस्सा आता है उन शिक्षाशास्त्रियों पर, जो आज भी स्कूलों-कालेजों में महाराणा प्रताप, शिवाजी, चंद्रशेखर आजाद, भगतसिंह और नेताजी को पढ़ाते हैं, बच्चे के कच्चे मन पर राणा और आजाद की नुकीली मुंछें और गज-भर की छाती, भगतसिंह का टोप और नेताजी की सैनिक छवि इतनी गहरार्इ तक घुस जाती है कि प्रौढ़ होने पर आज के गर्हित यथार्थ जीवन के साथ स्वयं को समायोजित करने के दौरान उसे भीषण मानसिक यंत्रणा से गुजरना पड़ता है। कभी-कभी तो इसी कशमकश में वह मेरी तरह टूट जाता है। माना कि समाज को बदलना कठिन है, पर टेक्स्ट बुक्स को बदलना तो मुश्किल नहीं! क्यों नहीं आज के बच्चों को ब्रूटस, कार्नेलिया, जयचंद, विभीषण, आम्भि आदि सामंतयुगीन चारणों तथा अन्य विश्वासघातियों, अवसरवादियों और चाटुकारों के चरित्र पढ़ाए जाते, जो उनके यथार्थ जीवन की समस्याओं को हल करने में सहायक हो सकें? यथार्थ को बदलना कठिन है, लेकिन आदर्श बदलने में क्या लगता है!
            दिल्ली में काटे गए चंद महीनों तथा घर में मिलने वाले तिरस्कार  ने पैसे के प्रति मेरा  दृष्टिकोण बदल दिया। मैंने निश्चय किया कि मुझे पैसा कमाना है। कर्इ योजनाएं तथा फ्राड दिमाग में आते रहे, जाते रहे। संयोग से इसी बीच गांव के पुराने सस्ते गल्ले के लाइसेंसी का लाइसेंस रद्द हुआ तो पिताजी ने मुझसे भी अप्लार्इ करवा दिया।
           लगा कि कोर्इ जोर-जोर से झिंझोड़ रहा है। आंख खुली तो सामने गोपीचंद खड़ा था। लाइसेन्स का पेपर देते हुए बोला, ''नए हो, इसलिए साफ-साफ बता रहा हूं। अकेले चीनी के ब्लैक में ही हर महीने तीन हजार की बचत है। मौके पर 'नामा' ही काम आता है। किसी दिन साहब से जाकर 'परसनली' मिल लो। सारी बात साफ-साफ रहे तो ठीक रहता है। अपने इलाके के दरोगा, बी.डी.ओ. तथा और भी जो दो-चार मुहलगे कुत्ते हों, उन्हें दो-चार किलो देकर पटाए रहो, बस! सीधी-सी बात है, जिसके काटने का डर हो, उसका मुंह बंद कर दो। साला काटेगा किधर से?.... साल-भर में बिल्डिंग खड़ी हो जाएगी।''
            वह उठता है तो मैं भी उठकर बाहर की तरफ चल पड़ता हूं। बहुत ठोकर खाने के बाद आज किनारा मिला है। आदर्शवाद के चलते अब तक जीवन के हर क्षेत्र में 'मिसफिट' होता रहा हूं। अब जाकर अक्ल आर्इ है रास्ते पर। मैं पैर की ठोकर मारकर सारे आदर्शवाद को चूर-चूर कर देना चाहता हूं...बिल्डिंग! साल-भर में! मुझे अभी से अपने कच्चे मकान की जगह तिमंजिली बिल्डिंग नजर आने लगी है- पीली-पीली! बालकनी में शायद मेरी पत्नी खड़ी है....
         पत्नी की याद आते ही उसकी बड़ी-बड़ी आंखें याद आती हैं। सुबह चलते समय पूछा था, ''क्या-क्या मंगाना है शहर से अपने लिए?'' तो बोली थी, ''मेरे लिए क्या?'' आजकल वह ऐसे ही बोलती है। एक समय वह भी था, जब नर्इ-नर्इ ब्याह कर आर्इ थी तो रात में बड़ी महत्वपूर्ण जगह से मेरा हाथ हटाते हुए शिकायत करती थी, ''प्यार इतना जताते हो, लेकिन एक चोली (ब्रेजियर) तक लाकर नहीं दे सकते।'' पर मैं भी ऐसा बेहया था कि सालों तक फरमाइश सुनने के बाद भी उसे एक चोली लाकर नहीं दे सका। उसे फुसलाने के लिए तर्क करता कि चोली की जरूरत उन्हें होती है जिनकी छातियां लत्ता होकर लटकने लगती हैं। तुम्हें उसकी क्या जरूरत है? मेरी प्रशंसा गलत नहीं है। तीन-तीन बच्चे होने के बावजूद आज भी उसके स्तन तनिक भी श्रीहीन अथवा नतमुख नहीं हुए हैं। कभी-कभी तो उसके और अपने स्वास्थ्य की तुलना से मुझे खुद शर्म-सी आने लगती है। वह तो इस अंतर को अब जरूरत से ज्यादा महत्व देने लगी है। उसके अनुसार तीनों की तीनों लड़कियाँ होने का एकमात्र जिम्मेदार मेरा उससे उन्नीस स्वास्थ्य है। इसके मामले में उसका गणित एकदम सीधा है। उसके अनुसार यदि पति तगड़ा है तो लड़का होगा, पत्नी तगड़ी है तो लड़की। इसे वह भार्इ साहब का उदाहरण देकर बखूबी सिद्ध कर देती है। मुझे चोरी से दूध पिलाने का उद्देश्य भी यही है कि अधिक स्वस्थ होकर मैं उसे एक बेटा दे सकूं। मैं उसे एक्स और वार्इ क्रोमोसोम्स तथा सेक्स क्रोमोसोम के तेर्इसवें जोडे़ के बारे में बताना चाहता हूं तो वह समझती है कि मैं बेवकूफ बना रहा हूं। बेटा पैदा करके घर भर की नजरों में चढ़ जाने की उसकी कामना इतनी तीव्र है, इसका पता मुझे कभी न लगता, अगर उस दिन...
         उस दिन मां और पिताजी गंगास्नान के लिए गए हुए थे। भाभी एक हफ्ते पहले भार्इ साहब से लड़कर मायके चली गर्इ थीं। मैं इसी लाइसेंस के चक्कर में शहर जाने निकला तो दस बजने वाले थे। उस समय भार्इ साहब मंड़हे में बैठे खांची बुन रहे थे। दो घंटे तक अड्डे पर सवारी का इंतजार करने के बाद दिल में पता नहीं क्या आया कि मैं वापस लौट पड़ा। दरअसल आज घर सूना पाकर में उन्मुक्त होकर पत्नी को पा लेना चाहता था। महीनों बाहर सोने के कारण शरीर सुस्त और भारी हो रहा था। उम्मीद थी कि अब तक भार्इ साहब खा-पीकर खेत पर चले गए होंगे। सूना आंगन होगा, बंद किवाड़। इतना निरापद एकांत कभी-कभी ही मिलता है। जाते समय मैंने पत्नी की आंखो में एक खास चमक देखी थी, जैसे शिकार पर नजर जमाए बिल्ली की आंखों में उतर आती है, नीली-नीली! सज-संवर भी रही थी सवेरे से ही। शायद चार-छह दिन पहले ही ऋतुमती हुर्इ थी। मैं बेताब होने लगा।
           मंड़हे में खांची अधूरी पड़ी थी। भार्इ साहब नहीं थे, आश्वस्त हुआ। एडवेंचर का आनंद लेते हुए आहिस्ते-आहिस्ते आंगन में जाकर पत्नी की कोठरी के बंद किवाड़ों के आगे खड़ा हो गया और सोचने लगा कि किस तरह उसे चौंकाऊं, तभी किवाड़ खुले और भार्इ साहब पसीना पोंछते हुए बाहर निकले। मुझे सामने पाकर हतप्रभ हुए और आंख चुराकर बगल से बाहर निकल गए। कोठरी के अंदर से बाहर आते हुए मेरी पत्नी की नजर मुझ पर पड़ी तो वह पथरा गर्इ। मैंने स्पष्ट देखा, उसके गालों पर और अधरों के नीचे दांत काटने के निशान थे। कपड़े अस्त-व्यस्त थे। सांस तेज थी। देखते-देखते मुझे उसकी आंखों का पानी बदलता नजर आया। अब वह मुझे घूर रही थी। मेरी समझ में नही आया कि मुझे क्या करना चाहिए। मैं बाहर निकल गया और रात देर तक परती खेतों में टहलता रहा। कर्इ दिनों बाद पत्नी ने स्वीकार किया, ''उनकी कोर्इ गलती नहीं है। मैं ही उनका हाथ पकड़कर मंड़हे से लिवा लार्इ थी, बेटा पाने के लिए।''
            इस तरह के छिटपुट यौन-संबंधो को मैं गंभीरता से नहीं लेता। इसे मेरा दमित पुंसत्व कहिए या लिबरल आउटलुक। मैं पाप-पुण्य, जायज-नाजायज, पवित्र-अपवित्र और सतीत्व-असतीत्व के मानदंडों से भी सहमत नहीं हूं। मांगकर रोटी खा ली या कामतुष्टि पा ली, एक ही बात है। प्राचीन काल की नियोग प्रथा को मैं आज के युग में भी उतना ही उपयोगी मानता हूं। मैं भयभीत हुआ था तो सिर्फ इस बात से कि इन दिनों मैं जिस हताशा और निपट एकाकीपन की अंधेरी गुफा में फंसा हूं, वहां पत्नी ही एकमात्र ऐसा आलंब है, जिसके आंचल में मुंह छिपा लेने पर घड़ी-दो घड़ी सुकून मिल जाता है। यह आलंब भी छूट गया तो झेल नहीं पाऊँगा। पैर उखड़ जाएंगे और मैं डूब जाऊंगा।
          दो सौ रूपए जेब में हैं। मैं बाजार से पत्नी के लिए दो ब्रेजियर, नायलान के दो ब्लाउज, पाउडर और क्रीम की डिबिया,. रिबन, साबुन,  लिपस्टिक, नेलपालिश, हेयर आयल और एक साड़ी खरीदता हूं। बेटी की 'प्रवेशिका' और 'पहाड़ा' लेता हूं। एक डिब्बे में मिठार्इ बंधवाता हूं और इक्का पकड़कर वापस लौट पड़ता हूं। सारे रास्ते निश्चय करता आता हूं कि आदर्शवाद का मैल अपने मन से रगड़-रगड़कर छुड़ा दूंगा। हर महीने तीन-चौथार्इ चीनी ब्लैक करूंगा। और पत्नी को गहनों तथा कपड़ों से लाद दूंगा। कदर पाने के लिए कदर करनी होगी। आज तक उसने शहर नहीं देखा, सनीमा नहीं देखा, रेलगाड़ी पर नहीं चढ़ी, उसका पायल टूटा पड़ा है, फोंकी की कील नहीं है, सब कुछ बनवाऊंगा, सब कुछ पहनाऊंगा। सब कुछ दिखाऊंगा।
        अड्डे पर इक्के से उतरकर आगे बढ़ता हूं। तभी कोर्इ नाम लेकर पुकारता है। गांव के टीड़ी सिंह हैं। मैं राम-राम करता हूं। वे लाइसेंस के बारे में पूछते हैं। मैं बताता हूं, ''मिल गया।'' वे मेरे गले से लग जाते हैं, ''बस, आज तो बिना पिए छोड़ नहीं सकता। ऐसा मौका फिर कब मिलेगा?'' वे मुझे जबर्दस्ती 'देशी' के ठेके के अंदर खींच ले जाते हैं। मैंने आज तक कभी शराब नहीं पी, पर आज दिल कह रहा है- देख भी लूं, कैसी लगती है? पहला घूंट अंदर जाता है तो मुंह कड़वा हो जाता है, कै हो जाएगी, पर नहीं, कै नहीं होने दूंगा। आज इसकी तासीर देखूँगा।
          थोड़ी ही देर में मुझे उसका असर स्पष्ट होने लगता है। मैं ठेकेदार से एक पौवा और लेकर पैंट की जेब में डाल लेता हूं- आज रात पत्नी को भी पिलाऊंगा, अपने हाथ से। टीड़ी सिंह दुकान में अंदर ही बेंच पर पसर गए हैं। मैं घर की तरफ चल पड़ता हूं।
           मंड़हे में जलती हुर्इ लालटेन दूर से ही दिखार्इ देती है। पिताजी संध्या कर रहे होंगे। पिताजी की याद आते ही गुस्सा आने लगता है। मैं यहां से चिल्लाकर बता देना चाहता हूं कि आज से मेरी चारपार्इ पत्नी की कोठरी में बिछेगी। उसे अपने हाथों दुल्हन की तरह सजाऊंगा और कल शहर ले जाकर एक ग्रुप फोटो खिंचवाऊंगा। चार-पाच साल से साथ है, लेकिन अभी तक उसकी एक फोटो तक मेरे पास नहीं है।
          ऐं, मेरे घर के सामने इतनी भीड़ क्यों है? कौन हैं ये लोग? कुएं के गौंखे में जल रही ढिबरी की रोशनी से दीवार पर उनकी लहीम-सहीम परछाइयां रेंग रही हैं। नजदीक पहुंचने पर खुसर-पुसर की आवाज सुनार्इ पड़ती है। मैं आतंकित होता हूं। तभी कोर्इ औरत आगे आकर बताती है, ''तेरी मेहरारू तो भाग गर्इ कलकत्ता, खलील दर्जी के साथ।''
          ऐं! सरूर गायब। पूर्ण चैतन्य। आखों में खलील का छोटी छोटी दाढ़ी वाला बलिष्ठ चेहरा और पत्नी का सबेरे खुला हुआ बक्सा घूम जाता है। अभी तक कभी ध्यान ही नहीं गया। खलील का आवागमन इधर काफी बढ़ गया था। पहले ब्लाउज-फ्राक की नाप लेने कभी-कभी आता था, पर इधर तो पिताजी को गांजा पिलाने के बहाने लगभग रोज ही आगे लगा था। आज पता चला कि उसका असली मकसद क्या था।
         मुझे देखकर लोग अतिरिक्त रूप से उत्साहित हो गए हैं। वे इस उम्मीद में हैं कि अब मैं कुछ बोलूंगा, कुछ करूंगा। उन्हें कुछ अप्रत्याशित देखने और सुनने को मिलेगा। मुझे चुप देखकर उन लोगों का धीरज जवाब देता जा रहा है।
          मैं मंड़हे में घुसता हूं। पिताजी रौद्र रूप् में बैठे हैं। मैं बताता हूं, ''लाइसेंस मिल गया।'' लेकिन वे कुछ सुनने के लिए नहीं, कुछ कहने के लिए बेताब हो रहे हैं।'' दांत पीसते हुए कहते हैं, ''क्यों रे कुत्ते! नाक कटवा ली न!''
            'अब कुछ होगा' की संभावना से लोग मंड़हे को घेर लेते हैं, '' नाक है आपके?'' मैं पिताजी की आंखों में आंखें डालकर निर्भय और शांत प्रश्न करता हूं।
          ''नाक नहीं है रे मेरे! मेरे नाक नहीं है!'' वे चौंचियाते हुए लपककर मेरे मुंर पर झापड़ मारते हैं। देर से ही सही, लेकिन कुछ शुरू तो हुआ, लोगों को तसल्ली होती है।
           ''पता नहीं, मेरे तो नहीं है।''
           ''हिजडे़, जनखे! बूत नहीं था तो मुझसे कहा होता। मुझे भी नामर्द समझ लिया था क्या?''
           पहली बार पिताजी के आगे चीखता हूं, ''मैंने आपको मना किया था क्या?'' वे बुझ जाते हैं पस्त! शांत!
          मैं बाहर निकलकर खेत में गडे़ माचे की तरफ बढ़ने लगता हूं। भार्इ साहब लोगों से अपने-अपने घर जाने का अनुरोध कर रहे हैं। लोग खिसक रहे हैं, निराश मन! क्या कुछ देखने की उम्मीद लेकर आए थे, लेकिन...
      मैं माचे पर लेट जाता हूं....चली गर्इ, चलो, जहां भी रहे, सुखी  रहे....लेकिन भागना ही था तो एक दिन पहले भाग जाती। मैं टूटने से बच जाता....घूस देने से...पथभ्रष्ट होने से....पता मालूम होता तो ये ब्रेजियर,. ब्लाउज वगैरह पार्सल कर देता...लिखता कि बेटा होने पर खबर करे। मैं खिलौने लेकर आऊंगा। हवा कुछ ठंडी और तेज है। नींद नहीं आ रही है। दूर कहीं सियार रो रहे हैं....खेत से पके हुए खरबूजों की गंध आ रही है। कर्इ दिनों से सोच रहा था। आज फुरसत मिली है। भरपेट खरबूजे खाऊंगा।
         मैं माचे से उतरकर खरबूजे के खेत की तरफ चल पड़ता हूं....ऐं! पैर लड़खड़ा क्यों रहे हैं?...शरीर इतना हल्का-हल्का-सा क्यों लग रहा है? विचार अस्त-व्यस्त क्यों हैं?....आदमी में पागलपन की शुरूआत कैसे होती होगी?.....मेरे कपड़े क्या हुए?.....मैं नंगा कैसे हो गया?
           मैं खेत के बीचोबीच खड़ा हूं। कुछ गाने का दिल कर रहा है....इस भरी दुनिया में कोर्इ भी....बेटियां तीन हैं, बेटे का सहारा न हुआ.....
            न....न.....न.....! सिर्फ गाने से काम नहीं चलने का। और मैं खरबूजे के खेत में भरतनाट्‌यम शुरू कर देता हूं।


Monday, May 21, 2012

सिरी उपमा जोग

                                                                सिरी उपमा जोग

यह कहानी सारिका कथापत्रिका के दिसम्बर  (द्वितीय) 1984 के अंक में प्रकाशित हुई थी। ब्लाग के पाठकों के लिए प्रस्तुत -


     किर्र-किर्र-किर्र घंटी बजती है।
     एक आदमी पर्दा उठाकर कमरे से बाहर निकलता है। अर्दली बाहर प्रतीक्षारत लोगों में से एक आदमी को इशारा करता है। वह आदमी जल्दी-जल्दी अंदर जाता है।
      सबरे आठ बजे से यही क्रम जारी है। अभी दस बजे ए. डी. एम. साहब को दौरे पर भी जाना है, लेकिन भीड़ है कि कम होने का नाम ही नहीं ले रही। किसी की खेत की समस्या है तो किसी की सीमेंट की। किसी की चीनी की, तो किसी की लाइसेंस की। समस्याएँ ही समस्याएँ।
      पौने दस बजे एक लम्बी घंटी बजती है। प्रत्युत्तर में अर्दली भागा-भागा भीतर जाता है।
      ''कितने मुलाकाती हैं अभी?''
      ''हुजूर, सात-आठ होंगे''
      ''सबको एक साथ भेज दो।''
      अगले क्षण कर्इ लोगों का झुंड अंदर घुसता है, लेकिन दस-ग्यारह साल का एक लड़का अभी भी बाहर बरामदे में खड़ा है। अर्दली झुँझलाता है, ''जा-जा तू भी जा।''
       ''मुझे अकेले में मिला दो,'' लड़का फिर मिनमिनाता है।
       इस बार अर्दली भड़क जाता है, ''आखिर ऐसा क्या है, जो तू सबेरे से अकेले-अकेले की रट लगा रहा है। क्या है इस चिट्टी में, बोल तो, क्या चाहिए-चीनी, सीमेंट, मिट्टी का तेल?''
       लड़का चुप रह जाता है। चिट्ठी वापस जेब में डाल लेता है।
      अर्दली लड़के को ध्यान से देख रहा है। मटमैली-सी सूती कमीज और पायजामा, गले में लाल रंग का गमछा, छोटे-कडे़-खडे़-रूखे बाल, नंगे पाँव। धूल-धूसरित चेहरा, मुरझाया हुआ। अपरिचित माहौल में किंचित सम्भ्रमित, अविश्वासी और कठोर। दूर देहात से आया हुआ लगता है।
      कुछ सोचकर अर्दली आश्वासन देता है, ''अच्छा, इस बार तू अकेले में मिल ले।'' लेकिन जब तक अंदर के लोग बाहर आएँ, साहब ऑफिस-रूम से बेड-रूम में चले जाते हैं।
       ड्राइवर आकर जीप पोंछने लगता है। फिर इंजन स्टार्ट करके पानी डालता है। लड़का जीप के आगे-पीछे हो रहा है
      थोड़ी देर में अर्दली निकलता है। साहब की मैगजीन, रूल, पान का डिब्बा, सिगरेट का पैकेट और माचिस लेकर। फिर निकलते हैं साहब, धूप-छाँही चश्मा लगाए। चेहरे पर आभिजात्य और गम्भीरता ओढे़ हुए।
       लड़के पर नजर पड़ते ही पूछते हैं, ''हाँ, बोलो बेटे, कैसे?''
       लड़का सहसा कुछ बोल नहीं पा रहा है। वह सम्भ्रम नमस्कार करता है।
       ''ठीक है, ठीक है।'' साहब जीप में बैठते हुए पूछते हैं, ''काम बोलो अपना, जल्दी, क्या चाहिए?''
      अर्दली बोलता है, ''हुजूर, मैंने लाख पूछा कि क्या काम है, बताता ही नहीं। कहता है, साहब से अकेले में बताना है।''
        ''अकेले में बताना है तो कल मिलना, कल।''
       जीप रेंगने लगती है। लड़का एक क्षण असमंजस में रहता है फिर जीप के बगल में दौड़ते हुए जेब से एक चिट्ठी निकालकर साहब की गोद में फेंक देता है।
      ''ठीक है,  बाद में मिलना'', साहब एक चालू आश्वासन देते हैं। तब तक लड़का पीछे छूट जाता है। लेकिन चिट्ठी की गँवारू शक्ल उनकी उत्सुकता बढ़ा देती है। उसे आटे की लेर्इ से चिपकाया गया है।
        चिट्ठी खोलकर वे पढ़ना शुरू करते हैं- 'सरब सिरी उपमा जोग, खत लिखा लालू की मार्इ की तरफ से, लालू के बप्पा को पाँव छूना पहुँचे...''
        अचानक जैसे करेंट लग जाता है उनको। लालू की मार्इ की चिट्ठी! इतने दिनों बाद। पसीना चुहचुहा आया है उनके माथे पर। सन्न!
        बड़ी देर बाद प्रकृतिस्थ होते हैं वे। तिरछी आँखों और बैक मिरर से देखते हैं- ड्राइवर निर्विकार जीप चलाए जा रहा है। अर्दली ऊँघते हुए झूलने लगा है।
       वे फिर चिट्ठी खोलते हैं-''आगे समाचार मालूम हो कि हम लोग यहाँ पर राजी-खुशी से हैं और आपकी राजी-खुशी भगवान से नेक मनाया करते हैं। आगे, लालू के बप्पा को मालूम हो कि हम अपनी याद दिलाकर आपको दुखी नहीं करना चाहते, लेकिन कुछ ऐसी मुसीबत आ गर्इ है कि लालू को आपके पास भेजना जरूरी हो गया है। लालू दस महीने का था, तब आप आखिरी बार गाँव आए थे। उस बात को दस साल होने जा रहे हैं। इधर दो-तीन साल से आपके चाचाजी ने हम लोगों को सताना शुरू कर दिया है। किसी न किसी बहाने से हमको, लालू को  और कभी-कभी कमला को भी मारते-पीटते रहते हैं। जानते हैं कि आपने हम लोगों को छोड़ दिया है, इसलिए गाँव भर में कहते हैं कि 'लालू' आपका बेटा नहीं है।
         वे चाहते हैं कि हम लोग गाँव छोड़कर भाग जाएँ तो सारी खेती-बारी, घर दुवार पर उनका कब्जा हो जाय। आज आठ दिन हुए, आपके चाचाजी हमें बड़ी मार मारे। मेरा एक दाँत टूट गया। हाथ-पाँव सूज गए हैं। कहते हैं- गाँव छोड़कर भाग जाओ, नहीं तो महतारी-बेटे का मूँड़ काट लेंगे। अपने हिस्से का महुए का पेड़ वे जबरदस्ती कटवा लिये हैं। कमला अब सत्तरह वर्ष की हो गर्इ है। मैंने बहुत दौड़-धूप कर एक जगह उसकी शादी पक्की की है। अगर आपके चाचाजी मेरी झूठी बदनामी लड़के वालों तक पहुँचा देंगे तो मेरी बिटिया की शादी भी टूट जाएगी। इसलिए आपसे हाथ जोड़कर विनती है कि एक बार घर आकर अपने चाचाजी को समझा दीजिए। नहीं तो लालू को एक चिट्ठी ही दे दीजिए, अपने चाचाजी के नाम। नहीं तो आपके आँख फेरने से तो हम भीगी बिलार बने ही हैं, अब यह गाँव-डीह भी छूट जाएगा। राम खेलावन मास्टर ने अखबार देखकर बताया था कि अब आप इस जिले में हैं। इसी जगह पर लालू को भेज रही हूँ।''
    चिट्ठी पढ़कर वे लम्बी साँस लेते हैं। उन्हें याद आता है कि लड़का पीछे बंगले पर छूट गया है। कहीं किसी को अपना परिचय दे दिया तो? लेकिन अब इतनी दूर आ गए है कि वापस लौटना उचित नहीं लग रहा है। फिर वापस चलकर सबके सामने उससे बात भी तो नहीं की जा सकती है। उन्हें प्यास लग आर्इ है। ड्राइवर से कहते हैं, ''जीप रोकना, प्यास लगी  है।'' पानी और चाय पीकर सिगरेट सुलगाया उन्होंने। तब धीरे-धीरे प्रकृतिस्थ हो रहे हैं। उनके मस्तिष्क में दस साल पुराना गाँव उभर रहा है। गाँव, जहाँ उनका प्रिय साथी था- महुए का पेड़, जो अब नहीं रहा। उसी की जड़ पर बैठकर सबेरे से शाम तक 'कम्पटीशन' की तैयारी करते थे वे। गाँव जहाँ उनकी उस समय की प्रिय बेटी कमला थी। जिसके लाल-लाल नरम होंठ कितने सुंदर लगते थे। महुए के पेड़ पर बैठकर कौआ जब 'काँ-काँ!' बोलता तो जमीन पर बैठी नन्ही कमला दुहराती- काँ ! काँ ! कौआ थक-हारकर उड़ जाता तो वह ताली पीटती थी। वह अब सयानी हो गर्इ है। उसकी शादी होने वाली हैं एक दिन हो भी जाएगी। विदा होते समय अपने छोटे भार्इ का पाँव पकड़कर रोएगी। बाप का पाँव नहीं रहेगा पकड़कर रोने के लिए। भार्इ आश्वासन देगा कंधा पकड़कर, आफत-बिपत में साथ देने का। बाप की शायद कोर्इ घुँधली-सी तस्वीर उभरे उसके दिमाग में।
        फिर उनके दिमाग में पत्नी के टूटे दाँत वाला चेहरा घूम गया। दीनता की मूर्ति, अति परिश्रम-कुपोषण और पति की निष्ठुरता से कृश, सूखा शरीर, हाथ-पाँव सूजे हुए, मार से। बहुत गरीबी के दिन थे, जब उनका गौना हुआ था। इंटर पास किया था उस साल। लालू की मार्इ बलिष्ठ कद-काठी की हिम्मत और जीवट वाली महिला थी, निरक्षर लेकिन आशा और आत्मविश्वास की मूर्ति। उसे देखकर उनके मन में श्रद्धा होती थी उसके प्रति। इतनी आस्था हो जिंदगी और परिश्रम में तो संसार की कोर्इ भी वस्तु अलभ्य नहीं रह सकती। बी0 ए0 पास करते-करते कमला पैदा हो गर्इ थी। उसके बाद बेरोजगारी के वर्षो में लगातार हिम्मत बँधाती रहती थी। अपने गहने बेचकर प्रतियोगिता परीक्षा की फ़ीस और पुस्तकों की व्यवस्था की थी उसने। खेती-बारी का सारा काम अपने जिम्मे लेकर उन्हें परीक्षा की तैयारी के लिए मुक्त कर दिया था। रबी की सिंचार्इ के दिनों में सारे दिन बच्ची को पेड़ के नीचे लिटाकर कुएँ पर पुर हाँका करती थी। बाजार से हरी सब्जी खरीदना सम्भव नहीं था, लेकिन छप्पर पर चढ़ी हुर्इ नेनुआ की लताओं को वह अगहन-पूस तक बाल्टी भर-भर कर सींचती रहती थी, जिससे उन्हें हरी सब्जी मिलती रहे। रोज सबेरे ताजी रोटी बनाकर उन्हें खिला देती और खुद बासी खाकर लड़की को लेकर खेत पर चली जाती थी। एक बकरी लार्इ थी वह अपने मायके से, जिससे उन्हें सबेरे थोड़ा दूध या चाय मिल सके। रात को सोते समय पूछती, ''अभी कितनी किताब और पढ़ना बाकी है, साहबी वाली नौकरी पाने के लिए।''
      वे उसके प्रश्न पर मुस्करा देते, ''कुछ कहा नहीं जा सकता। सारी किताबें पढ़ लेने के बाद भी जरूरी नहीं कि साहब बन ही जाएँ।''
       ऐसा मत सोचा करिए,'' वह कहती, ''मेहनत करेंगे तो भगवान उसका फल जरूर देंगे।''
      यह उसी के त्याग, तपस्या और आस्था का परिणाम था कि एक ही बार में उनका सेलेक्शन हो गया था। परिणाम निकला तो वे खुद आश्चर्यचकित थे। घर आकर एकांत में पत्नी को गले से लगा लिया था। वाणी अवरूद्ध हो गर्इ थी। उसको पता लगा तो वह बड़ी देर तक निस्पंद रोती रही, बेआवाज। सिर्फ आँसू झरते रहे थे। पूछने पर बताया, खुशी के आँसू हैं ये। गाँव की औरतें ताना मारती थीं कि खुद ढोएगी गोबर और भतार को बनाएगी कप्तान, लेकिन अब कोर्इ कुछ नहीं कहेगा, मेरी पत बच गर्इ।
        वे भी रोने लगे थे उसका कंधा पकड़कर।
      जाने कितनी मनौतियाँ माने हुए थी वह। सत्यनारायण... संतोषी... शुक्रवार... विंध्याचल... सब एक-एक करके पूरा किया था। जरा-जीर्ण कपडे़ में पुलकती घूमती उसकी छवि, जिसे कहते हैं, राजपाट पा जाने की खुशी।
       सर्विस ज्वाइन करने के बाद एक-डेढ़ साल तक वे हर माह के द्वितीय शनिवार और रविवार को गाँव जाते रहे थे। पिता, पत्नी, पुत्री सबके लिए कपडे़-लत्ते तथा घर की अन्य छोटी-मोटी चीजें, जो अभी तक पैसे के अभाव के कारण नहीं थीं, वे एक-एक करके लाने लगे थे। पत्नी को पढ़ाने के लिए एक ट्यूटर लगा दिया था। पत्नी की देहाती ढंग से पहनी गर्इ साड़ी और घिसे-पिटे कपडे़ उनकी आँखों में चुभने लगे थे। एक-दो बार शहर ले जाकर फिल्म वगैरह दिखा लाए थे, जिसका अनुकरण कर वह अपने में आवश्यक सुधार ले आए। खड़ी बोली बोलने का अभ्यास कराया करते थे, लेकिन घर-गृहस्थी के अथाह काम और बीमार ससुर की सेवा से इतना समय वह न निकाल पाती, जिससे पति की इच्छा के अनुसार अपने में परिवर्तन ला पाती। वह महसूस करती थी कि उसके गँवारपन के कारण वे अक्सर खीज उठते और कभी-कभी तो रात में कहते कि उठकर नहा लो और कपडे़ बदलो, तब आकर सोओ। भूसे जैसी गंध आ रही है तुम्हारे शरीर से। उस समय वह कुछ न बोलती। चुपचाप आदेश का पालन करती, लेकिन जब मनोनुकूल वातावरण पाती तो मुस्कराकर कहती, ''अब मैं आपके 'जोग' नहीं रह गर्इ हूँ, कोर्इ शहराती 'मेम' ढूँढ़िए अपने लिए।''
      ''क्यों, तुम कहाँ जाओगी?''
      ''जाउँगी कहाँ, यहाँ रहकर ससुरजी की सेवा करूँगी। आपका घर-दुवार सँभालूँगी। जब कभी आप गाँव आएँगे, आपकी सेवा करूँगी''
      ''तुमने मेरे लिए इतना दुख झेला है, तुम्हारे ही पुण्य-प्रताप से आज मैं धूल से आसमान पर पहुँचा हूँ, गाढे़ समय में सहारा  दिया है। तुम्हें छोड़ दूँगा तो नरक में भी जगह न मिलेगी मुझे?''
       लेकिन उनके अंदर उस समय भी कहीं कोर्इ चोर छिपा बैठा था, जिसे वे पहचान नहीं पाए थे।
       जिस साल लालू पैदा हुआ, उसी साल पिताजी का देहांत हो गया। क्रिया-कर्म करके वापस गए तो मन गाँव से थोड़ा-थोड़ा उचटने लगा था। दो बच्चों की प्रसूति और कुपोषण से पत्नी का स्वास्थ्य उखड़ गया था। शहर की आबोहवा तथा साथी अधिकारियों के घर-परिवार का वातावरण हीन भावना पैदा करने लगा था। जिंदगी के प्रति दृष्टीकोण बदलने लगा था। गाँव कर्इ-कर्इ महीनों बाद आने लगे थे। और आने पर पत्नी जब घर की समस्याएँ बताती तो लगता, ये किसी और की समस्याएँ हैं। इनसे उन्हें कुछ लेना-देना नहीं है। वे शहर में अपने को 'अनमैरिड' बताते थे। इस समय तक उनकी जान-पहचान जिला न्यायाधीश की लड़की ममता से हो चुकी थी और उसके सान्निध्य के कारण पत्नी से जुड़ा रहा-सहा रागात्मक सम्बन्ध भी अत्यंत क्षीण हो चला था।
     तीन-चार महीने बाद फिर गाँव आए तो पत्नी ने टोका था, ''इस बार काफी दुबले हो गए हैं। लगता है, काफी काम रहता है, बहुत गुमसुम रहने लगे हैं, क्या सोचते रहते हैं?''
      वे टाल गए थे। रात में उसने कहा, ''इस बार मैं भी चलूँगी साथ में। अकेले तो आपकी देह गल जाएगी।''
      वे चौंक गए थे, ''लेकिन यहाँ की खेती-बारी, घर-दुवार कौन देखेगा? अब तो पिताजी भी नहीं रहे।''
      ''तो खेती-बारी के लिए अपना शरीर सुखाइएगा?''
      ''तुम तो फालतू में चिंता करती हो,'' लेकिन वह कुछ और सुनना चाहती थी, बोली थी, ''फिर आप शादी क्यों नहीं कर लेते वहाँ किसी पढ़ी-लिखी लड़की से? मैं तो शहर में आपके साथ रहने लायक भी नहीं हूँ।''
       ''कौन सिखाता है तुम्हें इतनी बातें?''
       ''सिखाएगा कौन? यह तो सनातन से होता आया है। मैं तो आपकी सीता हूँ। जब तक बनवास में रहना पड़ा, साथ रही, लेकिन राजपाट मिल जाने के बाद तो सोने की सीता ही साथ में सोहेगी। लालू के बाबू, सीता को तो आगे भी बनवास ही लिखा रहता है।''
       ''चुपचाप सो जाओ।'' उन्होंने कहा, लेकिन सोर्इ नहीं वह। बड़ी देर तक छाती पर सिर रखकर पड़ी रही फिर बोली, ''एक गीत सुनाऊँगी आपको। मेरी माँ कभी-कभी गाया करती थी।'' फिर बडे़ करूण स्वर में गाती रही थी वह, जिसकी एकाध पंक्ति ही अब उन्हें याद है- '' सौतनिया संग रास रचावत, मों संग रास भुलान, यह बतिया कोऊ कहत बटोही, त लगत करेजवा में बान, सँवरिया भूले हमें...''
       वे अंदर से हिल गए और उसे दिलासा देते रहे कि वह भ्रम में पड़ गर्इ है, पर वह तो जैसे भविष्यद्रष्टा थी। आगत, जो अभी उनके सामने भी बहुत स्पष्ट नहीं था, उसने साफ देख लिया था। उनके सीने में उसने कहीं 'ममता' की गंध पा ली थी।
       उस बार गाँव से आए तो फिर पाँच-छह महीने तक वापस जाने का मौका नहीं लग पाया। इसी बीच ममता से उनका विवाह हो गया। शादी के दूसरे तीसरे महीने गाँव  से पत्नी का पत्र आया कि कमला को चेचक निकल आर्इ है। लालू भी बहुत बीमार है। मौका निकालकर चले आइए। लेकिन गाँव वे पत्र मिलने के महीने भर बाद ही जा सके। कोर्इ बहाना ही समझ में नहीं आ रहा था, जो ममता से किया जा सकता। दोनों बच्चे तब तक ठीक हो चुके थे, लेकिन उनके पहुँचने के साथ ही उसकी आँखें झरने-सी झरनी शुरू हो गर्इ थीं। कुछ बोली नहीं थी। रात में फिर वही गीत बड़ी देर तक गाती रही थी। उनका हाथ पकड़कर कहा था, ''लगता है, आप मेरे हाथों से फिसले जा रहे हैं और मैं आपको सँभाल नहीं पा रही हूँ।''
     वे इस बार कोर्इ आश्वासन नहीं दे पाए थे। उसका रोना-धोना उन्हें काफी अन्यमनस्क बना रहा था। वे उकताए हुए से थे। अगले ही दिन वे वापस जाने को तैयार हो गए थे। घर से निकलने लगे तो वह आधे घंटे तक पाँव पकड़कर रोती रही थी। फिर लड़की को पैरों पर झुकाया था, नन्हे लालू को पैरों पर लिटा दिया था। जैसे सब कुछ लुट गया हो, ऐसी लग रही थी वह, दीन-हीन-मलिन।
     वे जान छुड़ाकर बाहर निकल आए थे। वही उनका अंतिम मिलन था। तब से दस साल के करीब होने को आए, वे न कभी गाँव गए, न ही कोर्इ चिट्टी -पत्री लिखी।
      हाँ, करीब साल भर बाद पत्नी की चिट्ठी जरूर आर्इ थी। न जाने कैसे उसे पता लग गया था, लिखा था-कमला नर्इ अम्मा के बारे में पूछती है कभी ले आइए उनको गाँव। दिखा-बता जाइए कि गाँव में भी उनकी खेती-बारी, घर-दुवार है। लालू अब दौड़ लेता है। तेवारी बाबा उसका हाथ देखकर बता रहे थे कि लड़का भी बाप की तरह तोता-चश्म होगा। जैसे तोते को पालिए-पोसिए, खिलाइए-पिलाइए, लेकिन मौका पाते ही उड़ जाता है। पोस नहीं मानता। वैसे ही यह भी...तो मैंने कहा, 'बाबा, तोता पंछी होता है, फिर भी अपनी आन नहीं छोड़ता, जरूर उड़ जाता है, तो आदमी होकर भला कोर्इ कैसे अपनी आन छोड़ दे? पोसना कैसे छोड़ दे? मैं तो इसे इसके बापू से भी बड़ा साहब बनाऊँगी...'
      उन्होंने पत्र का कोर्इ उत्तर नहीं भेजा था। हाँ, वह पत्र ममता के हाथों में जरूर पड़ गया था, जिसके कारण महीनों घर में रोना-धोना और तनाव व्याप्त रहा था।... और करीब नौ साल बाद आज यह दूसरा पत्र है।
      पत्र उनके हाथों में बड़ी देर तक काँपता रहा और फिर उसे उन्होंने जेब में रख लिया। मन में सवाल उठने लगे- क्या मिला उसको उन्हें आगे बढ़ाकर? वे बेरोजगार रहते, गाँव में खेती-बारी करते। वह कंधे से कंधा भिड़ाकर खेत में मेहनत करती। रात में दोनों सुख की नींद सोते। तीनों लोकों का सुख उसकी मुट्ठी में रहता। छोटे से संसार में आत्मतुष्ट हो जीवन काट देती। उन्हें आगे बढ़ाकर वह पीछे छूट गर्इ। माथे का सिंदूर और हाथ की चूड़ियाँ निरंतर दुख दे रही हैं उसे।
       सारे दिन किसी कार्यक्रम में उनका मन नहीं लगता।

      शाम को जीप वापस लौट रही है। उनके मस्तिष्क में लड़के का चेहरा उभर आया है- जैसे मरूभूमि में खड़ा हुआ अशेष जिजीविषा वाला बबूल का कोर्इ शिशु झाड़, जिसे कोर्इ झंझावात डिगा नहीं सकता। कोर्इ तपिश सुखा नहीं सकती। उपेक्षा की धूप में जो हरा-भरा रह लेगा, अनुग्रह की बाढ़ में जो गल जाएगा।
       जीप गेट के अंदर मुड़ती है तो गेट से सटे चबूतरे पर लड़का औंधा लेटा दिखार्इ देता है। मच्छरों से बचने के लिए उसने अंगौछे से सारा शरीर ढँक लिया है। जीप आगे बढ़ जाती है।
       अंदर उनकी चार साल की बेटी टी.वी. देख रही है। आहट पाकर दौड़ी आती है और पैरों से लिपट जाती है। फिर महत्वपूर्ण सूचना देती है तर्जनी उठाकर, ''पापा, पापा, ओ बदमाश लड़का, बरामदे तक घुस आया था। मम्मी पूछती, तो बोलता नहीं था। भगाती तो भागता नहीं था। मैंने अपनी खिलौना मोटर फेंककर मारा, उसका माथा कटने से खून बहकर मुँह में जाने लगा तो थू-थू करता हुआ भागा। और पापा, वह जरूर बदमाश था। जरा भी नहीं रोया। बस, घूर रहा था। बाहर चपरासियों के लड़के मार रहे थे, लेकिन मम्मी ने मना करवा दिया।''
        वाश-बेसिन की तरफ बढ़ते हुए वे ममता से पूछते हैं, ''कौन था?''
        ''शायद आपके गाँव से आया है। भेंट नहीं हुर्इ क्या?''
        ''मैं तो अभी चला आ रहा हूँ, कहाँ गया?''
        ''नाम नहीं बताता था, काम नहीं बताता था, कहता था, सिर्फ साहब को बताऊँगा। फिर लड़के तंग करने लगे तो बाहर चला गया।''
       ''कुछ खाना-पीना ?''
       ''पहले यह बताइए, वह है कौन?'' एकाएक ममता का स्वर कर्कश और तेज हो गया, ''उस चुड़ैल की औलाद तो नहीं, जिसे आप गाँव का राज-पाट दे आए हैं? ऐसा हुआ तो खबरदार, जो उसे गेट के अंदर भी लाए, खून पी जाऊँगी।''
        वे चुपचाप ड्राइंगरूम में आकर सोफे पर निढाल पड़ गए हैं। चक्कर आने लगा है। शायद रक्तचाप बढ़ गया है।
        बाहर फागुनी जाड़ा बढ़ता जा रहा है।
        सबेरे उठकर वे देखते हैं- चबूतरे पर 'गाँव' नहीं है।
        वे चैन की साँस लेते हैं।


    सबेरे उठकर वे देखते हैं- चबूतरे पर 'गाँव' नहीं है।
    वे चैन की साँस लेते हैं।

Wednesday, May 16, 2012

तिरिया चरित्तर

                                                                    तिरिया चरित्तर

यह कहानी साहित्यिक पत्रिका 'हंस' के जून 1987  अंक में प्रकाशित हुई थी। उस वर्ष हंस में प्रकाशित कहानियों में  इसे प्रथम पुरस्कार दिया गया था। इस कहानी के कई स्थानों पर मंचन हुए तथा कई भाषाओं में अनुवाद हुआ। बासु चटर्जी  के निर्देशन में ओम पुरी और नसीरूद्‌दीन को लेकर फिल्म बनी। ब्लॉग के पाठको के लिए मूल रूप में यहाँ प्रस्तुत -
  
    ''विमली ! ए विमली!...एकदम्मै मर गर्इ का रे...''
       जोर लगाते ही बुढ़िया को खाँसी आ जाती है।
      ''यह हरजार्इ तो खटिया पर गिरते ही मर जाती है।'' -बुढ़िया खटिया के पास जाकर विमली को झिंझोड़ने लगी, ''मरघट ले चलौं का रे?''
         हड़बड़ाकर उठती है विमली और आँख मींजते हुए झोंपड़ी के बाहर चली जाती है।
        लौटती है तो चूल्हे पर 'चाह' का पानी चढ़ाकर बकरी दुहने लगती है।
        सात साल पहले, जब पहली बार उसने भट्‌ठे पर मजूरी करना शुरू किया था, नौ-दस साल की उमर में, तो कमार्इ के शुरूआत के पैसों से इस बकरी की माँ को खरीदकर लार्इ थी वह। बाप के लिए 'चाह' का इंतजाम! और अब तो उसके बाप को चाह की ऐसी आदत पड़ गर्इ है कि बिना 'चाह' के उसका लोटा ही नहीं उठता। इसी चाह के चलते बाप-बेटी को बुढ़िया की 'बोली' सुननी पड़ती है।
          माँ-बाप को चाह का गिलास पकड़ाकर जल्दी-जल्दी नहाती है वह। रोटी सेंकती है। माँ-बाप के लिए ढँककर और अपनी रोटी बाँधकर निमरी बकरी का कान  पकड़कर बाहर निकल जाती है।
        आज भी निकलते-निकलते देर हो गर्इ। रोज रात में सोते समय सोचती है कि सबेरे चार बजे ही उठेगी। लेकिन दिनभर र्इंट ढोने से थका शरीर! आँखों की पलकें जैसे चिपक जाती हैं आपस में। रोज पाँच-छ: बज जाते हैं। माँ को रोटी-पानी के काम में वह लगाना नहीं चाहती...
         दरअसल माँ-बाप के लिए लड़का बनकर रहती है विमली! क्या-क्या नहीं सहा-सुना उसके माँ-बाप ने उसके लिए! वह नहीं चाहती कि उसके माँ-बाप लड़के के अभाव को लेकर दुखी हों। किस लड़के से कम है वह? 15-16 रूपए  रोज कमाती है, बाप को जाँगर पेरने वाला काम क्यों करने दे? बाप का मन होता है तो गाँव के किसी किसान के गाय-भैंस का पगहा 'बर' देता है। टोना झाड़-फूँक देता है। किसी की बहन-बेटी, नाते-रिश्तेदारों के घर हालचाल लेने चला जाता है, बस! हल्का-फुल्का काम!
          गाँव के पश्चिम आधा किलोमीटर पर बहती है बिसुर्इ नदी! अर्ध-चंद्राकार! और नदी के उस पार खान साहब का भट्‌ठा! काला धुआँ फेंकती दोनों चिमनियाँ दूर से ही दिखती हैं।
          नदी के दोनों किनारों पर कठजामुनों का जंगल दूर तक चला गया है। धारा की ओर झुकी झाडि़याँ! और उस पार दूर-दूर तक फैला है बाँस और सरपत का जंगल ! पहले लोग दिन में भी इस खादर में घुसने से डरते थे। खास कर औरतें!...साही, सियार, नीलगाय, लकड़बग्घे, भेड़िए!... और यदा-कदा गाँव के कच्चे मांस पर नजर गड़ाए गाँव के भेड़िये!
         पर जब से भट्‌ठा खुला, यह खादर गुलजार हो गया है। आधे से अधिक गाँव वालों की जीविका अब इसी भट्‌ठे के सहारे चल रही है।
        विमली 'निमरी' बकरी को कठजामुनों के जंगल में हाँकती है और तेज कदम बढ़ाती भट्‌ठे की ओर चल पड़ती है।
         कुइसा बोझवा का मन काम में लग नहीं रहा है। एक 'झुकान' में दस हजार र्इंटों की बोझार्इ करके मूंडी उठाने वाला बोझवा है कुइसा! लेकिन आज!
           वह रह-रहकर 'कनमनाता' है और गाँव की ओर से आने वाली पगडंडी पर नजर दौड़ाकर जँभार्इ लेता है।
          गनेशी टोकता है, ''का बात है कुइसा भार्इ? मन नाहीं लागत का?''
          कुछ जवाब नहीं देता कुइसा। बंडी की जेब से चुनौटी निकालकर तम्बाकू मलने लगता है।
          ट्रैक्टर पर र्इंट लदवाता बिल्लर कूट करता है, ''कुछ लाल-पियर नाहीं देखात का हो काका?''
          लाल! पियर! यानी लाल-पीला!
        सुनकर सचमुच लाल-पीला होने लगता है कुइसा! तम्बाकू फटककर बिना किसी को दिए चुपचाप मुँह में दबा लेता है। ऐं!
          बिल्लर की बात हमेशा चिढ़ाने वाली होती है।
          लेकिन नहीं! सचमुच लाल साड़ी नजर आ जाती है कुइसा को
          विमली भट्‌ठे के पास पहुँच गर्इ है।
          कुइसा की आँखों में चमक आ जाती है।
          मुँह में रस या राल? तम्बाकू की या...?
         पास आते ही कुइसा आँख तरेरता है, ''अब तेरा आने का टैम हुआ है? दस बजने वाले हैं। चलते समय घड़ी देखा था?''
        विमली कुइसा की आदत जानती है। बिना मसखरी किए उसका खाना हजम नहीं हो सकता। वह भी आँख तरेरती है, ''जेतना काम करेंगे ओतने न मजूरी मिलैगी। तब काहें तोहार छाती फाटत है? और घड़ी देखै अपनी बहिनी क सिखाओ।''
         सभी हँसने लगते हैं। कुइसा मुस्कराता है।
         कुइसा कहता है कि विमली के आने से भट्‌ठे पर 'उजियार' हो जाता है। उसके जाते ही अँधियार!
        ... और अँधियार होते ही 'रतौंधी' शुरू हो जाती है कुइसा को। विमली अगर रात में भट्‌ठे पर रहे तो कुइसा रात में भी बोझार्इ कर सकता है।
       पहला खेप लेकर आती है विमली। एक पल खड़ी रहती है। कुइसा जान-बूझकर उसके सिर से र्इंट नहीं उतारता।
         ''लेव पकरौ? गरूआत अहीं!''
         कुइसा की नजरें उठती हैं। वह मुस्कराता है।
        अब यह कुछ 'मुराही' करेगा। विमली ताड़ती है और कुइसा के पैरों के पास र्इंटें गिराकर मुस्कराती मिठऊ गाली देती भागती है।
         बस इतने का ही तो भूखा है कुइसा।
       अपनी-अपनी पसंद! कुइसा को औरतों की गालियाँ, और मिल जाय तो धक्का खाना पसंद है। अगर चार औरतें मिलकर उसे नदी में डुबोने लगें तो भी वह इंकार नहीं कर सकता।
       कुइसा की इस आदत से परिचित हैं भट्‌ठे की मजदूरनें। सब मिलकर ऐसा कुछ करती कहती रहती हैं कि कुइसा का मन लगा रहे।
        पचास के पेटे में पहुँच रहा है कुइसा। दर्जनों भट्‌ठों पर बोझवा मिस्तरी रह चुका है। भट्‌ठे का काम हाथ में लेने के पहले देख लेता है-कौड़िहा मजदूर सिर्फ राँची के ही हैं या लोकल भी। सिर्फ राँची-विलासपुर के लेबरों वाले भट्‌ठे पर एक दिन नहीं रह सकता कुइसा। दस-पाँच लोकल मजदूरनें जरूरी हैं - देखने लायक!
        सिर से र्इंट उतारते हुए गरम साँस और तन का परस!
        कुइसा के इस 'लोभ' से वाकिफ हैं खान साहब। तभी तो इस भट्‌ठे पर वह तीसरा सीजन बिता रहा है।
        दरअसल भट्‌ठे को ही कुइसा घर-द्वारा मानता है। जोरू न जाँता! गौना आया तो कुइसा पर भट्‌ठा मिस्तरी बनने का भूत सवार था। पूरा का पूरा सीजन भट्‌ठे पर बिताता। आखिर दो साल इंतजार करने के बाद उसकी औरत चली गर्इ किसी और का घर बसाने। तब से हर साल 'लगन' के महीनों में कुइसा बरदेखुओं का इंतजार करता है। भट्‌ठे का नशा तो प्राण के साथ ही जाएगा।
        कुछ देर बाद विमली के सिर से र्इंट उतारते हुए फिर मुस्कराता है कुइसा, ''बहुत दिन हुए डरेवर बाबू नहीं आए!''
         ''बड़ी याद आवत है डरेवर बाबू की?'' एक लड़की बोलती है।
         सभी जानते हैं कि कुइसा विमली को चिढ़ा रहा है।
         ''इनके बहनोर्इ हैं डरेवर बाबू! याद काहे न आए।'' विमली जाते-जाते बोलती है।
         कुइसा की सुस्ती फिर दूर हो जाती है।
        लेकिन दोपहर में औरतों के झुंड के साथ नदी किनारे पीपल के पेड़ के नीचे सुस्ताते-खाते हुए विमली को सचमुच डरेवर बाबू की याद आती है। लगता है एक युग बीत गया डरेवर बाबू को देखे हुए।
       कुइसा मिस्तरी झोंपड़ी में लेटा बारहमासा गा रहा है दुपहरिया काटने के लिए। औरतों-लड़कियों का झुंड नाना प्रकार की कथाओं-उपकथाओं अफवाहों और गोपनीय कृत्यों-कुकृत्यों का पिटारा खोलकर बैठा है। उन सबकी सम्मिलित हँसी-खिलखिलाहट कुइसा के कानों में पहुँचती है तो वह बारहमासा का पद भूल जाता है।
       जाडे़ की दोपहर कितनी जल्दी-जल्दी उतरती है। विमली को आज अपनी माँ को लेकर बाजार जाना है- डाक्टर के पास। 'अधकपारी' की दवा कराने। इसलिए दोपहर ढलते ही उसने काम बंद कर दिया है। निमरी बकरी का कान पकड़कर वापस लौटती विमली नदी के पेटे में उतरती है तो सामने बिल्लर  ट्रैक्टर धोता हुआ दिखार्इ पकड़ता है।
          विमली को आता देखकर खीस निकालने लगता है
         हमेशा हँसता-हँसाता रहने वाला लड़का है बिल्लर। अट्‌ठारह-उन्नीस की उमर। महतारी न बाप। इस गाँव में अपनी बहन के घर रहता है और खान साहब के ट्रैक्टर की कालिंजरी करते-करते ड्राइवर बन गया है। दु:ख-तकलीफ की झाँर्इ पास नहीं फटकने देता। फक्कड़ और मसखरा।
         ऐसे आदमी की हँसी का साथ देने में कोर्इ बुरार्इ नहीं समझती विमली। वह भी मुस्कराती है।
         ''आज हाफ-डे काहे कर दिया डरेबराइन?''
         बिल्लर के बात करने के ढंग से थोड़ा चिढ़ती है विमली। अकेले में थोड़ा डरती भी है। पाजी है। इसकी आँखों में शैतानी चमकती है।
         ''तोहार जीभ बहुत चलै लाग बिलरू! हम डरेबराइन हैं?''
        फिर हँसता है बिल्लर! और जब विमली ट्रैक्टर की सीध में पहुँचती है तो एक बाल्टी पानी ट्रैक्टर के मडगार्ड पर इस अंदाज से फेंकता है कि आधा पानी उछलकर विमली के ऊपर पड़ता है जाकर।
        ''तनी देखि के बिलराहू! अँखिया फूटि गर्इ है का?'' विमली मुड़कर आँख तरेरती है तो वह खी-खी करके हँसने लगता है।
        पानी का छींटा पड़ने से भड़की बकरी उथले पानी में कूदती उस पार चली गर्इ है। विमली थोड़ा-सा धोती ऊपर उठाए धार पार करने लगती है।
        ''परदेसी का 'टरक' बहुत मन भाया है। जाति बिरादरी का एकदम खियाल नहीं। ट्रैक्टर की ताकत टरक से 'बेसी' होती है विम्मल; कहो तो कौनों दिन लड़ा के दिखा देर्इ।''
        उस पार पहुँचकर पीछे मुड़कर मुस्कराती है विमली तो बिल्लर बोनट से उछलकर नदी के दह में कूद पड़ता है।
         ऊपर टीले पर चढ़ते-चढ़ते विमली को बिल्लर का गीत सुनार्इ पड़ता है।
            ...अरे, टुटही मँड़इया के हम हैं राजा,
            करीला गुजार थोरे मा,
            तोर मन लागै न लागै पतरकी,
             मोर मन लागल बा तोरे मा, 
    यानी राजा तो हम भी हैं भार्इ! लेकिन टूटी-फूटी झोपड़ी के राजा! थोडे़ में गुजारा करने वाले। डरेवर बाबू की तरह भारी मुँह-देखार्इ तो नहीं दे सकते... लेकिन ऐ पतरकी! पतली कमर वाली तिरिया! तेरा मन मेरे पर आए न आए, मेरा मन तो तेरे पर ही लगा हुआ है।
         आय-हाय! क्या गोली दागी है बिलराहे ने! वह फिर मुड़कर देखती है। बिल्लर हँस रहा है और ट्रैक्टर के बोनट पर पैर से ताल दे-देकर नाच रहा है।

           ह.......रा.......मी !

           बिजली  का तेल!
        मार्इ की 'अधकपारी' के लिए बिजली का तेल मँगाया है विमली ने। कलुआ का मामा बिजली विभाग में काम करता है, उसी से।
         मामा कहता है, ''ट्रांसफार्मर का तेल! तेल से होकर बिजली गुजरती है तो तेल में बिजली जैसा गुन भर देती है।''
         सचमुच बिजली जैसा असर करता है- बिमली की मार्इ कहती है- बाजार के डॉक्टर तो पानी का पैसा लेते हैं। जेब काटने को तैयार! विमली की मार्इ को डॉक्टरी दवार्इ नही 'सहती'।
        महतारी-बाप का जितना ध्यान विमली रखती है, उतना तो इस गाँव में किसी का लड़का भी नहीं रखता।  लड़के का ध्यान आते ही उसकी माँ पतोहू को और गाँव की कुटनी-घरफोड़नी औरतों को सरापने लगती है। उसका बेटा विमली से दस साल बड़ा था। लेकिन पतोहू ने आते ही उसे अपने बस में कर लिया। गाँव की औरतों ने आग में पलीता लगाया था और आने के छ: माह के अंदर पतोहू लड़के को लेकर अलग हो गर्इ थी। उसी साल दीवार के नीचे दबने से विमली के बाप के दोनों हाथ बेकार हो गए थे। घर में खाने के लिए अन्न का एक दाना नहीं था। बाप की दवार्इ के लिए पैसा कहाँ से अता? पतोहू के जेवर सास के पास ही रखे थे। जमीन में दबाए हुए। उसी में से एक थान गिरवी रखना चाहती थी बुढ़िया। सुनते ही अगियाबैताल हो गर्इ थी पतोहू। बिना पानी पिए तीन दिन तक इसी बात पर लड़ती रही थी। सात पुस्त को गरियाती रही थी। लड़के ने सिर उठाकर एक बार भी उसे मना नहीं किया। तीसरी रात झोंपड़ी खोदकर गहने ढूँढ़ निकाले थे पतोहू ने और उसके बेटे को लेकर अपने मायके चली गर्इ थी, जैसे बकरे को गले में पगहा लगाकर ले जाए कोर्इ
        तीन दिन तक घर में चूल्हा नहीं जला था। बूढे़ के हाथों पर 'पलस्तर' चढ़वाना तो बहुत ही जरूरी था लेकिन पूरे गाँव में खोजने पर भी कोर्इ दस रूपया या एक मन अनाज देने को तैयार नहीं था। सरपंचजी की घरवाली पर ज्यादा जोर समझती थी विमली की मार्इ। विमली दो साल से उन्हीं के घर पर रहकर चौका-बासन, गोबर-झाडू कर रही थी। मजदूरी के नाम पर दोनों टेम की रोटी और सरपंचजी की बिटिया का उतारन फराक, चड्‌ढी।
      लाख पैर पकडे़ विमली की मार्इ ने कि बिना पेट में कुछ गए सबेरे दोनों बूढ़ा-बूढ़ी उठने लायक नहीं रहेंगे लेकिन सरपंच की औरत ने साफ कह दिया - बिना कोर्इ चीज गिरवी रखे कानी कौड़ी नहीं दे सकती वह! ...और गिरवी रखने की चीजें लेकर पतोहू मायके जा चुकी थी...विमली टुकुर-टुकुर माँ का रोना देख रही थी।
         रोते-रोते खाली हाथ वापस लौट आर्इ थी विमली की मार्इ- एक घंटा रात बीते। दोनों बूढे-बूढी तीसरी रात को भी खाली पेट लेटे।
       लेकिन पहर रात बीते आर्इ थी विमली। नौ साल की बच्ची ! फराक में दोपहर की बनी दो मोटी रोटियाँ छिपाए हुए। एक विमली का हिस्सा और एक सरपंचजी की दोनों भैंसों का। भैसों के हौदे में न डालकर वह रोटियाँ लेकर माँ के पास दौड़ी आर्इ थी और किसी को संदेह न हो इसलिए उसे दौड़ते हुए ही वापस भाग जाना था।
         रात भर लगा था निर्णय लेने में विमली को। और सवेरे वह अपनी झोंपड़ी में लौट आर्इ थी, ''नहीं करना उसे ऐसी जगह गोबर-झाडू़, जहाँ माँगने पर भीख भी नहीं मिल सकती।''
        ''नहीं करना? फिर क्या करेगी? गरीबी में आटा गीला करेगी? कम-से-कम अपना पेट तो पाल रही है। यहाँ तो तीन दिन से चूल्हा रो रहा है।''
        ''अपना ही क्यों? सबका पेट पालेगी वह!'' भार्इ भाग गया तो क्या? वह लड़का बनकर रहेगी। नया-नया भट्‌ठा खुला है गाँव में। काम की अब क्या कमी है?...कौन कहता है कि आदमी-लड़के ही काम कर सकते हैं भट्‌ठे पर? राँची की मजदूरनें औरतें नहीं है? वे किसी से कम काम करती हैं? तब वह क्यों नही कर सकती? कितनी बार तो बुलाने आ चुका है भट्‌ठे का मुंशी गाँव की औरतों-लड़कियों को। वह कल से ही भट्‌ठे पर नाम लिखा लेगी...जितनी र्इंट ढोओ उतना पैसा। ठेके पर।''
         कुछ अटपटा-सा लगा बिमली की मार्इ को। दुनिया की बात वह नहीं जानती लेकिन यहाँ पर तो अभी तक आदमी लोग ही जाते हैं भट्‌ठे पर। औरतों का जाना...
         लेकिन विमली की मार्इ चुप भी हो जाए तो क्या सारा गाँव चुप रह जाएगा। सबसे पहले सरपंच की घरवाली ने ही मुँह बिचकाना शुरू किया, ''हुँह! सठिया गर्इ है क्या बुढ़िया? अच्छे भले खाते-पीते घर में पड़ गर्इ थी लड़की। जूठा-कूठा खाकर, घूरे पर सोकर भी चार साल में बाछी से गाय हो जाती। अब भट्‌ठे पर 'टरेनिंग' देगी बिटिया को। सयानी हो रही है ना। इस घर का गल्ला खा-खाकर उमर से पहले ही मस्ती चढ़ रही है। ले 'टरेनिंग'। बहुत लोग 'टरेनिंग' देने के लिए 'लोक' लेने को बैठे हैं वहाँ।''
         विमली के बाप को चढ़ाया सबने, ''दुनिया भर के चोर-चार्इ का अड्‌डा है भट्‌ठा। लौंडे-लपाडे़! गुंडा-बदमाश! रात-बिरात आते-जाते रहते हैं। नौ-दस साल की लड़की छोटी नहीं होती, आन्हर हो गर्इ है बुढ़िया। र्इंट पथवाएगी। 'पाथेगा' कोर्इ ढंग से तब समझ में आएगा।''
        विमली के बाप का तो दिमाग ही गरम हो गया था 'बोली' सुन-सुनकर। नाक कटवाने पर तुल गर्इ है दोनों माँ-बेटी...नहीं करवाना उसे हाथ पर पलस्तर। लूला ही रहेगा। भूखों ही मरेगा लेकिन..., हाथ ठीक होता तो गला दबा देता माँ-बेटी दोनों का।
        लेकिन विमली की मार्इ ने शाम को हुक्का गुड़गुड़ाते हुए थिर मन से समझाया था, ''जलती हैं तो जलें सब। सारा गाँव जले। वह सबके जले पर नमक छिड़कवाने का इंतजाम कर देगी। इस बार हफ्ता बँटने पर वह एक बोरा नमक लाएगी खरीदकर। जिसको अपने जले पर नमक छिड़कवाना हो, आकर छिड़कवा जाए...मेरी बिटिया जनम भर दूसरे की कुटौनी-पिसौनी, गोबर-सानी करे, फटा-उतारा पहिरे, तब इनकी छाती ठंडी रहेगी...एक टूका रोटी के लिए दूसरे का लरिका सौंचाए...भट्‌ठे पर कौन बिगवा (भेड़िया) बैठा है। सबेरे से साँझ तक काम करो। फिर अपने घर। एहमा कौन बेइज्जती? इस गाँव के लोग किसी के चूल्हे की आग बरदास नहीं कर सकते। जैसे इनकी छाती पर जलती है। इन्हीं लोगन के चलते हमार सोना जैसन बेटवा हाथ से निकरि गवा। तू लूल तो भवै हो, अन्हरौ होर्इ गए हौ का? कुछ सोचौ-समझौ!''
          विमली का बाप तो-एक-दो दिन में चुप हो गया लेकिन पंद्रह-बीस दिन बाद विमली का ससुर दौड़ा आया। साल भर पहले ही तो विमली का 'विवाह' हुआ था। उसके ससुर को पतोहू के भट्‌ठे पर काम करने पर सख्त एतराज था। अभी तो खैर लड़की छोटी है  लेकिन चार साल में सयानी हो जाएगी तब...विमली की माँ ने किसी तरह समधी को भी समझा-बुझाकर वापस किया था।
        और अब आकर देखे कोर्इ। आधे गाँव की बिटिया-पतोहू भट्‌ठे पर मजूरी कर रही हैं। शुरूआत किया था विमली ने।
         बाप के गुस्से से बचपन से परिचित है विमली। उसका गुस्सा ठंडा होता है 'मछरी' या कलिया से। विमली जानती है, और तीसरे-चौथे उसका इंतजाम कर देती है
        झोंपड़ी में था क्या पहले। टूटी चापपार्इ तक नहीं थी। बासन के नाम पर फूटा तवा! टूटी कड़ाही! एक कठौता! दो कठौती!  दस जगह से पिचकी अलमुनिया की भदेली। विमली ने धीरे-धीरे पूरी गृहस्थी जोड़ी है। उसके बाप-भार्इ पाँच साल में भी झोंपड़ी पर नर्इ छाजन नहीं डाल पाए थे। वह हर तीसरे साल छाजन बदलवाती है। विमली की ही कमार्इ से उसका बाप फिर से हाथ वाला हुआ है।
        बाप की रजार्इ अलग। मार्इ की अलग। कहीं आने-जाने के लिए कमरी! बजार में हुर्इ  नीलामी से बाप के लिए मलेटरी वाली जर्सी लार्इ खरीदकर। मार्इ की तम्बाकू और खैनी कभी घटने नहीं पाती। बाप की धोती! कुरता! अँगोछा!
         छ: सात साल क्या होते हैं? लेकिन इतने ही समय में एक-एक करके तीन-चार थान गहने बनवा लिये हैं विमली ने। उसका बाप चुपचाप अंटी में रूपया लेकर शहर जाता है और कभी पायल, कभी ऐरन, कभी कमर-करधनी! सचमुच लक्ष्मी है उसकी बेटी।
        आज फिर विमली को नहाने में देर हो रही है। राबिस से फटे पैर। आधा घंटा तो एड़ियाँ रगड़ने में लग जाता है। लाख तेल मले। दवा लगाए।
         आज फिर डरेवर बाबू आने  वाले हैं।
         आज फिर लाल साड़ी पहनकर जाएगी विमली।
         डरेवर बाबू को लाल साड़ी बहुत पसंद है।  
        लाल साड़ी पहनते हुए विमली मुस्कराती है। उसके हाथ का बना मुर्गा तो अब सारी दुनिया खाना चाहती है। लेकिन वह इतनी फालतू तो नहीं।
       शुरू-शुरू में डरेवरजी के लिए भट्‌ठे पर खाना बनाने का जिम्मा उस पर पड़ा तो बड़ी खुश हुर्इ थी वह। लेकिन उसका 'कारन' दूसरा था। तब वह बहुत छोटी थी। खाना बनाने, खिलाने, बर्तन माँजने, चौका लगाने आदि में वह आराम से चार घंटे गुजार देती थी। खान साहब खाना बनाने की मजूरी पाँच रूपए अलग से देते थे। पाँच रूपए तब दिन भर की दिहाड़ी के बराबर होते थे। लेकिन खुशी का असली कारण था चार घंटे के लिए र्इंट ढोने से फुरसत! एक खेप में बारह र्इंट की लदनी। दोपहर भर में ही गरदन अकड़ जाती थी।
        खान साहब होशियार आदमी हैं। उनके भट्‌ठे से कोर्इ नाराज होकर नहीं जा सकता। कहाँ 'खान' का भट्‌ठा और कहाँ डरेवर बाबू का उतना मोटा जनेऊ! उससे तो उसकी निमरी बकरी बाँधी जा सकती है। तो हर ऐरी-गैरी जगह तो वे खा नहीं सकते। बड़ी सफार्इ चाहते हैं।
        और जितनी देर में मीट मुर्गा तैयार होता है, खान-साहब कोयले का दाम जुटाने के जुगाड़ में लग जाते हैं। बिना कोल-ऐजेंट का पिछला बकाया दिए, बिना ब्याज के, आधा-पूरा दाम देकर कोयला लेना कम जीवट का काम तो है नहीं!
         वह भट्‌ठे पर पहुँची तो अभी डरेवरजी का टरक नहीं आया था। कुइसा मिस्तरी दूर से ही देखता है और काम छोड़कर खड़ा हो जाता है। कमर सीधी कर ले थोड़ा। विमली के पहुँचतें ही टोकता है, ''आज तू फिर माँग टीका लगाकर आर्इ! लाख बार कहा कि इसका 'चोन्हा' हमें 'बरदास' नहीं होता।''
         ''बरदास नहीं होता तो आँख फोड़ लो,'' वह आँख उलटकर मुस्कराती है।
          बिल्लर कहता है, विमली खान साहब के भट्‌ठे की 'हेड-लाइट' है।
          हाथ-पैर धोकर वह भंडारे में घुसती है।
       लहसुन, धनिया, अदरक, प्याज, मिर्च, हल्दी! भले खुद कलिया मुर्गा नहीं खाती लेकिन कौन-सा मसाला कितना डालना है, कैसे पकाना है इसे कोर्इ विमली सें सीखे।
         मसाला तैयार करते-करते मुंशी जी मुर्गा कटवाकर दे जाते हैं।
        डरेवर बाबू की याद से ही सारे शरीर में गुदगुदी लगती है। पहले वह डरेवर बाबू से ज्यादा बात नहीं करती थी। खाना बनाकर बाहर निकल जाती थी और पांडे खलासी परोसकर खिलाता था। एक साल पहले उस बार आए डरेवरजी तो दाहिनी कलार्इ में कसकर रूमाल बाँधे थे- तेल में भीगा हुआ। पांडे खलासी चलाकर लाया था टरक। हाथ में मोच था या कहीं दब गया था। अंदर अंदर खून जम गया था।
         ''थोड़ी-सी पिसी हल्दी तेल में गरम कर देना विमला। मालिस करना पडे़गा,'' डरेवर बाबू ने कराहते हुए कहा था।
          हल्दी-तेल की कटोरी पकड़ते हुए पता नहीं क्या था डरेवर बाबू की आँखों में कि वह बोल पड़ी थी, ''लाइए, मैं कर दूँ मालिस।''
          डरेवर बाबू बच्चों की तरह चुपचाप मालिस कराने लगे थे।
         ''पंजे को जरा जोर से दबाइए जमीन पर। हाँ, ऐसे।''
         ''अरे एतना सी-सी काहे करते हैं? बहुत 'दरद' होता है?''
         वह फिक्‌ से हँसी तो डरेवर बाबू का सारा 'दरद' दूर हो गया था।
        पुराने रूमाल की पट्‌टी बाँधते-बाँधते कहीं कुछ अपने मन के कोने में भी बाँध लिया था विमली ने उस दिन।
          इंजन की आवाज कानों में पड़ती है तो उसका दिल धक-धक करने लगता है ।
         छी-र्इ-र्इ-छक्क!
       इंजन बंद होने से पहले जोर से छींकता है ट्रक! सब लड़कियाँ कहती हैं- छिंकनहवा टरक! बहुत पहले शुरू-शुरू में बगल से र्इंट लेकर गुजरते हुऐ ऐसे ही छींका था तो चौंकने से दो र्इंटे उसके पंजे पर गिर पड़ी थी। बड़ी देर तक रोती रही थी वह ।
         ऐसे क्यो छींकते हैं सारे टरक? एक दिन वह डरेवरजी से पूछेगी।
          दाहिना फाटक खोलकर  उतरते हैं डरेवरजी!   
         फूल छाप लुँगी? लम्बी नोक वाला जूता। बड़ी-बड़ी काली मूँछें! नीली बनियान! काला शरीर! भरा हुआ! गले में पतली-सी सोने की सिकड़ी।
         भंडारे में झाँककर हँसते हैं, ''राम-राम भार्इ।''
        ''राम-राम!'' वह धीरे से जवाब देती है। हँसती है। कितनी हँसी छूटती है! बेबात की हँसी। आगे के दोनों दाँतों में सोना मँढ़वाया है डरेवरजी ने। हँसते हुए कितना अच्छा लगता है।
         डरेवरजी कुछ कागज-पत्तर लेकर खान साहब के पास चले जाते हैं।
        टरक को दुल्हन की तरह सजाकर रखते हैं डरेवरजी। एक बार बहुत पहले उसने झाँककर देखा था अंदर। गोरी-गोरी खूबसूरत मेमों की छापी चारों तरफ! बीच में बैठते हैं डरेवरजी।
         पांडे खलासी अंदर झाँककर सूँघता है, ''मुर्गा तैयार!'' फिर हँसता है।
         ''कहौ पांडे़ भाय?''
        भाय कहने से बहुत खुश होता है पांडे़। भाय माने भार्इ नहीं। दोस्त? यार? गुइयाँ? नहीं। इसके अलावा कुछ। इससे थोड़ा बारीक।
        पांडे़ भाय मुँह फैलाकर हँसता है। सुर्ती से काले दाँत! डरेवर बाबू के आगे के जिन दोनों दाँतों में सोना मँढ़ा है, पांडे़ के वही दोनों दाँत टूटे हुए हैं- झरोखा।
        पहले वह कहती थी पांडे़ चाचा! 'चाचा' सुनकर पांडे़ का मुँह लटक जाता था।
        उल्टी रीति है इस टरक की भी। बाकी टरकों के खलासी लौंडे होते हैं, डरेवर बूढे़! और इस टरक के...
        नहाकर रसोर्इ में घुसते हैं डरेवर बाबू-उघारे बदन! विमली चूल्हे से सटाकर पीढ़ा और पानी रखती है।
        खाना और तापना साथ-साथ।
        छाती के बाल कितने लम्बे, घने और काले हैं डरेबर बाबू के। शरीर से पके कैथ की महक आ रही है। वह जोर से साँस खींचकर पके कैथ की महक सूँघती है।
       खाने की थाली आगे सरकाती हुर्इ वह पूछती है, ''चमरौधा जूता टरक के आगे काहे लटकाए हैं? अंदर रखने की जगह नहीं है?''
         हँसते हैं डरेवरजी, ''र्इ जूता नहीं, पनही है। ट्रक में नजर लगाने वालों के लिए। चौराहे के मामा के लिए।''
         मामा की बात तो उसे नहीं पता लेकिन नजर-टोना!
        ''तब तो घरवाली को नजर से बचाने के लिए घर के सामने भी पनही टाँगते होंगे?''   
        ''पहले घरवाली का जुगाड़ लगाओ तब न जूता-पनही टाँगेंगे।''
       ऐ! भिटहुर जैसे हो गए और घरवाली का जुगाड़ नहीं। उसे जाने कैसा लगा। तकलीफ हुर्इ? अच्छा लगा? कुछ ठीक पता नहीं। लेकिन डरेवर बाबू को उसने ज्यादा ध्यान से देखा और एक साथ दो-तीन रोटियाँ निकालकर थाली में डाल दी।
          कहते हैं, पहले घरवाली का जुगाड़ लगाओ। जैसे मुझे ही लगाना है जुगाड़
          ''मुर्गा बहुत मारू बनाती हो विम्मल! खाती नहीं हो तो इतना अच्छा बना कैसे लेती हो?''
          विमली कोर्इ जवाब नहीं देती। चबुरी बाँधकर चुपचाप सुरूआ उँडेलने लगती है कटोरी में।
         ''खाली मसाले का कमाल नहीं हो सकता यह! जरूर तुम अपने पास का कुछ डालती हो इसमें।''
          विमली जोर से हँसती है। खुलकर।
          ''बात बनाना बहुत आता है आपको।' विमली डरेवरजी की आँखों में झाँकती है।
          यह आदमी तो आँखों से ही हँसता है, धत्त!
         डरेवरजी लुँगी के अंदर से एक पैकेट निकालकर विमली की तरफ बढ़ाते हैं। वह हाथ नहीं बढ़ाती तो उसके बगल में रख देते हैं।
         ''र्इ का है?''
         ''घर ले जाकर देखना।''
        ''कुछ लाया मत करिए। मार्इ नाराज होती है।''
        ''मार्इ कैसे देखेगी इसे। अंदर पहनने की चीज,'' डरेवरजी इशारे से बताते हैं तो विमली का मुँह लाल हो जाता है- भक्क!
         ''हर बात मार्इ से बताने की आदत रहेगी तब तो आगे चलकर बड़ी परेशानी होगी।'' डरेवरजी हँसते हैं।
         ''अच्छा, अब चुपचाप खाकर भागिए। अभी पांडे़जी अगोर रहे हैं।''
         ''झरिया-धनबाद घूमने कब चल रही हो? इस बार बिना साथ लिये नहीं जाऊँगा।''
          विमली भौंहों में हँसती है और पांडे़ के खाने की थाली लेकर बाहर निकल जाती है।
         खाने के बाद विमली के आँचल में ही हाथ-मुँह पोंछने का मन करता है डरेवर बाबू का। लेकिन...
         झरिया! धनबाद!
        डरेवरजी हर बार उसे झरिया-धनबाद चलने का न्योता देते हैं। गाँव और बाजार छोड़कर कभी बाहर नहीं गर्इ है विमली! बनारस! झरिया! धनबाद! सबके बारे में सिर्फ सुनती है। लेकिन कल्पना की आँखों से जो झरिया दिखार्इ पड़ता है वह कम सुंदर नहीं! झर ! झर! झरता हुआ झरिया। बनारस! कितना रसदार! गन्ने जैसा और धनबाद में उतना धन न होता तो कैसे अपनी टरक दुल्हन की तरह सजाते डरेवरजी?
       विमली को लगता है कि थक जाने पर 'टरक' का हाथ-गोड़ भी मींजते होंगे डरेवरजी और पांडे खलासी मिलकर। धत्त!
         जाने से पहले एक लोटा पानी माँगकर पीते हैं डरेवरजी। प्यास उनकी आँखों में बसी है।
       धूल उड़ाते जाते ट्रक को बड़ी देर तक खड़ी देखती रहती है विमली। ट्रक के आगे दोनों ओर काली लम्बी चोटी-सी लटकती रहती है। जैसे हाथ हिलाकर बुलाती हो, चलो विमला झरिया-धनबाद!
        'चीज' लाकर परेशानी में डाल गए डरेवर बाबू। अगली बार पूछकर दाम दे देगी जरूर।
       जूठे बर्तन धोते हुए उसकी आँखों में एक बार फिर डरेवरजी की प्यासी आँखे कौंध जाती हैं। सूखे होंठ चाटते हुए डरेवरजी।
        ...टोपी वलवा पियासा चला जाय,
         हमारे लगे दुइ गगरी...
         प्यासा ही चला जा रहा है टोपी वाला छैला!
          जबकि मेरे पास दो-दो घडे़ हैं-व्यर्थ!

        मकर  संक्रांति।
        अघोरी बाबा के मठ का मेला। कर्इ कोस दूर से लोग आज के दिन 'खिचड़ी' चढ़ाने आते हैं मठ पर।
       झोंकार्इ के अलावा आज भट्‌ठे का सारा काम बंद है। सारे मजदूर, स्त्रियाँ,  बच्चे ट्रैक्टर-ट्राली पर लदकर जा रहे हैं मेला देखने।
        बिसुर्इ के बिलकुल कंठ पर है बाबा का मठ।
        मकर-असनान! खिचड़ी-दान और मेले की मौज।
       पीपल के पेड़ के नीचे, काली मंदिर के सामने बकरा कटेगा। काली का परसाद। भट्‌ठे के मजदूरों ने ही बनाया है यह काली मंदिर। र्इंट लादकर जाने वाला हर गाड़ीवान या ट्रैक्टर वाला हर खेप में दो र्इंटें गिराता है मंदिर के नाम पर। दो-दो र्इंट के दान से बना मंदिर। मेहनत भट्‌ठा-मजदूरों की और सीमेंट सरिया खान साहब का। बालू का दान दिया है बिसुर्इ नदी ने। काली की मूर्ति देखा? कितना विकराल रूप। खान साहब ने ही मँगाया है। 'खान' साहब के पड़दादा जब 'सिंह साहब से 'खान' साहब हुए तो उनकी कुलदेवी यह काली उनके गर्भ-गृह में भूमिगत हो गर्इ थीं। उन्हीं की पुनर्स्थापना।
      बहुत जाग्रत देवी हैं। बड़ा 'जस' है। कुइसा मिस्तरी भी इस साल होली पर बकरा चढ़ाएँगे-कहीं से एक घरवाली का जुगाड़।
       खाना तैयार करने और बलि के कर्मकांड के लिए पाँच-छ: औरत-मर्द रूके हैं मंदिर पर! बकी सभी मेला!
       मजदूरनों की मेट है विमली। वह ट्राली के बीच में गोल बनाकर बैठी है।
     गोरे, साँवले, काले, आबनूसी चेहरे। जूडे़ में फूल और लाल रिबर! बेवजह हँसती हैं सब। सफेद दाँतों की पंक्तियाँ।
        ट्रैक्टर पर बैठा कोर्इ बोलता है, ''ऐ! गाना शुरू करो।''
        कितने गीत, भजन, कीर्तन, सोहर, नटका, दादरा, खेमटा याद है विमली को, कोर्इ हिसाब नहीं।
       विमली के गीत का तुरंत असर होता है। राँची वाली दो-तीन लड़कियाँ उठकर नाचने लगती हैं। चलती हुर्इ ट्रैक्टर ट्राली में घेरा बनाकर नाचती लड़कियाँ! क्या बात है!
       लेबरों ने ढोल-कनस्तर सँभाल लिया है। गाने की आवाज ढोल-कनस्तर और ट्रैक्टर के शोर में डूब जाती है। सिर्फ कोलाहल! हँसी!
        कुइसा भी ट्राली में ही बैठना चाहते थे। लेकिन बिल्लर ने उन्हें ट्रैक्टर के मडगार्ड पर बैठा दिया- उनके पद के अनुसार। वे बार-बार मुड़कर ट्राली की ओर दखते हैं। तभी कोर्इ कूट करता है- ''काका! झुलनी लिये हो?''
        झुलनी!  पता नहीं इस शब्द से कितनी चिढ़ है कुइसा को। और कैसे हैं लोग कि हँसने-बोलने के मौके पर भी डंक मारने से नहीं चूकते।
        दरअसल खान साहब के भट्‌ठे पर आए थे कुइसा तो कुछ आस लेकर आए थे। खान साहब के मुंशी ने झाँसा दिया था कि आपकी जाति-बिरादरी बहुत है हमारी तरफ। लड़कियों की कौन कमी। एक छोड़ दस घरवालियाँ रखो।
       इसी विश्वास पर पहले साल कुइसा 'लगन' भर गाँव-गाँव घूमे। दिन भर भट्‌ठे पर बोझार्इ और रात किसी गाँव में। बहुत गाँजा बीड़ी तम्बाकू बर्बाद कराया लोगों ने। सबसे बताते-पतोहू के लिए झुलनी तो मेरी माँ ही गढ़ा गर्इ थी मरने के पहले।
       जेब में ही रखते थे झुलनी। प्लास्टिक की डिबिया में, लाल मखमल में लपेटकर। निकालकर दिखाते। इसके अलावा पाँच विगहा जमीन है। पाँच सौ की पगार। घरवाली हो जाए तो भैंस लाते कितनी देर लगेगी?
       आखिर मिली एक घरवाली। उसका जीजा साली के लिए दूसरा वर खोज रहा था। बहुत छुपाकर सारा मामला तय हुआ क्योंकि 'साली' के 'बियहा' को पता लगने से सारा मामला खराब हो सकता था।
         कर्इ थान गहना, साड़ी, चादर, चप्पल। सिंगार-पटार का सामान...सब लेकर गए कुइसा। तय था कि लड़की का जीजा बाजार में लेकर आएगा लड़की को और वहीं से पहना-ओढ़ाकर विदा कर दिया जाएगा।
       विदा कराते-कराते शाम हो गर्इ। अघोरी बाबा की मठिया पर नदी पार करते-करते अँधेरा हो गया। कितना धीरे-धीरे चलती है दुल्हन! ज्यों-ज्यों अँधेरा घिरता जा रहा है, पीछे की ओर पिछड़ती जा रही है।
        इस पार आकर इंतजार करने लगे कुइसा...कहाँ गर्इ दुल्हन! थोड़ी देर बाद वापस नदी के पेटे में खोजने के लिए लौटे। कहीं कोर्इ नहीं। किनारे, पानी की धार के पास रेत पर एक पोटली-सी पड़ी थी। उठाकर देखा- नाच में जनाना का 'पाठ' करने वाले नचनिया लड़के सीने पर ब्लाउज के नीचे दो छोटी-छोटी गेंद सी बाँध लेते हैं- वही। इस धोखे से सारी जमा-थमा निकल गयी थी कुइसा की।
         तब से झुलनी कहने पर आग लग जाती है उनके बदन में।
         एक पेड़ के नीचे ट्रैक्टर खड़ा कर देता है बिल्लर!
        चारों तरफ भीड़-ही-भीड़। रंग-बिरंगे लोग। रंग-बिरंगे कपडे़। कपड़े जो सालो-साल मेले के इंतजार में गगरी या गठरी में कैद रहते हैं।
        दूर-दूर के बिछडे़ लोग बिछडे़ दिल मिलेंगे मेले में। जो उस तरह खुल्लम-खुल्ला नहीं मिल सकते। कितने मिलने वाले रात आठ बजे की रेलगाड़ी पकड़कर भाग जाएँगे दिल्ली-लुधियाना।
        जितने लोग उतने सपने। उतनी चीजें...क्या लें, क्या छोडे़ं?
        विमली ने ठुड्‌डी पर 'तिल' गोदाया है और कलार्इ पर- सीताराम!
        सीताराम? भगतिन हो गर्इ?
       किसी को क्या पता कि सिताराम उसके आदमी का नाम है। कितने जतन से पता लगाया है। उसने अपने आदमी का नाम?
       अनजाने अनदेखे आदमी का नाम? सीताराम!
      वापस भट्‌ठे पर पहुँचते-पहुँचते एक घंटा रात बीत जाती है। फिर काली मंदिर की पूजा! नाच-गाना! आधी रात तक। खान साहब ने बिल्लर को सौंपा-जिन औरतों-लड़कियों के साथ उनके घर का कोर्इ आदमी नहीं है उन्हें घर तक छोड़ना उसके जिम्मे।
      आखिर में पड़ती है विमली की झोंपड़ी। थोड़ी हटकर। अकेली रह जाने पर बोलती है, ''अब तू जा रे। मैं चली जाऊँगी अकेले।''
       ''चल-चल। अभी कुछ हो-हवा जाए तो?''
      ''हो-हवा क्या! कोर्इ बिगवा बैठा है रास्ते में?''
       ''तेरे लिए बिगवों की कमी है? तू जहाँ रहेगी वहीं बिगवा पैदा हो जाएँगे।''
       ''बिगवा आएगा तो टाँग पकड़कर चीर न डालूँगी।''
      ''तेरा बाप बैठा अगोरता होगा। कनकनाता होगा। उसका वश चले  तो झोंपड़ी के सामने से सबका आना-जाना बंद कर दे। साइकिल की घंटी बजाने से चिढ़ता है।''
      सहसा सरपताही से कोर्इ जानवर निकलकर भागा। आगे-आगे चलती विमली चौंककर ठिठकी तो बिल्लर उसकी पीठ से सट गया आकर।
       पूस माघ का जाड़ा। बादल छाए हुए हैं। बदली के चाँद की उजास।
       ''ए बिलरू। बड़ी बदमाशी सूझती है- हट!''
       ''अरे-अरे। मनर्इ जैसा चल।''
       ''बदमाशी' पर उतर आया है बिल्लरवा। पहले से शंका थी विमली को
       ''डरेवर बाबू की देह महकती है और मेरी गंधाती है?''
       ''रमकल्ली के भतार! न तू हमार बियहा हो न डरेवर बाबू। खबरदार।''
       अरे एकदम 'सनक' गया है?
       विमली के दाँत कलार्इ में धँस गए हैं बिल्लरवा की। बाप रे! बिल्लर की चीख निकल जाती है।
      अकिल गुम हो गर्इ है बिल्लर की- एक पल में हँसती खिलखिलाती अगले ही पल एकदम 'कटही'! सोचती क्या है! चाहती क्या है! और बोलती क्या है!
       आँखें कुछ और बोलती हैं! जीभ कुछ और!
       'मूढ़' जैसा आगे-आगे चलने लगा है बिल्लर! विमली पीछे-पीछे। मुड़ते ही सावधान हो सकती है!
        उदास हो गया बिल्लर! एकदम चुप!
      कुछ देर बाद बेवजह हँसती है विमली! खनखनाती हुर्इ हँसी, ''नाराज न हो बिल्लर! बदमाशी नहीं करनी चाहिए रे।''
       जादूगरनी! बिल्लर सोचता है- कोर्इ जादू सिद्ध है इसको!
      विमली का बाप उसके इंतजार में झोंपड़ी के बाहर चिलम पर चिलम फूँकता आग तापता बैठा बुढ़िया को गालियाँ दे रहा है। इतना रात में उसे बिल्लर के साथ आया देख भड़क उठता है- 'अब जाकर तेरा लौटने का 'टेम' हुआ है? खबरदार जो कल से घर से बाहर कदम रखा। हाथ-गोड़ तोड़ दूंगा। इतनी-इतनी रात तक मेला देखेगी तू?''
      बिल्लर 'तप्ता' पर हाथ सेंकत हुए बोलता है, ''गोदना गोदवाने गर्इ थी बुढ़ऊ! एक पहर रात बीतते ही 'परान' निकल रहे हैं। बिदा कर दोगें तो कैसे चैन पडे़गा?''
        वह बोली बोल सकता है। इस गाँव का साला जो है।
     विमली का मन होता है- झाडू लेकर मुँह पीट डाले इस बिल्लरवा का। लेकिन बाप के गुस्से को देखकर चुपचाप झोंपड़ी में घुस जाती है।
       माँ की रजार्इ में घुसकर बताती है, ''रतौंधी की गोली लार्इ हूँ  मार्इ, तेरे लिए मेले से। अँधेरा होने के एक घंटा पहले एक गोली रोज....''
        अभी तक माँ से ही चिपककर सोती है विमली रात में! अकेल उसे नींद नहीं आती।
      माँ बड़ी देर तक बेटी को तमाम ऊँच-नीच, इज्जत- आबरू की बात समझाती है। इतनी-इतनी रात तक घूमना! उसके बाप का बिगड़ना अकारण थोडे़ है।
      ''सुनते हैं कोर्इ डरेवरजी आते हैं। कोर्इ सर-सामान रूपया-पैसा नहीं छूना! खबरदार! परदेशी की प्रीत! नहीं लगाना।''
      विमली को बच्चा क्यों समझती है उसकी माँ! दुनिया भर की भूखी नजरों की भाखा पढ़-पढ़ कर वह कब की पंडित हो गर्इ है- बुढ़िया को कौन बताए।
      जिस बात की लोग चर्चा करें, शंका करें, बस उसी से बचना चाहिए, यह समझ तो अपने आप आ जाती है। कब आ जाती है, खुद विमली को भी नहीं पता। माँ क्यों इतना डरती है?
        जो बात जितनी अच्छी लगे उसमें उतना ही खतरा! बस इतनी-सी बात!
        बुढ़िया चुप होती है, जब विमली का हुँकारी भरना बंद हो जाता है।
       रतौंधी होने से क्या हुआ। बुढ़िया विमली को मन की आँखों से देखती है। मन की आँखे बहुत तेज हैं बुढ़िया की। वह विमली के एक-एक अंग के बाढ़ का हिसाब रखती है। पराया धन। जब तक जिसकी अमानत उसको न सौंप दिया जाए...
       सो गर्इ लड़की! खटिया पर गिरते ही मरती है। अब बुढ़िया विमली के एक-एक अंग को टटोल-टटोलकर पढ़ रही है- सीना ! पेट! कूल्हे! आखिर दुनिया भर के लौंडे-लपाड़ों के बीच दिन काटती है उसकी बेटी!...
       विमली साँस खींचे माँ के हाथ के स्पर्श अनुभव करती है-चुपचाप! गुदगुदी रोके नहीं रूक रही है।


       दूसरे  दिन ही खबर फैलती है- बिल्लर ने विमली को जलेबी खिलार्इ है मेले में।
       और जलेबी का दाम!
        बिल्लरवा रात में अकेले गया था विमली को पहुँचाने।
        सुना है बिल्लर ने भी विमली से कलार्इ पर पट्‌टी बँधवा ली रात में। जैसे पार साल डरेवर बाबू ने बँधवार्इ थी।
       विमली को आता देख नदी के दह में कँटिया लगाए बैठा दस-बारह साल का कलुआ गाने लगता है.. अब ना खाबै ठोंगा की जलेबी मोरी मार्इ रे।
        तब भी वह नहीं समझती।
        भट्‌ठे पर सभी कूट हँसी हँसते हैं। दोपहर में कुइसा निरगुन गाता है ''नैहर में दाग पड़ा हो मोरी चुनरी...नैहर मा...''
       पता नहीं क्या आग लगार्इ है बिल्लरवा ने? या किसी और ने। जाने कैसे मेले की खबर उसकी ससुराल तक पहुँच गर्इ। उसका ससुर दौड़ा आया है...सुनते हैं उसकी पतोहू ट्रैक्टर पर बैठकर मेला देखने जाती है...जलेबी!...आधी रात तक बाहर! कोर्इ 'धर्मशाला' है उसकी पतोहू? कि पंचायती हंडा? जो चाहे 'खिचड़ी' पका ले। बिना गौने का 'दिन धराए' वापस नहीं जाएगा वह?
      'देखिए समधी भार्इ? बात को समझिए! न-नुकुर करने में इज्जत नहीं है। चावल 'सिरजा' जाता है, 'भात' नहीं। चावल भात बना नहीं कि दूसरे दिन ही सड़ने लगता है। लड़की 'सयानी' हुर्इ तो भात हो गर्इ। उसे तो ससुराल भेजने में ही इज्जत है।''
        सीझा-सुलझा आदमी मालूम होता है विमली का ससुर! पाँच-पंच के बीच में बोलना आता है।। चावल! भात! कायल होने के अलावा रास्ता क्या है?
         लेकिन पहले 'टेवा' में ही हामी नहीं भर सकती किसी लड़की की माँ। लोग कहेंगे लड़की माँ-बाप पर भारी पड़ रही थी। किवाड़ की आड़ से बात कर रही है विमली की माँ, ''एक बार तो समधी को लौटना ही पडे़गा।''
         समधिन की बात है तब तो मानना ही पडे़गा। ठीक है, जल्दी ही वह दुबारा टेवा लेकर आएगा।
   
         माघ  बीतते-बीतते सूरज का रोब-दाब बढ़ने लगता है।
         दोपहर तक र्इंट ढोने के बाद सारी औरतें-लड़कियाँ नदी के दह में 'बोह' ले रही हैं।
        गौने की चर्चा चल जाने के बाद विमली को रोज एक-दो बार ससुराल का सपना आता है। बात करते-करते अचानक कहीं खो जाती है। जगाने पर जागती है, बात-बात पर हँसने खिलखिलाने की आदत कहाँ गर्इ?
       अपने आदमी को देखने की कौन कहे, उसके बारे में कुछ सुना भी नहीं है विमली ने। ज्यादा नहीं, कुल तीन कोस दूर है उसकी ससुराल। अघोरी बाबा के मठ से तो दो ही कोस। लेकिन कभी मेला देखने के बहाने या बाजार-हाट भी नहीं आया इस तरफ! सुनती है- कलकत्ता गया है, कमाने-धमाने! उसका हाथ अनायास कलार्इ सहलाने लगता है- सीताराम! लेकिन जब भी कल्पना में सीताराम की कोर्इ छवि देखना चाहती है विमली, डरेवर बाबू के सोने मढे़ दाँतों से फूटती हँसी छा जाती है सामने! पके कैथ की गंध!
        धत्त।
       सहसा वह जागती है- डरेवरजी इंतजार में बैठे होंगे। खाना बनाकर नहाने आर्इ तो नहाती ही रह गर्इ।
       वह पानी से निकलकर जल्दी-जल्दी कपडे़ बदलती है।
       पीढ़े पर बैठते हुए मुस्कराते हैं डरेवरजी, ''हम तो समझे, नदी से सीधे अपने घर चली गर्इं तुम?''
       डरेवरजी उसे ध्यान से देखते हैं- चेहरे का तेज दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है, शरीर गदराता जा रहा है। कितनी चमकती है देह!
       डरेवरजी फिर एक बंडल बढ़ाते हैं विमला की तरफ- साड़ी, बिलाउज, पेटीकोट!
        ''र्इ का है?''
       ''पहना जाता है।''
       ''सो तो ठीक है लेकिन र्इ सब काहे लाते हैं आप? कौन पद से?''
       ''अब पद-वद तो तुम्हीं समझौ।''
      ''हम समझते हैं तबै न कहते हैं डरेवरजी, हमारा-आपका नाता साहेब-सलामत का है। हँसी-ठिठोली का! चीज-बतुस के लेन-देन मा तो कमरी भीज जाएगी। बहुत गुरू, बहुत गाढ़ पकड़ लेगी। हल्का बोझ ही अच्छा होता है डरेवर बाबू, जेतना आसानी से उठ जाए। इसको रखिए अपनी घरवाली के लिए।''
       ''तुम तो कभी-कभी पुरखिन बन जाती हो-'' डरेवरजी बात को रसेदार बनाए रखना चाहते हैं।
        रसेदार बात और रसेदार मुर्गा, दोनों बहुत पसंद हैं। डरेवरजी को।
       ''र्इ हमार 'चीन्ह' है विमला! 'चीन्ह' को लौटाने का 'मतलब' समझती हो?''
       बड़ी-बड़ी आँखों से सीधे- आँखों में ताक रही है विमली। उसको एकदम बुद्धू समझते हैं क्या? 'मतलब' की बात समझाते हैं? खूब समझती है वह 'मतलब' की बात! 'मतलबी' कहीं के! वह बात बदलना चाहती है, ''आज खान साहेब से काहे झक-झक कर रहे थे कोयला उतरवाते समय?''
        ''खान साहेब हेला के सार हैं। रूपए में तीन अठन्नी भँजना चाहते हैं। कोर्इ कितने दिन घाटा-उधारी सहेगा?''
        ''इतना खाने-पीने का इंतजाम करते हैं-मुर्गा-मछली!''
       ''मुर्गा-मछली से भट्‌ठा चलता है कि कोयले से। सच तो यह है कि मैं तुम्हारा मुँह देखने की लालच में चला आता हूँ इतनी दूर, पंद्रह-सोलह हजार का कोयला लादकर। वरना इधर मुँह करके तो मैं...! बस तुम्हारे कारन! तुम्हारे कारन यह आदमी मुझे चूना लगाता जा रहा है।''
       ''हमारे कारन काहे?'' विमली की जबान ऐंठ जाती है- ''हमारा-आपका कौन नाता? जेतना दिन यहाँ आ रहे हैं, भेंट-मुलाकात बदी है, हो रही है! नही तो आप अपने रास्ते चले जाएँगे हम अपने।''
        कितनी 'बेदरदी' बात कह दी विमली ने। डरेवरजी विसूरते रह गए बड़ी देर तक।
        ''ऐतना' गोस्सा' काहे करती हो विमली। एक दिन तुम्हारे बप्पा के पास चलना है।''
        ''ऊ काहे?''
       ''कुछ माँगना है।''
        ''क्या?''
        ''तुम्हें!''
        जोर से हँसी विमली! सुनकर सारा घाटा, सारी उधारी विसर गर्इ डरेवर बाबू की।
        बहुत-बहुत लड़कियाँ देखी हैं डरेवर बाबू ने। बिहार और यू. पी. में। लेकिन लड़की! जितनी नजदीक उतनी ही दूर! दूर-नजदीक साथ-साथ। धत्तेरे की।
         डरेवजी कुछ सोचते हुए लोटा लेकर बाहर निकलते हैं।
        कितने भरम में पड़ जाती है आदमी की जाति! दो बात हँस-बोल लेने से। कलकत्ते वाले उसके आदमी को क्या पता कि कितने 'जतन' से सँभालकर रखा है विमली ने उसकी अमानत! पके आम के पेड़ की रखवाली जैसा कठिन काम! कितनी  निगाहें हैं, पके आम के पेड़ पर!

          बिल्लर  की बहन रमकल्ली  आज दोपहर से ही घुसी है विमली की झोंपड़ी में। एक 'बात' लेकर आर्इ है वह। बिल्लर और विमली दोनों के फायदे की। विमली के महतारी बाप के तो और भी फायदे की।
         सुनते हैं विमली का आदमी तीन साल से घर नहीं आया कलकत्ते से। रूपया-पैसा भी नहीं भेजता बाप के पास। दिहाड़ी मजदूरी करता है। गुन का न सहूर का। अगर विमली की मार्इ विमली को बिल्लर के साथ विदाकर दें...उन लोगों की जाति में यह कोर्इ अनोखी बात नहीं है। महतारी-बाप के मर जाने से बचपन में शादी नहीं हो सकी वरना सौ लड़कों में एक लड़का है बिल्लर। डरेवरी करता है। चार पैसा कमाता है। राम-जानकी जैसी जोड़ी रहेगी दोनों की। गाँव में ही झोंपड़ी खड़ी कर दी जाएगी। आँख के सामने रहेंगे दोनों। विमली के माँ-बाप चाहें तो घर-जमार्इ बनकर रहने के लिए भी तैयार हो जाएगा बिल्लर। लड़के की कमी भी नहीं खलेगी। नहीं तो विमली के जाने के बाद कौन है एक रोटी बनाकर देने वाला दोनों को? लड़के वाला चाहेगा तो बिल्लर 'लगत' का हरजाना भी देने को तैयार है।
        सोचने लायक सलाह देकर चली गर्इ रामकली! दोनों बूढे़-बूढ़ी शाम तक सलाह करते रहे। किसी तरह से कोर्इ बुरार्इ तो नजर नहीं आती इसमें। पंचायत में जो 'जुरमाना' 'लगत' के रूप में देना पडे़गा उसे भी दे देगा ।   उन दोनों के दिमाग में पहले क्यों नहीं आर्इ इतनी अच्छी बात?
         ''लेकिन विमली मानेगी तभी न!''
        ''विमली से पूछने की क्या बात है इसमें?'' विमली का बाप बिगड़ता है, ''उसे तो अपने दूल्हे की सूरत भी याद नहीं होगी। बचपन की शादी! बच्चों के खेल जैसी!''
         रात में खा-पीकर सोते समय बात का मुँह पूरी सावधानी से धीरे-धीरे खोलती है बुढ़िया।
         ''लेकिन मेरा वियाह तो तू पहले ही कर चुकी है रे! फिर दूसरा घर करने की काहे सोच रही है?''
         ''वह लड़का तो कर्इ साल से घर नहीं आया बेटी!''
       ''लेकिन जिंदा तो है। चिट्ठी-पत्री लिखने पर, वक्त-जरूरत क्यों नहीं लौटेगा? मेरा 'वियहा' है वह । क्या सोचेगा?''
         ''बिल्लर जाना-सुना, अच्छा लड़का है। अच्छा कमाता-धमाता है।''
       ''तो क्या मेरा आदमी लूला-लँगड़ा-काना है?''
        ''सो तो नहीं। लेकिन सुनते हैं नौकरी-चाकरी ठीक नहीं है। घर भी पैसा-कौड़ी नहीं भेज पाता।''
       ''हो सकता है अपने खाने भर को ही कमाता हो।''
         ''तब तुझे क्या खिलाएगा? क्या सुख देगा?''
        ''यह आज सोच रही है। पहले क्यो  नहीं सोचा? क्या जरूरत थी बचपन में ही किसी के गले से बाँध देने की?''
        ''आज सोचने में क्या हर्ज है?''
       ''आज सोच सकती है अगर उसमें कोर्इ खराबी हो। कम पैसे से ही कोर्इ खराब हो जाता है, छोटा हो जाता है।  वियाह तूने लड़के से किया था कि पैसे से? मेहनत करेगा आदमी तो एक रोटी कहीं भी मिलेगी। आदमी को अपनी मेहनत पर रीझना चाहिए कि दूसरे के पैसे पर रे?''
         विमली उठकर बैठ जाती है खटिया पर, ''कल को कोर्इ दस बीघे वाला लड़का आ जाएगा तो तू कहेगी कि मैं उसी के साथ बैठ जाऊँ।''
         सहसा उसे याद आता है- झोंपड़ी के कोने में नया हुक्का और तम्बाकू से भरी हाँड़ी रखी देखी है उसने। तम्बाकू में सने चोटे की गंध पूरी झोंपड़ी में फैल रही है।
          बिल्लरवा की बहन दे गर्इ है यह सौगात? उसके बदन में आग लग जाती है। वह माँ को पकड़कर झिंझोड़ने लगती है, ''दस रूपए के हुक्के-तम्बाकू पर तूने अपनी बिटिया को राँड़ समझ लिया रे? बोल! कैसे सोच लिया ऐसा? जिसकी औरत उसे पता भी नहीं और तू उसे दूसरे को सौंप देगी? गाय-बकरी समझ लिया है?''
          ''चुप-चुप-चुप! हल्ला मत कर राँड़!''
           इस  बार आया विमली का ससुर तो गौने का दिन तय करके ही वापस गया। दो दिन तक रूका था।
         कुइसा मिस्त्री ने सुना तो अबोला रह गया। अँधियार करके चली जाएगी विमली भट्‌ठे पर। पाँच सौ रूपये तनखाह पाता है वह। पाँच विगहा खेत! विमली का आदमी तो सुनते हैं झल्ली ढोता है कलकत्ते में। क्या सुख देगा जनाना को? दो-तीन बार वह गया विमली के बाप के पास, चिलम पीने के बहाने। कुछ मन मुँह मिले तो बात आगे बढ़ाए। लेकिन कितनी जलती हुर्इ आँखें हैं बूढे़ की। बात करने जाइए तो घायल होकर लौटिए। आँखों से ही दाग देता है।
           काम से मन उखड़ने लगा है कुइसा का। कभी 'लचारी' गाते हैं कभी बारहमासा   :
          लागै मास अगहन
           जाय गौरी कै गवन
           काटैं सैंया संग चयन
           मोरे बालमुआ...
          ''लेकिन गोरी का 'गवन' तो माघ में पड़ा है कुइसा भार्इ।''
          ''माघ-फागुन का जाड़ा तो और भी गुलाबी होता है गनेशी भाय?''


           ठाठ- बाट से गौना लेने आया है विमली का ससुर! बाजा, तमाशा! आतिशबाजी!
            चनुवाडीह की नाच पार्टी। सौ-सौ ग्राम की गाँजे की पुड़िया। बक्सा भरकर दारू की बोतलें।
            फिरी है सबके लिए, घराती हों चाहे बराती!
           दोनों नशे इकट्‌ठे हुए तो बाजे के ताल पर बूढ़ा खुद घंटे भर नाचता रहा।
          ए भार्इ! बूढ़ा काहे कहते हैं? चालीस-बयालीस से ज्यादा की उमर नहीं। पहलौठी का लड़का था सीताराम।    बीस की उमर में पैदा हुआ। घरवाली नहीं गुजरी होती तो अभी तक बेधड़क बाल-बच्चे होते रहते।
         बीस साल तक खुद चूल्हा फूँकता रहा। अब जाकर तवा-कलछुल से फुरसत का समय आया है। नाचेगा नहीं?
          गाँव भर की औरतें झोंपड़ी के अंदर घेरा बनाकर ससुराल से आर्इ एक-एक चीज की पड़ताल कर रही हैं। हाथ की अँगूठी! नाक की नथ! दो थान सोने के? पायल! बिछुए और हबेल! तीन थान चाँदी के। विमली की जाति में इतना जेवर कम ही लोगों को मिलता है। दुलहिन के कपडे़-लत्ते के साथ समधी-समधिन की पियरी धोती अलग से।
           औरतें विमली के 'भाग' को 'सिहा' रही हैं।
           बस एक साध रह गर्इ। दुल्हा नहीं देख पार्इं विमली का। उसे नौकरी से छुट्‌टी नहीं मिली...गाँव की औरतों को नाच भी बहुत पसंद आया।
            बिल्लर कल से ही महेमानों की सेवा में लगा है
           सबेरे विदार्इ के समय खान साहब ने भी साड़ी भिजवाया। डरेवजी ने एक चादर और इक्यावन रूपए नगद दिए। पांडे खलासी ने ग्याहर रूपए।
          ''लेने-देने में विमली का बाप भी समधी से उन्नीस नहीं रहा। घड़ी, साइकिल, रेडियो, पाँच कूँड़ा बतासा, एक बोरा लार्इ, पाँच मन सीधा (राशन), एक बोरा आलू, एक बोरिया नमक, दो किलो तेल, एक किलो घी, रजार्इ, गद्दा, पलंग। गिरते-पड़ते दो ऊँट की लदनी।''
           पहले मार्इ का पैर पकड़कर रोती है विमली! फिर बप्पा का! फिर सखियाँ! पड़ोसिनें! भट्‌ठे की मजदूरिनें!
          निमरी बकरी आज सबेरे से ही पूँछ हिला-हिलाकर चिल्ला रही है। डोली में बैठने से पहले उसे भी पकड़कर भेंटती है विमली। डोली उठती है तो वह चीत्कार कर उठती है।-
          ''आपन देशवा छोड़ाया मोरे बपर्इ...''
          आपन दुअरिया छोड़ाइउ मोरी मार्इ...''
         यह गाँव! यह देश! यह ढकुलाही, ये भीटे! कठ-जामुनों का जंगल! कल तक जिसे अपना समझती थी, आज हमेशा-हमेशा के लिए पराया कर दिया आपने बप्पा! अब कौन सबेरे आपको 'चाह' बनाकर देगा?
मेरा दुआर! मेरा मोहार! मेरा चूल्हा! मेरी चक्की! सबसे नाता टूट रहा है। कौन मेरी बकरी को चारा देगा? रोज सबेरे उठते ही मैं तेरी 'दुआरी' लीपती थी मार्इ! उसे काहे छुड़ा दे रही है बिना कसूर?
           सारे सपने, सारा पुरूषार्थ! छोड़ देने के लिए?
           तिरिया जनम काहे देहु रे विधाता?
          डोली पर पडे़ 'ओहार' की फाँक से झाँककर देखती है विमली। यह छूटी बिसुर्इ! यह बुढ़वा पीपल! कालीजी का मंदिर! खान साहब का भट्‌ठा ! दोनों चिमनियाँ रोज की तरह धुआँ उगल रही हैं।
            डोली देखकर राँची वाली औरतों का दल पल भर को रूक जाता है- विमली की डोली!
           ट्रक खड़ा है। खलासी पांडे उघारे बदन घुटने तक लम्बा अंडरवियर पहने हाथ में बाल्टी लिये ट्रक धोने को तैयार खडे़ डोली को देख रहे हैं। डरेवर बाबू उठे हुए बोनट के आगे खडे़ देख रहे हैं।
           अरे या मोरे चाचा?
           आपन छंहिया छोड़ाया मोरे चाचा।
          खान चाचा अपने ऑफिस से बाहर निकल आए हैं। आँखें भर आर्इ हैं जैसे उनकी अपनी लड़की विदा हो रही हो। जहाँ भी रहे, सुखी रहे।
           विमली उतरकर भट्‌ठे की मिट्टी को माथे से लगाना चाहती है।
        लड़के और लड़की का 'फरक' आज ही मालूम पड़ा है विमली के बाप को। डोली की दिशा में ताकते हुए उसकी आँखों से झर-झर आँसू झर रहे हैं।
           आज अचानक आया बुढ़ापा, बिना बताए।
            दूर तक जाकर, विमली के रोने की आवाज के साथ ही डोली भी अदृश्य हो जाती है।


            जब  से पतोहू का गौना लाया है, विसराम का भाव बढ़ गया है।
          चाल, ढाल, पहनावा-ओढ़ावा, दाढ़ी-मोछ, सब टिच्च! दो कट्‌ठा जमीन रेहन रखकर बादशाही खर्चा शुरू किया है। दिन भर झोंपड़ी के सामने गाँजे की महफिल लगा रहा है। एतना ठाट! काहे भार्इ? देखने वालों को अजगुत-अजगुत लग रहा है। कहीं कोर्इ भेद? अभी तक तो यही चर्चा थी कि लड़के को गौने में क्यों नहीं बुलाकर लाया विसराम। लाख बाप से झगड़कर गया था लेकिन यह तो उसी का गौना था...फिर पतोहू के आने के तीसरे दिन ही बहन को क्यों विदा कर दिया? क्या इस डर से कि पतोहू को बिगाड़ देगी। 'बोलका' बना देगी।
           इस टोले की औरतों की सूँघने की ताकत अभी इतनी कमजोर नहीं हुर्इ है। लत्ता आग पर पड़ता है पीछे और चिरायंध औरतों की नाक में पहले पहुँच जाती है।
            यहाँ तो सीधे आग लगी हुर्इ है।
          सुबह-शाम 'मैदान' आने-जाने के दौरान ही निर्विघ्न चर्चा का मौका मिलता है। इस बीच मनतोरिया की मार्इ ने लाख कोशिश की, घुमा-फिराकर कोर्इ 'सुराग' निकालने की, लेकिन पतोहू कुछ बोलती ही न थी। एकदम गूँगी। बोलती थीं उसकी आँखें। लाल सूजी आँखें। टुकुर-टुकुर ताकती हुर्इ। उतरा मुँह! थका चेहरा! कसार्इ की गाय!
          तब मनतोरिया की मार्इ ने तह तक जाकर भेद खोलने का निश्चय किया। विसराम के इधर-उधर होने पर वह घुसी झोंपड़ी में। दारू की गंध से डूबी झोंपड़ी। खटिया के आसपास बिखरे अधजली बीड़ी के टोंटे।
           पतोहू तो बीड़ी पीती नहीं!
          अचानक चीख निकल गर्इ मनतोरिया की मार्इ की। पैर पकड़कर बैठ गर्इ। तल-तल बहता खून? विसरमवा दाढ़ीजार ने टूटी बोतल का काँच बटोर कर रख दिया था कोने में। दो अंगुल का घाव हो गया उसके पैर में। चोरी से न घुसी होती तो लाख-लाख गालियाँ सुनाती।
      ''नर्इ-नर्इ लालटेन खरीदकर लाया है भार्इ। जब चाहे धीमी करो, जब चाहे तेज। ढिबरी की बत्ती तो हुचक-हुचककर जलती है।''
         ''पूरा विषधर है विसरमवा।'' मनतोरिया की मार्इ ने टोले की औरतों में ऐलान कर दिया है- 'घमासान' मचाए हुए है।
          लेकिन मरदों का मामला तो मरद लोग ही खुले आम निपटा सकते हैं। औरतें क्या करेंगी?
          और उसी रात सारा भेद औरतों के बीच से मरदों के कानों तक पहुँच जाता है।
         मरदों के लिए यह खबर इतनी खास नहीं। औरतों का तो काम है इधर से उधर लबर-लबर करना। और यदि बात में कुछ सच्चार्इ भी है तो इतनी 'अनहोनी' जैसा क्या है इसमें? गुनी आदमी है विसराम। जानवरों की चोट, मोच, हारी-बेमारी में उसकी जरूरत पड़ती है हर घर को। फिर छोटे-बडे़ की इज्जत करने वाला। एकदम से तो उसके ऊपर उँगली उठाना ठीक नहीं...लेकिन बिलकुल चुप रहना भी सम्भव नहीं है। रात में हर 'घरवाली' जानना चाहेगी- क्या कर हे हैं टोले के 'मरद' लोग?
          गाँजा-दारू का 'चानस' हाथ से बिलकुल ही न निकल जाए इसका ध्यान रखते हुए शाम की बैठक में 'मरद' लोग विसराम को तंग कर रहे हैं :
        ''विसराम भार्इ आपकी खटिया रात में नहीं दीखती बाहर। एकाध बार मैं इधर से गुजरा तो देखा दरवाजा सूना था।''
         ''काहे! तोहे पता नहीं कि आजकल बिगवा (भेंड़िया) का कितना जोर है। आए दिन सुनार्इ पड़ता है किसी की बकरी ले गया! किसी का बच्चा! रमवापुर में महतारी के कोरा से तीन साल का लड़का छीनकर ले गया। राजा पट्‌टी में एक औरत से लड़की छीन रहा था... ऐसे में बाहर सोने लायक है?...तुम बाहरै सो रहे हो? आया किसी दिन तो...''
       अब क्या बोला जाय? बात करने में विसराम को 'दाब' पाना आसान नहीं। और बिगवा का आतंक तो सचमुच चारों तरफ फैला हुआ है। औरतों ने अँधेरा होने के बाद छोटे बच्चों को लेकर बाहर निकलना बंद कर दिया है। दिशा-मैदान जाना है तो झुंड बनाकर जाओ। हाथ में हँसिया या कुल्हाड़ी लेकर। सुनते हैं औरतों या बच्चों पर ही ज्यादा जोर मारता है।
       जब बच्चों को हाथ से छीन रहा है तो रात-बिरात सोते में हमला कर दे तो क्या अचरज? आदमी का खून अगर एक बार मुँह में लग गया तो...सुनते हैं, आदमी का मांस नमकीन होता है....आदत लगी तो छूट नहीं सकती।
        लेकिन 'बात' के जोर पर कोर्इ 'पाप' पचा ले जाएगा?
        ''झोंपड़ी में तो पतोहू सोती है विसराम भार्इ। उसमें तुम्हारा सोना।''
        ''झोंपड़ी में तो बीस साल से सोता आ रहा हूँ।''
        ''लेकिन अब बात दूसरी है। पतोहू के पास रात में, अकेले में... हम लोगों के कहने का मतलब...लड़के को भी नहीं बुला सके गौने में...तुम्हें अपने लिए अलग झोंपड़ी खड़ी करनी चाहिए। हम लोग भी आते हैं तो यहाँ पेड़ के नीचे बैठना पड़ता है...''
         विसराम गाँजे की चिलम एक 'खींच' में जलाता है- 'लप्प'! नंगा करने पर अमादा हैं सारे के सारे लोग उसे।
         ''और लड़के को भी चिट्‌ठी लिखकर बुला लो। नहीं तो गाँव में तरह-तरह की बातें...''
         ''क्या तरह-तरह की बातें?'' विसराम को गाँजा चढ़ चुका है। उसी का गाँजा पीकर उसी की जड़ खोदगा कोर्इ? वह दहाड़ना चाहता है- लड़का आए साला, चाहे उमर भर न आए। पतोहू को 'खोराकी' से मतलब। और ऐसी-ऐसी चार पतोहुओं की खोराकी विसराम अभी अकेले 'पूर' सकता है।
       लेकिन गाँजा उसका गियान नहीं हर सकता। वह चौधरी है। बात सँभालना जानता है, ''हम खुद इसकी फिकर में हैं भार्इ। बहुत जल्दी जा रहे हैं लड़के को लाने और दूसरी झोंपड़ी की बात तो मैं खुद अगहन से सोच रहा हूँ, अब गन्ने की नर्इ 'पाती' हो गर्इ है तो दस-पाँच दिन में...दस आदमी के बीच में 'नक्कू' बनाने वाला काम खुद मुझे नहीं सोहाता। लेकिन मुँह से ऐसी-वैसी बात निकालने से पहले लोगों को सोचना चाहिए कि...''
         ''लोगों का मुँह कोर्इ बंद नहीं कर सकता विसराम भार्इ। पूरे टोले में चर्चा है कि विसराम अँधेर मचा रहा है। बेटवा आएगा तो हाथ-पैर तोडे़गा।''
         फिर लगने वाली बात। कलेजे में लपक उठती है विसराम के। बेटवा के लिए पतोहुओं की कमी है उसे? अभी तीन मंडा खेत बाकी हैं। रेहन रख दे तो तीन हजार मिलेंगे। तीन पतोहुएँ! लेकिन...
       ''दूसरे के फटे में दुनिया पैर डालने को दौड़ती है भार्इ! कोर्इ सीना चीरकर तो दिखा नहीं सकता! लेकिन कहा गया है। बात करै जानि कै। पानी पियै छानि कै। हर मर्द की 'मोछ' होती है। इज्जत होती है।''
        बात में वजन डालना जानता है विसराम। और जहाँ 'मर्द' की 'मोछ' का, 'इज्जत' का सवाल हो, जब तक कोर्इ रंगे हाथ न पकड़ ले या जब तक 'जनाना' खुद मुँह न खोले, सुबह-शाम की 'चिलम' दाँव पर रखकर कोर्इ कितना नंगा करे किसी को।
          मौछे अभी तक काली हैं विसराम की। वह 'मोछ' ऐंठता है।
         लेकिन मोछ ऐंठने से क्या होगा? विसराम का दर्द तो विसराम ही जानता है!
       शुरू-शुरू में तो नर्इ पतोहू जैसा शरम-लिहाज था। रीं-रीं करके रोना - हम बिटिया बराबर अही। आप बाप बराबर। रो-रोकर पैर छान लेती थी दोनों हाथों से। लगता था अब ढीली पड़ी कि तब। लेकिन बाद में तो बिल्ली जैसी खूँखार। वैसी ही गुर्राहट! पंजे मारना। हाथ झटकना। बिल्ली जैसे नाखून! सारा मुँह, नाक, कान, नोंच लिया है। पूरा चेहरा 'परपरा' रहा है। जलन! र्इंट-पत्थर ढोते-ढोते सारा शरीर लोहे का हो गया है ससुरी का। तीन दिन में तीन करम कर दिया। दोनों पैर सिकोड़कर ऐसा सधा वार किया छाती पर कि विसराम उताने दूर जा गिरा खटिया से। तब से छाती और सिर में भयानक दर्द! अपने शरीर पर बड़ा गुमान था विसराम को। क्या सचमुच 'जाँगर' घट गया है?
        जनवरों का बिना डिगरी का डाक्टर है विसराम। बडे़-बडे़ बैल-साँड रीढ़ की हड्डी दबाकर बैठा देता है। काबू में करता है। आज तक कोर्इ जानवर बेकाबू नहीं हुआ...और यह 'उदंत' बछिया पुट्‌ठे पर हाथ नहीं रखने दे रही है...यह अंदर का दर्द किससे कहने जाए विसराम? 'मोछ' ऐंठने से क्या होगा? झूठी बदनामी हो रही है, सो अलग। लात खाकर उसके मन में भय समा गया है। आज की रात वह दूर से ही भौंकेगा।
        ''बड़ी सती सावित्री बनती है? सारा गाँव नहीं गंधवा दिया था तूने?''
        ''सारा नखड़ा घर में ही दिखाएगी तू?''
        बोलना बंद कर दिया है विमली ने। रोना भी। जैसे गूँगी हो गर्इ है।
        ''डरेबरवा के साथ गुलछर्रे नहीं उड़ाती थी तू?''
        ''झरिया-धनबाद की सैर करने मैं गया था?''
        ''और बनारस की ठंडार्इ? हुँह, ठंडार्इ! बड़ी ठंडार्इ पिलार्इ है साले ने, एकदम ठंडा कर दिया है।''
       ''ऐतना कपड़ा-लत्ता, साड़ी-बिलाउज, गहना-गुरिया? सब बाप की कमाही है? लूले साले की? वह करेगा बेटी की दुकानदारी और तू  यहाँ आकर...''
       ''अच्छा बता, कुइसा मिस्त्री से दो हजार रूपए में तेरी बिदार्इ का सौदा नहीं तय किया था तेरे बाप ने? उठा गंगा। मैं अंधा हूँ कि बहरा?''
        ''मेला देखेगी? जलेबी खाएगी? गंगा असनान करेगी?''
        ''डरेवरवा की दारू महकती है और मेरी गंधाती है? नाक बंद करती है? क्या-क्या बंद करेगी?''
        ''गुलछर्रा उड़ाएगे दूसरे और खेत रेहन रखा जाएगा विसराम का?''
        ''मुझसे बोलने में भी पाप लग रहा है रे? तिरिया चरित्तर फैलाने से जान बचेगी? साली कातिक की कुतिया!''
        जैसे-जैसे छाती का दर्द बढ़ रहा है विसराम का क्रोध भी बढ़ रहा है। मुँह में फिचकुर आ गया है। सारा शरीर काँप रहा है।
         पैर सिकोड़कर घुटने को अंकवार में बाँधकर, उसी में सिर गड़ाए बैठी है विमली। जैसे कोर्इ साही दुश्मन के आक्रमण की आशंका में बैठी हो काँटा फैलाकर! दूर से ही भूँक रहा है विसराम। पास जाते ही एक काँटा तीर की तरह छूटेगा-सन्न!
       जान साँसत में पड़ी है विमली की। किसी तरह पत-पानी के साथ मायके पहुँच पाती अगर...या उसका आदमी आ पहुँचता अचानक। नहीं तो हर रात-जंगल की रात! एक रात-एक जुग। किसी से कहे भी तो क्या? क्या करेगा कोर्इ सुनकर हँसने के सिवा? भरी पंचायत में खड़ा होना पडे़गा अलग। और ऐसे-ऐसे नंगा कर देने वाले सवाल पंचायत के चौधरी लोग, रस ले-लेकर पूछते हैं कि...उसे खूब पता है। नैहर तक बदनामी अलग से।
       हाँ, मनतोरिया की मार्इ से अपने आदमी का 'पता' मालूम करवाया है उसने। चिट्‌ठी भी लिखवा दिया है। चौथे दिन चिट्‌ठी पहुँचेगी कलकत्ता। मायके भी खबर भिजवाया है- बप्पा को मालूम हो कि खबर पाते ही आकर लिवा चलें । देर हुर्इ तो बिटिया की लहास ही देखेंगे।
         बप्पा और 'आदमी' की राह देखती विमली।

         कुइसा  मिस्त्री अपने गाँव चले गए- जिला बलिया!
       हिसाब- किताब करने में आना-कानी किया खान साहब ने तो बिना हिसाब किए चल पड़े। बोलते थे, अब गया-जगन्नाथजी दर्शन करने जाएँगे इस साल। अगले सीजन में आएँगे कि नहीं? कह नहीं सकते। आदमी की जिनगी का कौन ठिकाना। दाढ़ी-मोछ के बाल पकड़ने लगे। गठिया बतास जोड़ पकड़ने लगा। माया का फंदा धीरे-धीरे काटना होगा...
         ''माया केरी पूतरी, तन तरकस मन बान!
         तिरिया धावै रथ चढ़ी, पुरूखहिं करै निशान!''

      विसराम के सुभाव में इधर काफी फरक आ गया है। उधर दो-तीन दिन बाहर पेड़ के नीचे खटिया बिछाकर सोया। फिर बाँस-पाती आदि का जुगाड़ करके अलग मँड़ही खड़ी कर लिया, छोटी-सी। अब उसी में सोता है। दिन का ज्यादा समय शिवाले पर गुजारता है। गंजेड़ियों की भीड़ जो बीच में उसके दरवाजे पर जमने लगी थी, अब फिर पहले की तरह शिवाले पर  जमने लगी है।
        पहले दिन विसराम ने बाहर खटिया बिछार्इ तो अचरज के मारे विमली को सारी रात नींद नहीं आर्इ। किवाड़ के अंदर से बिलारी बंद करके मूसर की टेक लगा दिया था फिर भी दिल धड़क रहा था। बुढ़वा की मति का क्या ठिकाना। कोर्ठ नर्इ चाल! जरा-सी आहट पाते ही चौंककर उठ बैठती।
        बडे़ सबेरे उठते ही खरहरा लेकर दुआर-मोहार बुहारता है। पहले दिन झाडू लगाकर जाने कहाँ से एक गिलास दूध लाया था और उसके हाथों में थमाते हुए बोला था, ''जरा एक गिलास 'चाह' बनाना बहू! सुनते हैं तेरे हाथ की चाह पिए बिना समधी लोटा नहीं उठाता था।''
        कितनी मिठास थी आवाज में! कितना दुलार!
       चाय का गिलास पकड़ते हुए हाथ काँप रहे थे विमली के। आँखों में पानी। गिलास पकड़ते हुए विसराम की आँखें नीची थीं- इतना बदलाव! कर्इ दिन बाद एक दिन शाम का खाना खाते हुए खुद कहने लगा, ''मै बहुत शर्मिदा हूँ बहू! अगर तूने माफ नहीं किया तो नर्क में भी जगह नहीं मिलेगी मुझे। किसुनवा ओझा ने गाँजे में कोर्इ बूटी मिलाकर पिला दिया था। मति भरिष्ठ कर देने वाली बूटी। उसी से हफ्ते भर सिर पर पाप सवार था और हफ्ते भर में मेरी मरजादा का नाश हो गया बिटिया! शिवाले के पुजारी बाबा ने विचार कर नाम खोला। कर्इ दिन से मैं उनकी 'सरन' में बैठ रहा हूँ। किशुनवा को मैंने तीन साल में कितना  गाँजा पिलाया होगा और उसकी बदी इस तरह दिया बेर्इमान ने। मुँह में कालिख लगाने का इंतजाम कर दिया था घटियारे ने। तेरी जैसी लक्ष्मी बहू न होती तो कहाँ मुँह दिखाते हम लोग। कल को मेरा बेटा लौटता तो किस घाट लगता? लक्ष्मी है बहू, तू लक्ष्मी है, जो अपना पानी और मेरी पगड़ी, दोनों बचा ले गर्इ। मैं पापी...''
     आँखें भर-भरा गर्इ थीं विसराम की। गला रूँध गया था। विमली को भी लगा कि वह 'भोंकार' छोड़कर रो पडे़गी। किस जनम का बदला लेना चाहता था वह ओझा? विमली बड़ी देर तक विसूरती रही थी। उसे लग रहा था जैसे जुगों की तपन के बाद धीरे-धीरे कलेजे में ठंडक पैठ रही है।
       रात लेटे-लेटे देर तक सोचती रही वह। खान साहब कहते थे- सच्चार्इ को कोई छिपा नहीं सकता। सच्चार्इ को कोर्इ दबा नहीं सकता। सच्चार्इ को कोर्इ हरा नहीं सकता। सच्चार्इ आखिर सच्चार्इ होती है।
      पास-पाड़ोस के लोगों को भी देखकर अचरज होता है कि सचमुच पानीदार आदमी है विसराम। जरा-सा मजाक-मजाक में टोका-टाकी हुर्इ और उसे बात लग गर्इ! मरजादा वाला आदमी! चार दिन में अलग मँड़र्इ खड़ी कर दिया। ऐसे ही तो जात-बिरादरी किसी को चौधरी नहीं मान लेती। किसी के खिलाफ मुँह खोलने के पहले हजार बार सोचना चाहिए। औरतों के कहने में आकर लोग उसे बेज्जत करने पर आमादा थे। ठीक ही कहते हैं- नाक न हो तो औरतें मैला खा लें।
       दुआर-मोहार बुहारने के बाद विसराम ने बाहर से ही ऊँची आवाज में बताया, ''दोपहर में खाने नहीं आएगा वह आज। शिवाले पर सत्यनारायण की कथा कहवा रहा है। तब तक 'बरत' रहेगा। बहू अपना खाना-पीना कर ले। वह एक ही 'टेम' शाम को खाएगा। गंगा जल का छिड़काव करके झोंपड़ी 'पवित्तर' करने और 'चरनामरित' ग्रहण करने के बाद।'
       तब तो विमली भी रहेगी बरत! इतने बडे़ सकंट से उबार लिया सत्यनाराण सामी ने। उसके ससुर का दिमाग सही कर दिया। पहले पता होता तो वह चाह भी न पीती.... सत्यनाराणजी की कथा घर में होनी चाहिए थी। पहले याद पड़ा होता तो जरूर कहती। अब तो जा चुका ससुर! उसका मन, शरीर थिर हो रहा है-ठंडा!
      दोपहर तक मेहनत करके विमली ने पूरी झोंपड़ी को लीपा है अंदर-बाहर। हफ्तों बाद चैन आया है उसके मन में। लग रहा है वह मालकिन है इस झोंपड़ी की, अपनी ससुराल की। उसका आदमी 'कमाने गया है' परदेस। बूढे़ ससुर के रोटी-पानी का इंतजाम तो उसी के जिम्मे है। शाम होते ही वह खाना बनाने में लग जाती है।
       कल ही उसका बाप आनने आएगा। मनतोरिया की मार्इ ने बताया है। खबर न भेजती तो क्या करती? लेकिन अब तो न आए बाप तो भी कोर्इ बात नहीं। चार दिन बना-खिला दे ससुर को। उसके जाने के बाद तो फिर अपने ही हाथ, से 'पाथना' होगा मोटी-महीन!
       ...जल्दी ही लौटेगी मायके से। अब तो यही उसका घर-दुआर है। उसका आदमी भी किसी समय आ सकता है। चिट्‌ठी पहुँच गर्इ होगी।
       एक घंटा रात बीतते आता है विसराम। एक हाथ में 'चरनामरित' की हाँड़ी और दूसरे में पंजीरी का दोना।
       ऐ! झोंपड़ी लिपी-पुती शुद्ध!
       ''मैं तो लक्ष्मी ही कहकर पुकारूँगा अब तुझे बहू। मना मत करना। ए ले गंगाजल की बोतल! हाथ-पाँव धोकर पूरी झोंपड़ी में छिड़क दे। फिर परसाद 'ग्रहन' कर ले। हाँ! मैं तो वहीं ग्रहण कर चुका। भूख के मारे हालत खराब थी। यह परसाद सारा तेरे लिए ही है।''
       ''ज्यादा है? एक लोटा चरनामरित ज्यादा है, सबेरे से ही बासी मुँह पड़ी है तू! और यह जरा-सी पंजीरी!''
       ''अच्छा ज्यादा है तो थोड़ा-सा ढँककर रख दे अपने बप्पा के लिए। हाँ, मैं तो बताना ही भूल गया। कल ही तेरे बप्पा आ रहे हैं लेकिन 'चरनामरित' तो पूरा पी ले। कल तक तो उसका दूध फट जाएगा।''
      ''नहीं खाने की अब जगह ही नहीं रह गर्इ बिलकुल। मैं जरा एक चिलम...सबेरे से हाथ नहीं लगाया है चिलम को।''
      विसराम के बाहर जाने के बाद विमली परसाद को झोंपड़ी के बीचोबीच जमीन पर रखती है। जमीन से छुआकर माथा टेकती है-हे प्रभु!
      पंजीरी कितनी मीठी लग रही है। भगवान का बास जो हो जाता है। और 'चरनामरित' तो सचमुच ही अमरित। एक गिलास अमरित!
        'धक्का' जैसा लगता है विमली को। कहते हैं खाली पेट में अन्न पहुँचता है तो ...अन्न में भी नशा होता है... लेकिन इतनी सुस्ती। हाथ-पाँव ढीले पड़ते जा रहे हैं। वह खटिया पर लुढ़क जाती है- बस दो पल लेट ले।
     गाँजे की चिलम चटकाकर झोपड़ी में घुसता है विसराम। लालटेन की रोशनी में देखता है। कुतवा 'चरनामरित' की हाँड़ी चाटकर वहीं जमीन पर फैल गया है। विसराम धीरे से लात मारता है कुतवा आँख खोलकर बेगाने ढंग से ताकता है। लड़खड़ाता हुआ बाहर तक जाता है। और फिर लुढ़क जाता है।
        'चरनामरित' और कुत्ता पीए? बंदे-बंदे की बात!
        खटिया पर चित्त पड़ी है विमली, बेसुध!
      विसराम धीरे-धीरे हिला-डुलाकर देखता है। कोई हरकत नहीं। असर कर गर्इ है। गुरू ने बताया था-- जो जानवर किसी तरह काबू में न आए उसके लिए- अफीम!
        अफीम का चरनामरित या दूध का? पहचान सकते हैं आप- देखकर? सूँघकर? चखकर?
      विसराम के हाथ-पैर में सनसनाहट होने लगी है। वह झोले से तली हुर्इ मछलियों की पोटली और बोतल निकालता है। दिल इतनी तेजी से क्यों 'धड़धड़ा' रहा है? जैस डाकगाड़ी का इंजन!
        बत्ती तेज करके लालटेन सिरहाने टाँग लेता है विसराम!
      अचानक विमली को लगता है उसके सीने पर वजनी पत्थर रख उठा है। लेकिन लाख कोशिश के बावजूद पलकें उठती नहीं। जैसे मनों बोझ लद गया हो।
       ऐ! क्या हो रहा है? झोंपड़ी हिल रही है या खटिया? मुँह नोच लेगी वह। आँखें फोड़ देगी। लेकिन हाथ-पैर में जुम्बिस क्यों नहीं होती?
         विसराम के शरीर में बाघ की ताकत आ गर्इ है। डाकगाड़ी का इंजन- झक्! झक्! झक्!
       बप्पा रे ए-ए! वह चीखना चाहती है लेकिन सिर्फ गों-गों करके रह जाती है। कोर्इ वश नहीं! जैसे अतल समंदर में डूबी जा रही हो।

         एक  युग बीत गया हो जैसे। विमली को ठंडक लगती है। आँखें खुल जाती हैं। शरीर अभी पूरी तरह वश में नहीं है। रजार्इ नीचे गिरी है। सिरहाने लालटेन जलती जा रही है। कपड़े अस्त-व्यस्त! पूरा शरीर टूट रहा है।
         खटिया से नीचे उतरती है वह। पैर सीधे नहीं पड़ रहे हैं। वह कपडे़ ठीक करती है।
        खाली बोतल नीचे लुढ़की पड़ी है। मछली के काँटे! बीड़ी के टोंटे! पूरा बंडल खतम किया है शायद! दीवार पर थूकी पान की चार-पाँच पीकें!
         कूत्ते की चाटी 'चरनामरित' की हाँड़ी औधी पड़ी है, लालटेन रह रहकर भभक रही है।
        चेतना आते ही उसे रूलार्इ छूटने लगी है- धोखा! छल! कहाँ-कहाँ से किन-किन खतरों से बचाती आर्इ थी वह परार्इ अमानत! कितने बीहड़ कितने जंगल? कितने जानवर? कितने शिकारी! और मुकाम तक सुरक्षित पहुँचकर भी लुट गर्इ वह! मेंड़ ही खेत खा गया छल से ! ऐसी बेहाश कर देने वाली नींद आर्इ कैसे? उसकी खुद समझ में नहीं आ रहा है।
       अपनी आन-बान से जीने वाली 'मादा' यहाँ 'मिट्‌टी' कर दी गर्इ जबरन! लाड़-प्यार से नाकाम छुर्इ-मुर्इ पढ़वैया लड़की है वह? कि चुपचाप जला दी जाएगी? मार दी जाएगी? उसके खून में मेहनत की आँच है। उसे कोर्इ 'दासी' बनाकर रख पाएगा?
        सहसा रूलार्इ गायब हो जाती है। बुझी-बुझी आँखों में चमक उभरती है। क्रमश: दीप्त होती चमक! बिल्ली की आँखों की चमक देखा है कभी अँधेरे में? नीली चमक! जलती आँखें!
        झोंपड़ी के एक कोने में खूँटी पर मिट्‌टी के तेल की बोतल लटक रही है। बोतल उतारकर वह ताखे से माचिस उठाती है और विसराम की मँड़ही की तरफ लपकती है। उसकी आँखो में मँड़ही के अंदर खटिया पर बेसुध पड़ा विसराम का काला अधनंगा शरीर नाच रहा है। युगों की भूख मिटाकर बेखबर सोया पड़ा तृप्त-संतृप्त दैत्य! खुले मुँह से बहती पीक की धार? गंदा तन-गंदा मन!
        सारी गंदगी, बदबू, छल और धोखा जलाकर राख कर देगी वह। और कोर्इ राह नहीं ।
      अंधेरी मँड़ही! बाध पर गिरते तेल की आवाज ने बताया- खटिया सूनी है। छूकर देखती है।कोर्इ नहीं। कथरी सिरहाने रखी हुर्इ है। कहाँ गया? निराश हाथों से बोतल और माचिस छूट जाते हैं। अब?
       पौ फटने लगी है। रूलार्इ बार-बार उमड़कर गले में फँस रही है। तो क्या इसी नर्क में आगे भी? न अब एक पल भी नहीं रूक सकती वह यहाँ। अपने आदमी का पता है और गौने में साथ लाए टिन के बक्से में उसकी गिरस्थी। झोंपडे़ में लौटकर वह जल्दी-जल्दी सब कुछ समेटती है। और बाहर निकल पड़ती है। कैसा होगा कलकत्ता शहर! उस शहर में उसका आदमी? उसने तो कभी यहाँ का रेलवे-स्टेशन तक नहीं देखा। गाड़ी की सीटी और गड़गड़ाहट से केवल दिशा का अंदाजा लगाती थी।

        शिव  हो! शिव हो!
        इस बार आवाज ज्यादा साफ है।
पुजारीजी उठकर झरोखे से झाँकते है। सामने शिवाले की सी‌ढ़ियों पर कोर्इ छाया लेटी है। 'पट' खोलने के पहले वे आश्वस्त हो जाना चाहते हैं। इस गाँव के लोगों का विश्वास नहीं। मौका पाने पर दिन में ही टाठी-लोटा तक पचा जाने को तैयार! रात की तो बात ही दूसरी है।
       ''कौन?''
       जय शंकर! जय शकंर!
      जानी-पहचानी आवाज! पट खोल देते हैं। टार्च की रोशनी में देखते हैं- साष्टांग लेटा भक्त-विसराम! विसराम उठकर पुजारी जी के चरण छूता है।
      गदगद हैं पुजारीजी! लंका में विभीषण! इस आदमी में भक्ति भाव कितनी जल्दी कितने गहरे पैठ रहा है। साँझ को भी बार-बार भेजने पर 'परसाद' लेकर घर जाते-जाते नौ बजा दिया था। फिर लगता है आधीरात से ही 'चरनों' में हाजिर हो गया। बड़ी देर से उनके उनींदे कानों में आवाज पड़ रही थी।
       पुजारीजी विसराम को उठाकर गले से लगा लेते हैं। फिर आकाश की तरफ देखकर रात का अंदाजा लगाने की कोशिश करते हैं। पौ फटने में अभी कुछ कसर है।
        वे बाती जलाकर उजाला करते हैं।
       विसराम पुजारीजी की आसनी के पैताने बैठकर अपने मन की दशा बताता है। शंकर भगवान के चरणों को छोड़कर और कहीं मन नहीं लग रहा है बाबा! बड़ी बेचैनी है। बहू को परसाद देकर सोने की कोशिश की। लेकिन बड़ी देर तक नींद नही आर्इ। जरा-सी झपकी लगी थी तो बड़ा खराब सपना! देखा कि मेरी झोंपड़ी के बीचोंबीच जमीन पर लक्ष्मीजी बिराज रही हैं। सोने के गहनों से लदी काया! कि अचानक कहीं से एक काली डरावनी-सी राक्षसी काया आकर उन्हें घेर लेती है। लक्ष्मीजी 'अलोप' हो जाती हैं। बचता है खाली अंधकार! हड़बड़ाकर आँख खुली तो लगा कोई काली-सी छाया मेरी झोंपड़ी से निकलकर अँधेरे में समा गई है। तब से चित 'थिर' नहीं हो रहा है। लक्ष्मी का इस तरह घर छोड़कर जाना। क्या मतलब है इस सपने का?
        पुजारी मंद-मंद मुस्कराते हैं? ''लगता है साँझ के गाँजे का नशा भक्त विसराम के 'बरम्हांड' तक चढ़ गया है। तभी ऐसी बेचैनी होती है। घबड़ाने की बात नहीं। धूनी-आरती के बाद 'जोग-मुद्रा' में बैठूँगा तो 'विचार' लगाऊँगा।''
      आरती की घड़ी-घंटा, डमरू और सम्मिलित ध्वनि शिवाले पर गूँजी तो गाँव की सीमा छोड़ती विमली ने बक्सा नीचे रखकर दोनों हाथ जोड़कर सिर झुकाया-आगे तुम्हीं साथी-सहारे हो प्रभु!
       आरती के बाद उपस्थित भक्तों के सामने आज पहली बार भक्ति-भाव में तन्मय होकर दोहे-कवित्त-भजन सुनाया विसराम ने-
         बकरी पाती खात है, ताकी खैंची खाल।
         जे नर बकरी खात है, ताकी कौन हवाल।।
         पुजारीजी ने भविष्यवाणी की कि साधना जारी रही तो भक्त विसराम अच्छा 'भजनीक' बनेगा।


       शिवाले  पर बैठे-बैठे काफी समय तक किसी 'अनहोनी' का इंतजार करता रहा विसराम! अफीम का नशा टूटते ही कोहराम मचा सकती है। लेकिन एक घंटा दिन चढ़ने के बाद भी कहीं कुछ सुनार्इ नहीं पड़ता तो उसे अपना भय बेमानी लगने लगता है। घर लौटने में कोर्इ हर्ज नहीं।
       लेकिन झोंपड़ी के पास पहुँचते-पहुँचते कदम अपने-आप धीमे पड़ने लगते हैं। जाने पतोहू का कौन-सा रूप देखने को मिले? दिल धड़क रहा है...लेकिन क्यों? वह तो करीब-करीब सारी रात शिवाले पर बिताकर लौट रहा है। शाम को आया तो परसाद देकर फिर लौट गया बिना खाए-पिए। अगर कोर्इ ऐसी वैसी बात हुर्इ है तो इसका मतलब पतोहू की मरजी से ही कोर्इ घुसा होगा झोंपड़ी में! जब तक यह अंदर से दरवाजा नहीं खोलती, कोर्इ कैसे घुस सकता है। मायके से ही इस मायने में बदनाम रही है।
         झोंपड़ी का दरवाजा तो चौपट खुला है। सन्नाटा! चूड़ी तक की आवाज नहीं। वह अंदर झाँकता है। कोर्इ नहीं! ऐ! बक्सा गायब है बहू का। कहाँ गर्इ? वह बाहर निकलकर अगल-बगल और पिछवाड़े का एक चक्कर लगाता है। भाग गर्इ? कहाँ गर्इ होगी?
       उसका आत्मविश्वास पूरा-पूरा लौट आया है। जोर से साँस खींचकर फेफड़ों में हवा भरता है। पतोहू का भागना तो गुस्सा करने की बात है। रात झोंपड़ी में कुछ खटर-पटर तो सुना था उसने। किसी को निकलते भी देखा था। पर इतनी दूर तक नहीं सोच पाया...ओ! खाली हाथ नहीं, उसकी मेहरारू का गहना-गीठी भी खोदकर ले गर्इ है। डेढ़ किलो चाँदी के गहने, दस चाँदी के रूपए महारानी विक्टोरिया के जमाने के। एक सोने की मुहर! सब कुछ हाँड़ी में रखकर जमीन में गाड़ा गया था...वह दौड़कर अपनी मँड़र्इ से कुदाल लाता है और झोंपड़ी का एक कोना तेजी से खोदने लगता है। यहीं से ले गर्इ खोदकर।
        फिर कुदाल छोड़क हाथ-पैर की धूल झाड़ता है और बाहर आकर 'हल्ला' करने लगता है-दौड़ो रे भइया! अरे जगेसर भार्इ! ललर्इ काका! र्इ तो हरजइया निरधन करके भाग गर्इ हो। हे भगवान! कहाँ दौड़ी? केका गोहरार्इ?
       का भवा? का भवा? एक-एक करके इकट्‌ठा होने लगे हैं टोले के औरत-मर्द-बच्चे! थोड़ी देर में पूरे गाँव में हल्ला हो जाता है।
''विसराम की पतोहू भाग गर्इ, किसी के साथ।''
        ''हाँ विसराम ने रात किसी को झोंपड़ी से निकलते देखा था। सोचा बहू दिशा-मैदान के लिए निकली होगी।''
विसराम लोगों को वह जगह दिखा रहा है जहाँ से गहना खोदकर ले गर्इ है पतोहू! कुदाल अभी तक वहीं पड़ी है। गहने के अलावा दस चाँदी के रूपए और एक सोने की मुहर! तब तक लोगों की नजर दूसरे कोने पर जाती है। लालटेन अभी भी धीमी लौ में जल रही है...एक औरत के पैर में मछली का काँटा गड़ गया। खटिया के नीचे दारू की खाली बोतल। जली बीड़ी के अँजुरी भर टोंटे। पान की पीक से रंगी हुर्इ दीवार। अब किसी को और कुछ बताने की जरूरत है? खुला खेल हुआ है रात भर! विसराम ससुर शिवाला रखा रहे हैं और कथा सुन रहे हैं, यहाँ असली कथा हुर्इ है रात भर। इसकी खबर नहीं।
        पूरा गाँव झोंपड़ी के अंदर का दृश्य देख लेना चाहता है। एक निकलता है तो दस घुसना चाहते हैं।
       दुआर पर रखे पुआल की गंजहर से टेक लेकर, दोनों हाथों से सिर थामे बैठा है विसराम। सैकड़ों सवाल! जो भी आता है, नए सवालों के जवाब चाहता है।
       टुकड़े-टुकड़े में किस्से के सिरे निकलते हैं दुखिया विसराम के मुँह से। एक किस्सा हो तो बताए कोर्इ! नैहर में तो इसके पीछे रोज एक किस्सा तैयार होता था। इतने किस्से पीछे छोड़कर आर्इ थी कि बताने लगे तो पूरी रामायण बन जाएगी। अब तक तो इज्जत का खयाल करके चुप रहता था विसराम। अब क्या रह गया छिपाने को। एक डरेवर था टरक का। उसके साथ कर्इ बार गर्इ थी झरिया-धनबाद घूमने। एक और छोकरा था। मेला घुमाने ले जाता था। एक मिस्त्री था, गहने गढ़ा-गढ़ाकर पहनाता था। विसराम ने सोचा था, आँख ओट पहाड़ ओट। साथ छूट जाएगा तो सारा किस्सा अपने-आप खत्म हो जाएगा। सपने में भी नहीं सोचा था कि लोग यहाँ तक धावा बोलेंगे। भगवान जाने कौन-कौन कब से आता था। नैहर से भाग जाती तो कम-से-कम विसराम की और इस गाँव की नाक तो न कटती!
       गाँव की नाक! इस तरफ तो किसी ने ध्यान ही नहीं दिया। गाँव की नाक काटकर भाग जाएगा कोर्इ और गाँव के लोग चुपचाप देखते रहे जाएँगे?
      किधर गर्इ होगी? नैहर? किसी के साथ भागेगी तो नैहर क्यों जायेगी। गाड़ी पकडे़ंगे लोग, या बस। रेलवे स्टेशन और बाजार की बसों की तलाश होनी चाहिए। अगर रात वाली गाड़ी से निकल गए होंगे तब तो गए हाथ से। अगर दस बजिया गाड़ी पकड़ने की ताक में होंगे तो बच के नहीं जा सकते।
       बात की बात में आठ-दस साइकिलें निकल आती हैं। दो गोल बन गर्इ है। एक गोल बसों और टैक्सियों में खोजेगी, बाजार में। दूसरी रेलवे स्टेशन देखेगी। एक-एक साइकिल पर दो-दो तीन-तीन लोग।
       तब तक एक औरत की नजर विसराम की मँड़र्इ में खटिया के नीचे लुढ़के मिट्‌टी के तेल की बोतल और तेल से गीले, माचिस पर पड़ती है। खटिया के बाध और सिरहाने रखी कथरी पर मिट्‌टी का तेल गिरा है। एक बार फिर पूरी भीड़ मँड़र्इ को घेरती है।
      विसराम भी उठकर आ जाता है। इसका मतलब शंकर भगवान ने ही उसके प्राण बचाए। भोर में ही वह शिवाले पर नहीं गया होता 'आरती' करने तो इस समय उसकी जली हुर्इ लहास ही दुनिया देख रही होती। शिव हो! शिव हो!
         ऐसी खतरनाक जनाना तो आज तक इस गाँव में नहीं आर्इ थी, भार्इ!
        औरतों में चरित-चर्चा चल रही है। किस-किस औरत ने कब-कब गाँव की नाक काटने वाला काम किया था। किसको संदेह था इस औरत की बदचलनी पर।
         गायें-भैंसे खूँटे पर रँभा रही हैं। उन्हें खोलकर चराने ले जाने वाला कोर्इ नहीं है। छोटे बच्चों को इस तमाशे में  कोर्इ रूचि नहीं, लेकिन उन्हें रोटी-पानी देने वाला कोर्इ नहीं है। गाँव में तरकारी-भाजी सिर पर लादकर बेचने वाली मुराइनों का सौदा लेने वाला कोर्इ नहीं है। सभी विसराम के दरवाजे पर। दूरदराज घरों की औरतें विसराम के टोले की औरतों की 'बकलेली' पर तरस खा रही हैं। इतनी बड़ी बात सूँघ नही सकी कोर्इ। उल्टे विसराम को ही बदनाम करने वाली उल्टी-सीधी खबर उड़ाती थी मनतोरिया की मार्इ।
         ''अरे, मनतोरिया की मार्इ भी तो अपनी भरी जवानी में पूरे गाँव को न्योतती घूमती थी। अपना 'पच्छ' सभी को भाता है।'' डीजल की महतारी हाथ फेंककर अचानक आवाज ऊँची कर देती है।
        ''टोले वालों के ताने सुनते-सुनते विसराम के दिल में घाव हो गया था। झूठा अकलंक। बेचारे ने रात-दिन एक करके अपने सोने के लिए अलग मँड़र्इ तैयार किया।'' बाल विधवा बिरजा कहती है।
       ''वही तो गलती हुर्इ।'' डीजल की महतारी चीख-चीखकर बोलती है- ''न झूठा अकलंक मनतोरिया की मार्इ लगाती न विसराम दूसरी मँड़र्इ छवाता, न बहू को खुलकर खेलने का मौका मिलता, न आज गाँव की नाक आधे पर से कटती।''
        डीजल की महतारी मनतोरिया की मार्इ का नाम 'सानना' नहीं भूलेगी। जहाँ पिछले साल मनतोरिया के छोटे भार्इ का बियाह हुआ है वहाँ डीजल की शादी दो साल पहले से तय थी। इसी औरत ने डीजल का रिस्ता कटवाकर अपने लड़के का रिस्ता जोड़ लिया। बियाह में मिली मुर्रा भैंस जब तक मनतोरिया की मार्इ के खूँटे पर रहेगी डीजल की मार्इ का कलेजा ठंडा कैसे हो सकता है? दस किलो दूध देने वाली भैंस। वह पूरे विश्वास के साथ दावा करती है कि विसराम की पतोहू को भगाने में मनतोरिया की मार्इ का हाथ है। अभी खाना-तलासी ली जाय तो पतोहू गहना और 'गुंडा' समेत इसी के घर से बरामद हो सकती है। लोग झूठ-मूठ टेशन बाजार खोजने गऐ हैं।
      मनतोरिया की मार्इ अभी-अभी ही विसराम के दरवाजे से गर्इ है बहुत जरूरी-जरूरी काम निपटाने। पहुँचानेवालियाँ तुरंत उसके कानों में सारी बात पहुँचाती है। वह काम-धाम छोड़कर  दौड़ती है। लेकिन डीजल की मार्इ को भी झगड़ने का पुराना अनुभव है। आमने-सामने लड़ने का कायदा नहीं। वह खिसक जाती है।
         विसराम थोड़ी-थोड़ी देर बाद सिर उठाकर 'शिव-हो, शिव हो', कहता है और फिर झुका लेता है। अब तमाशे में कोर्इ दम नजर नहीं आता। लोग एक-एक करके खिसकने लगे हैं!
        सहसा हवा के झोंके पर चढ़कर खबर आती है- पकड़ी गर्इ पतोहिया रेलवे-टेशन पर। जाने कहाँ छिपी बैठी थी। गाड़ी आते ही लपककर चढ़ी। गाड़ी से उतारकर ला रहे हैं लोग। खबर मिलते ही चौंककर खड़ा हो जाता है विसराम, ''खबरदार! जो मेरी डेहरी के अंदर कदम रखा हरामजादी ने।''
      आगे-आगे मरी चाल से सिर झुकाए, हाथ में बक्सा लटकाए चलती पतोहिया और तीन तरफ से घेरकर चलते खोजी दल के सूरमा। पीछे-पीछे आधा गाँव। याद नहीं पड़ता कि ऐसा तमाशा पिछले कर्इ बरसों में गाँव वालों को देखने को मिला हो।
       झोंपड़ी के दरवाजे पर हाथ-पैर फैलाकर खड़ा हो गया है विसराम। अंदर का रास्ता हमेशा के लिए बंद। ससुर-पतोहू का नाता खतम!
        ''जुठारी हुर्इ चीज। दागी जिंस। बाहर बैठाओ।''
         इसका भतार नहीं पकड़ में आया। विसराम पूछता है, ''दूसरा कौन था साथ में?''
        ''और तो कोर्इ नहीं था।''
        ''रहा कैसे नहीं। बगल में या सामने साँवला-सा नौजवान, मूँछ वाला?''
        ''हाँ-हाँ। सामने की सीट पर एक नौजवान बैठा था। मूँछ भी थी। पूछता था, क्यों पकड़ रहे हो औरते को?''
       ''वही-वही!'' विसराम बताता है। वही था डरेवर। पुराना यार इसका। उसको साले को काहे छोड़ दिया। इसके साथ उसका मूँड़ भी मुँड़ाकर गधे की सवारी...
       पतोहू बीच दुआर पर बैठ गर्इ है। गाँव की औरतें उसके गिर्द घेरा बनाकर बैठ रही हैं। एक बार फिर से मेला लग गया है। विसराम हाथ जोड़कर गाँव वालों के सामने सवाल रखता है। पाँच पंच बताएँ कि उसके लिए क्या हुकुम होता है।  बुजुर्ग सलाह करते हैं। फिर तय होता है कि शाम को विसराम के दरवाजे पर पंचायत बैठेगी  पूरे गाँव की। उसी में तय होगा कि गाँव की नाक काटने वाली जनाना को क्या सजा दी जाए।
       सहसा विसराम को कुछ याद पड़ता है। वह लपककर पतोहू के बक्से की साँकल झटककर उखाड़ लेता है, ''मेरी मेहरारू के गहने? अंदर की चीजें उलट-पलट डालता है। गहने कहाँ गए मेरे? रूपए? मुहर?'' वह पतोहू के बाल झिंझोड़ने लगता है।
        पतोहू झटके से उठकर खड़ी हाती है? ''खबरदार। कुत्ता, दाढ़ीजार, जो दुबारा हाथ लगाया मेरी देह पर। कच्चा चबा जाऊँगी।''
        बाप रे! सहमकर पीछे हट जाता है विसराम। औरतों का झुंड पतोहू को खींचकर बैठा लेता है, जरा तेहा देखो। इतने पर भी लाज-शरम का लेश नहीं।
         पतोहू पागलों की तहर आँख फाड़कर ताक रही है। बिखरे-खुले बालें को सँभालने की जरूरत नहीं समझती।
      विसराम हटकर अपनी जगह पर बैठ जाता है। पतोहू को ढूँढकर लाने वाले लोग जीतकर भी हारा हुआ महसूस करने लगे हैं। गहना रूपया तो ले गया डरेवर सार! 'इज्जत' रात में ही ले लिया...उस समय किसी के दिमाग में आर्इ नहीं यह बात। सारे के सारे नए लौंडे। लड़की पाकर ही 'भुच्च' हो गए।
       गाँव की औरतें पतोहिया के मुँह से सारा 'असली किस्सा' सुनना चाहती हैं। कब से आता था डरेवर यहाँ? कहाँ छिपाकर रखती थी दिन में? एक औरत ने आँचल के खूँट में बँधा टिकस ढूँढ़ लिया। किसी पढ़वैया लड़के को बुलाओ तो पढ़कर बताए।
      पतोहू की तरफ से कोर्इ जवाब न पाकर औरतों को चिढ़ हो रही है। आजकल की लड़कियों को महीना-खांड भी सबर नहीं। पैदा होते ही भतार चाहिए। इसी को कहते हैं कलजुग, बहिनी।
      विमली को आनने के लिए आता उसका बाप साँझ का झुटपुट होते-होते गाँव की सिंवार में पहुँचता है। खेतों में काम करने वाले एक छोड़ दस लोग उसकी बेटी की कलंक गाथा सुनाने के लिए घेर लेते हैं। सुनकर कान बंद कर लेता है विमली का बाप। विमली की माँ सामने होती तो लात-जूतों से हीक भर मारने से शायद कलेजे की जलन कुछ ठंडी होती। विदार्इ से पहले वह इसी चिंता में रात-दिन डूबता-उतरता था। विदा किया तो लगा छाती से पहाड़ टल गया। कौन जानता था कि भट्‌ठे पर सीखा 'गुन' यहाँ आकर दिखा देगी। डरेवर, साला, हरामजादा, एकरी बहिनी क...
        अब क्या मुँह लेकर आगे बढे़ वह। कालिख पुता मुँह। ऐसी बेटी का मुँह देखने से भी 'महापाप' चढे़गा। अब कौन किसकी बेटी, कौन किसका बाप! पंच लोग पा गए पंचायत में तो सिर पर जूते रखवाएँगे।
         अँधेरे का फायदा उठाकर वह उल्टे पैरों लौट पड़ता है

      अँधेरा होते ही गाँव के लोग पंचायत के लिए जुटना शुरू हो जाते हैं। तेरस का चाँद अँधेरे को चीरकर निकलता है, तब तक पंचायत जम जाती है। यह पंचायत जातीय पंचायतों से अलग है। जातीय पंचायत एक जाति की होती है। उसी जाति के पंच उसी के सरपंच। यह पंचायत समाजी है। पूरे गाँव-समाज की। इसमें सभी जाति के पंच हैं। एक-एक।
        किसी और का मामला होता तो जातीय सरपंच विसराम चुना जाता लेकिन आज तो वह फरियादी है। बोधन महतो जो विसराम के स्वजाति हैं- सरपंच चुने गए हैं। डीजल का बाप खास पंच। शिवाले के पुजारीजी ने पंच बनना मंजूर नहीं किया। वे गृहस्थ नहीं हैं, बाल-ब्रह्राचारी हैं। लेकिन जरूरत पड़ने पर अपनी बात रख सकते हैं। इसके अलावा बाकी लोगों को भी सवाल उठाने और अपनी बात रखने की आजादी है।
        बच्चे मर्दों के बीच में ही टाट पर इधर-उधर घुसे हैं। औरतें तनिक हटकर अलग गोल बनाकर बैठी हैं लेकिन इतना सटकर कि एक-एक सवाल एक-एक जवाब साफ-साफ सुनार्इ पडे़।
       चारों कोनों पर चार मशालची मशाल लेकर खडे़ हैं। बीच में एक 'चलता' मशालची। जो भी बोलने के लिए उठता है, 'चलता' मशालची हाथ बढ़ाकर मशाल बोलने वाले के चेहरे की तरफ कर देता है। पंचायत का मुद्दा जग जाहिर है फिर भी रिवाज के मुताबिक विसराम पंचों के बीच में खड़ा होता है। कंधे पर पड़ा अंगौछा माथे लगाकर पंचायत को 'शीश' झुकाता है और अरदास करता है, ''पंचो। पंचायत के बीच में जो जनाना बैठी है, मेरी पतोहू है सो आप सभी जानते हैं। मेरा लड़का 'परदेश' गया है। गौना कराने की कोर्इ जल्दी नहीं थी। लेकिन लड़की के बारे में इसके नैहर से जो खबर मिलती थी उसे सुन-सुनकर कान पक गए थे। यह सोचकर कि नैहर छूटेगा तो सब ठीक हो जाएगा, गौना करा लिया। यहाँ आने पर गलत-सही बात देखने पर टोका-टाकी शुरू की तो मेरे टोले के लोगों ने मेरी ही गलती निकालना शुरू कर दिया। सो भी आप लोग थोड़ा-बहुत सुने होंगे। पाँच पंच की बात सुनकर मैंने अलग मँड़र्इ तैयार किया। लेकिन यहीं गलती हो गर्इ। नजर से दूर होने का नतीजा हुआ कि पतोहू हाथ से बेहाथ हो गर्इ। डरेवर के साथ पहली बार नहीं भागी है यह। मेरी मरी मेहरारू का गहना-गुरिया हाथ से गया, इसकी चिंता नहीं है मुझको। जाँगर रहेगा तो फिर कमा लूँगा। लेकिन इज्जत पर बट्टा लगा दिया, मेरे साथ-साथ गाँव की इज्जत पर। उसका क्या होगा? अब सारा मामला पंच के सामने है। जो चाहे उसको सजा दें। जो चाहे मुझको। हाँ मेरा कसूर है कि मैं कथा-कीर्तन में रमा रहा। इसे 'रखा' नहीं पाया। चौकीदारी नहीं कर पाया। वैसे हम र्इ जरूर कहेंगे कि कथा-कीर्तन के कारण ही मेरी जान बच गर्इ। नहीं तो अब तक मेरी जली हुर्इ लहास पंचों के बीच में होती।''
          विसराम हाथ जोड़कर अपनी जगह पर बैठ जाता है। थोड़ी देर के लिए सन्नाटा हो जाता है। सबकी नजर फिर एक बार औरतों की गोल में बैठी पतोहू की तरफ उठती है। लेकिन चाँदनी में ज्यादा साफ नहीं दीखता।
          सरपंच बोधन महतो हैं, ''पतोहू को पंच के बीच में खड़ा किया जाय।''
दो-तीन औरतें बाँह पकड़कर पतोहू को बीच में लाती हैं। मशालची मशाल आगे कर देता है। पतोहू सिर उठाकर खड़ी होती है, कोर्इ लाज नहीं! कोर्इ डर नहीं! सिर पर आँचल नहीं। पूरी पंचायत को ठोकर मारती नजरें। यह बात सबको खलती है।
          ''देखो लड़की। तुम पंच के बीच में खड़ी हो। पंच के बीच माने भगवान के बीच। यहाँ न कोर्इ किसी का हितू है न मुद्दर्इ। यहाँ जो भी बोलना होगा, सच-सच बोलना होगा। भगवान को हाजिर-नाजिर जानकर बोलना होगा। मंजूर ?''
           स्वीकृति में सिर हिलाती है पतोहू।
          ''तुम घर से किसके साथ भागी। काहे भागी?''
          ''किसी के साथ नहीं। अकेले भागी। अपने आदमी के पास जा रही थी- कलकत्ता।''
          ''तब गहना-रूपया किसको दे दिया सास का?''
          ''मैंने कोर्इ गहना-रूपया नहीं खोदा। यह सब झूठ है।''
          ''झूठ है? रात तेरे साथ कोर्इ आदमी था झोंपड़ी में। दारू पीर्इ गर्इ। मछली खार्इ गर्इ। क्या यह भी झूठ है?''
          ''यह सच है।''
          ''तू मिट्टी के तेल की बोतल ओर माचिस लेकर विसराम की मँड़र्इ में गर्इ थी, यह सच है कि झूठ है?''
          ''सच है?''
          ''क्यो गर्इ थी?''
          ''गर्इ थी इसे मिट्टी का तेल डालकर फूँकने।''
          ''काहे।''
        ''क्योकि रात मेरी झोंपड़ी में दारू पीने वाला, मछली खाने वाला और मेरे साथ मुँह काला करने वाला जानवर यही था। मैं इसे जिंदा जलाना चाहती थी लेकिन यह बच गया। अब मैं इसका कच्चा मांस खाऊँगी।''
       पतोहू विसराम की तरफ लपकती है। थोड़ा हो-हल्ला होता है। लोग उसे पकड़कर बैठा देते हैं। पंचायत में भनभनाहट होने लगती है।
        विसराम को अब डरने की जरूरत नहीं। वह हाथ जोड़कर खड़ा होता है। ''पंचों से मेरी एक अरदास है। यहाँ पर शिवाले के पुजारी बैठे हैं। पंच उनसे पूछ सकते हैं। रात दस-ग्यारह बजे तक तो मैं 'कथा' में व्यस्त रहा शिवाले पर। फिर घर आया। खाना खाकर जरा कमर सीधी किया। ठीक से झपकी भी नहीं आर्इ और फिर सीधा शिवाले की सीढ़ियों पर जाकर पड़ गया। आधी रात को बाबाजी उठे तो मुझे सीढ़ियों पर पड़ा पाया। मैंने इसके साथ मुँह काला कब कर लिया? मछरी कहाँ बैठकर पकाया? दरवाजा तो यह अंदर से बंद करके सोती है? उसे कब कैसे खोल लिया? और यह सब हुआ तो इसने हल्ला-गुल्ला क्यों नहीं किया?''
         पुजारीजी ने सिर हिलाकर समर्थन किया, ''दो-तीन घंटे मुश्किल से शिवाले से हटा होगा विसराम। बल्कि सपने की चर्चा भी उसने की थी। सबेरे आरती करार्इ, भजन सुनाया। पंचों के लिए सचमुच सोचने की बात है।''
           तू झोंपड़ी अंदर से बंद करके सोती है। विसराम बाहर मँड़र्इ में सोता है। फिर वह अंदर कैसे घुसा?''
          ''वह परसाद लेकर शाम को आया। मैंने परसाद 'ग्रहन' किया। फिर मुझे आलस आ गया। नींद आने लगी। मैं बिना दरवाजा बंद किए लेट गर्इ।''
           ''ताज्जुब की बात! लेकिन जब तेरे साथ गलत काम होने लगा तब भी तेरी नींद नहीं टूटी।''
            ''जरा-सी टूटी थी लेकिन आँख खुलती ही नहीं थी। जैसे नशा चढ़ा हुआ था।''
          ''हुँह! नशा चढ़ा था। तो इतनी जल्दी उतर गया नशा! बताइए भला। यह विश्वास की बात है। औरत के साथ ऐसा -वैसा काम हो और उसकी नींद न टूटे। ऐसा कलजुगी बयान!''
           ''और मछली कहाँ पा गया विसराम? वह तो दिन भर शिवाले पर था।''
            इसका क्या जवाब दे पतोहू?
         बाल विधवा बिरजा बैठी सोच रही थी अगर वह कह दे कि मछली का चिखना तो उसी से बनवाया था विसराम ने। शिवाले से लौटते समय लेते हुए आया था- तो? अभी सारी पंचायत उलट जाएगी...लेकिन तब उससे भी पूछा जा सकता है- कितने साल से वह विसराम का चिखना बनाती रही है? आगे से चिखना बनाना बंद हो जाएगा सो अलग।
          मनतोरिया की मार्इ से नहीं रहा जाता। वह उठकर खड़ी हो जाती है-''एकदम ठीक बोलती है पतोहू! मैं गवाह हूँ। एक दिन में खुद गर्इ थी इसकी झोंपड़ी में। वही दारू की बोतल। वही बीड़ी के टोंटे। पुराना पापी है विसरमवा। महागीध। घटियारी शुरू से इसके मन में बसी है।''
          ''किसकी औरत है यह? जनाना की जात,? बिना बुलाए कैसे कूद पड़ी बीच में। 'छुट्टा'  छोड़ी गई  है क्या? कौन है इसका आदमी?''
         कुछ लोग मनतोरिया की मार्इ को डाँटकर बैठा देते हैं। फिर विचार-विमर्श होने लगता है। अगर शुरू से घटियारी की बात मान ले तो आज तक पतोहू ने मुँह क्यों नहीं खोला कभी?
           विसराम फिर भयभीत होता है। वह हाथ जोड़कर खड़ा होता है।
         ''पंचो! मेरी पतोहू को बिगाड़नें में इसी औरत का हाथ है। मनतोरिया की मार्इ का। पतोहू से सवाल किया जाय कि क्या डरेवर वाला किस्सा झूठा है? कुइसा मिस्त्री का गहना-गुरिया गढ़ाना झूठा है? ट्रैक्टर चलाने वाले लड़के के साथ मेला देखना झूठा है?''
            फिर सवाल? सवाल पर सवाल।
          पतोहू एक-एक सवाल का जवाब देती है। डरेवर भट्‌ठे पर आता है। वह उसे खाना बनाकर खिलाती थी। इसके आगे और कोर्इ बात नहीं। बिल्लर ट्रैक्टर चलाता था। मेला देखने वह अकेले नहीं भट्‌टे की सारी औरतों के साथ गर्इ थी। कुइसा मिस्त्री की जनाना नहीं है। उसे जनाना की तलाश है।  लेकिन उसके बाप के साथ कोर्इ सौदा हुआ था इसकी जानकारी उसे नहीं है। गहना-गुरिया उसने अपनी कमार्इ से बनवाया है।
           कुछ भी हो, लेकिन बदनाम रही है पतोहू मायके में, यह बात साबित होती। फिर उसका बयान भी यकीन के काबिल नहीं कि नींद के मारे वह बिना किवाड़ बंद किए सो गर्इ और 'ऐसी-वैसी' बात होने पर भी उसकी आँख नहीं खुली। और रात में ऐसी नींद में मतवारी हो रही थी तो सबेरे बताती। भागी काहे? विसराम को मछरी कहाँ से मिल गर्इ? गहने खोदे गए और पतोहू के पास नहीं मिले तो जरूर कोर्इ साथ था जो लेकर भाग गया। गाड़ी में एक नौजवान टोका-टाकी भी किया था गाँव वालों के साथ।
           रात आधी से ज्यादा बीत गर्इ है। चंद्रमा सिर के ऊपर आ गया है। छोटे बच्चे महतारी के कोरे में सो रहे हैं। बडे़ बच्चे टाट पर इधर-उधर पडे़ हैं। सब इस लालच में जुटे थे कि पंचायत खत्म होने पर सबको गुड़ खाने को मिलेगा।
         काफी देर बाद पंच इस नतीजे पर पहुँचते हैं कि पतोहू का ससुर पर लगाया गया आरोप बेबुनियाद है। पतोहू ने रात अपने यार को बुलाय था। उसके साथ दारू पिया। मछली खार्इ। मुँह काला करवाया। गहना खोदकर निकलवाया और सबेरे भागते-भागते ससुर को फूँक जाना चाहती थी कि पीछे कोर्इ ढूँढ़ने वाला न बचे। अब इसकी क्या सजा दी जाय, यह सोचना है।
         पुजारी बताते हैं- वेदों में कर्इ तरह की सजाएँ लिखी हैं। लाल मिर्च की बुकनी भरने की सजा। लछिमनजी ने तो इससे छोटी गलती पर नाक-कान दोनों काट लिये थे। अभी-अभी एक वेद वे हरिद्वार से लाए हैं। उसमें लिखा है- बालब्रह्राचारी की सेवा से भी 'परासचित' होता है।
         सजा की तजवीज में हल्ला-गुल्ला तेज हो जाता है।
        थोड़ी देर बाद पुजारीजी फिर कहते हैं कि अगर पहली गलती का ध्यान रखते हुए पंच सुधार का मौका देना चाहें तो छ: महीने के लिए शिवाले पर झाडू लगाने की सजा देना काफी रहेगा।
         लेकिन इधर किसी का ध्यान नहीं है। पुजारीजी को लगता है कि लोग जान-बूझकर उनकी सुझार्इ सजा की तरफ ध्यान नहीं देना चाहते।
        काफी देर तक 'विचार' होता है। अंत में बोधन महतो खडे़ होकर फैसला सुनाते हैं, ''गाँव के नाक कटाने वाली, गाँव की इज्जत में दाग लगाने वाली जनाना को बेदाग नहीं छोड़ा जा सकता। अगर आगे थाना-पुलिस तक बात जाती है तो भी गाँव के लोग उसे चंदर करके झेलेंगे लेकिन दागी जनाना को 'दाग' करके ही नैहर भेजा जाएगा।''
           चारों तरफ सन्नाटा! कुत्ते तक चुप हैं।
         ''अब सवाल है कि दागा कहाँ जाय? तो, इसने अपने 'बियहा', अपने 'सोहाग' के साथ दगा किया है। जिस धन की इच्छा जान देकर भी करना औरत का धरम माना गया है उसे चिखना और दारू के नशे में फिरी में लुटा दिया है इस बदकार ने- बाहरी आदमी को। इसकी कोर्इ माफी नहीं। इसके लिए तो ऐसी जगह दागना चाहिए कि न कहीं दिखाने लायक रहे न बताने लायक। लेकिन जुग-जमाना बहुत बदल गया है। सड़ा हुआ मामला भी थाना-पुलिस में जाता है तो हजार से कम में बात नहीं होती। तो बदले जमाने में सोहाग से दगा की सजा है, सोहाग की निशानी, बिंदी-टिकुली लगानें की जगह, बीचोबीच माथे पर दगनी। जिंदगी भर के लिए कलंक-टीका।''
            एक पल के लिए रूकते हैं बोधन महतो, ''किसी को कोर्इ एतराज हो तो बोलो। सबको मंजूर?''
          ''तो आज अभी पंचायत के बीच लोहे की कलछुल की डाँडी लाल करके दागने का काम विसराम के जिम्मे। पतोहू की निगरानी करने में चूक हुर्इ, इसकी सजा।''
          मनतोरिया की मार्इ से फिर नहीं रहा जाता। वह फिर लपककर बीच में आती है- ''र्इ अँधेर है। दगनी दागना है तो विसराम और बोधन चौधरी के चूतर पर दागना चाहिए। कोर्इ काहे नहीं पूछता कि बोधन की बेवा भोजार्इ दस साल पहले काहे कुएँ में कूदकर मर गर्इ थी। गाँव की औरतें मुँह खोलने को तैयार हो जाएँ तो विसराम की घटियारी के वह एक छोड़ दस 'परमान, दे सकती है। वही आदमी बेबस बेकसूर लड़की को दागेगा? और वही बोधन बड़का पग्गड़ बाधकर दगनी की सजा सुनाएँगे? यही नियाय है? र्इ पंचायत नियाय करने बैठी है कि अँधेर करने?''
         मनतोरिया के बाप को इस बार सचमुच गुस्सा आ जाता है। इतने बडे़ गाँव में वही सबसे कमजोर मर्द है जो उसी की जनाना भरी पंचायत में गचर-गचर बोले जा रही है? वह लपककर औरत का बाल पकड़ता है और घर-घर घसीटते हुए पंचायत से बाहर ले जाता है।
         अपने आदमी को क्या कहे वह? आदमी तो आदमी। हाथी हाथी होता है। महावत महावत। चाहे कितना ही कमजोर महावत कयों न हो।
        तब तक पतोहू उठकर खड़ी होती है, ''मुझे पंच का फैसला मंजूर नहीं। पंच अंधा है। पंच बहरा है। पंच में भगवान का 'सत' नहीं हैं मैं ऐसे फैसले पर थूकती हूँ- आ-क्-थू...! देखूँ कौन मार्इ का लाल दगनी दागता है।''
         वह पंचायत से निकलकर जाने लगती है। पल भर सन्नाटा रहता है। डीजल का बाप ललकारता है, ''सब लोग चूड़ी पहन लिये हैं?''
         फिर 'पकड़ो-पकड़ो' की आवाजे। कर्इ नौजवान पीछे-पीछे दौड़ते हैं। थोड़ी देर में हाथ-पैर चलाती पतोहू को सब बकरी की तरह गोद में उठाए हुए लाते हैं और बीच में बैठा देते हैं। कितनी मुलायम देह है- गुदगुदा मांस! दाब के बैठो। फिर न भागे। डरेवर साला बचकर निकल गया।
        पूरी  पंचायत की तौहीन। पहले गाँव की नाक कटवार्इ फिर पंचायत पर थूक दिया। हिजड़ों का गाँव समझ रखा है क्या?
डीजल का बाप एक नौजवान को लोहे की कलछुल और उपले लाने का हुकुम देता है। दाँव लगा तो मनतोरिया की मार्इ की दगनी भी करके छोडे़गा वह किसी दिन। दागने की सजा सुनकर औरतें एक-एक करके खिसकने लगती हैं।
         दागने का काम नया नहीं विसराम के लिए। जानवरों के 'जीभी' 'सहनी' रोगों में आए दिन जीभ और मसूडे़ दागता रहता है। लेकिन औरत की दगीनी। पहली बार मौका मिला है।
        कलछुल लाल होते ही कर्इ नौजवान पतोहू को हाथ-पैर और सिर पकड़कर लिटा देते हैं? कसकर दबाओ। जो  जहाँ पकडे़ वहीं मांसलता का आनन्द ले लेना चाहता है। नोचते-कचोटते, खींचते, दबाते, हाथ। पतोहू  जिबह होती गाय की तहर 'अल्लाने' लगती है। सोने वाले बच्चे जगकर रोने लगते हैं।जगे हुए बच्चे डरकर घर की तरफ भाग चले हैं ।
         लाल डाँड़ी वाली कलछुल लेकर आगे बढ़ता है विसराम। इतने दिनों बाद फिर दुहरार्इ जा रही है महाभारत की कथा-भरी सभा में लाचार औरत की बेइज्जती!
         इसके कारण भी कोर्इ महाभारत होगा क्या?
         काहे भार्इ। र्इ कोर्इ रानी-महारानी है?
         मशालची मशाल नीचे झुकाता है। दागने का मन एकदम नहीं है। विसराम का, लेकिन 'करम' का भोग तो भोगना ही पडे़गा।
       छन्न! कलछुल खाल से छूते ही पतोहू का चीत्कार कलेजा फाड़ देता है। कूदती लोथ! मांस जलने की चिरायंध! चीत्कार सुनकर एकाध कुत्ते भौंकते हैं, एकाध रोने लगते हैं।
चीखते' चीखते बेहोश हो गर्इ पतोहू! लोग पीछे हटते हैं।
पंचायत टूट रही है। हवा में भोर की ठंड आ गर्इ है। पुजारीजी भारी मन से कहते हैं- तिरिया चरित्तर समझना आसान नहीं। बाबा भरथरी ने झूठ थोडे़ कहा है-तिरिया चरित्रम् पुरूषस्य भाग्यम्...
         बीसों सिर एक साथ सहमति में हिलते हैं।

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